समाजकार्यस्थल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में नवी मुंबई की महिला स्ट्रीट वेंडर्स का संघर्ष

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में नवी मुंबई की महिला स्ट्रीट वेंडर्स का संघर्ष

स्ट्रीट मार्केट में काम करने वाली महिलाएं अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। यहां न नौकरी की सुरक्षा है, न तय आमदनी, न सामाजिक सुरक्षा और न ही सरकारी योजनाओं तक आसान पहुंच। बारिश हो, तेज़ गर्मी हो या बीमारी—काम न करने का मतलब है उस दिन कोई कमाई नहीं।

नवी मुंबई की सुबह सिर्फ़ दफ़्तर जाने वालों या मॉर्निंग वॉक करने वालों से नहीं जागती। यह उन महिलाओं से भी शुरू होती है, जो तड़के चार बजे नींद से उठती हैं। वे अपने कंधों पर परिवार की ज़िम्मेदारियों और आर्थिक मजबूरियों का बोझ लिए स्ट्रीट मार्केट की ओर निकल पड़ती हैं। सुबह सात बजे से दस बजे तक फल, जूस, चाय, नाश्ता और छोटे-मोटे खाने-पीने के स्टॉल लगाने वाली ये महिलाएं शहर की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। इसके बावजूद व्यवस्था और समाज की नज़र में वे आज भी काफी हद तक अदृश्य हैं। दिन भर की मेहनत और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ उन्हें सामाजिक और प्रशासनिक बेरुख़ी का भी सामना करना पड़ता है। मिड-डे में छपी खबर अनुसार, मुंबई में स्ट्रीट मार्केट चलाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी क्रम में नवी मुंबई के रेलवे स्टेशनों के बाहर और जॉगिंग एरिया के आसपास फूड स्टॉल चलाने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। इन महिलाओं का दिन आम कामकाजी लोगों से कहीं पहले शुरू होता है। स्टॉल लगाने के लिए वे सुबह चार बजे उठती हैं।

घर के रोज़मर्रा के काम, बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल के साथ-साथ स्टॉल का सामान तैयार करना, फल काटना, जूस की सामग्री जुटाना, गैस, बर्तन और पानी का इंतज़ाम सब उन्हें खुद करना होता है। इसके बाद वे घंटों खड़े रहकर सामान बेचती हैं। बाहर से यह जीवन जितना आसान दिखता है, असलियत उतनी ही कठिन है। सुबह की भागदौड़ के बाद भी इन महिलाओं का काम खत्म नहीं होता। देर रात तक वे अगले दिन की तैयारी में लगी रहती हैं—सब्ज़ियां काटना, सामग्री संभालना और सामान जमाना। सुबह सात बजे तक स्टॉल लगाना उनके रोज़गार की मजबूरी है, ताकि दफ़्तर जाने वाले लोग और मॉर्निंग वॉक पर निकले ग्राहक उनका सामान खरीद सकें। इतनी मेहनत के बावजूद उन्हें सिर्फ़ सुबह दस बजे तक ही काम करने की अनुमति होती है। जैसे ही घड़ी दस बजाती है, उन्हें मजबूरी में अपना सामान समेटना पड़ता है। स्थानीय नियमों और सामाजिक दबाव के कारण कई बार आसपास के दुकानदार, हाउसिंग सोसायटी के लोग या स्थानीय नागरिक ही उन्हें स्टॉल हटाने को कह देते हैं। यही वह समय होता है, जब उनकी बिक्री बेहतर होने लगती है।

कर्ज़ और पति की बीमारी की वजह से मुझे यह काम शुरू करना पड़ा। मेरे दो बच्चे हैं। मैं सुबह चार बजे उठती हूं, फल साफ़ करती हूं, उन्हें ठीक से बॉक्स में पैक करती हूं और बेचने निकल जाती हूं। इस काम में मेहनत बहुत है, लेकिन आमदनी कम है।

स्ट्रीट फूड के पीछे की मजबूर कहानियां

नवी मुंबई के घणसोली इलाके में जब फेमिनिज़म इन इंडिया ने स्टॉल लगाने वाली महिलाओं से बात की, तो कई ज़रूरी बातें सामने आईं। सबसे अहम बात यह थी कि स्ट्रीट फूड या फल-जूस का यह छोटा व्यवसाय किसी शौक या अतिरिक्त कमाई का ज़रिया नहीं है। यह इन महिलाओं के लिए जीवन की ज़रूरत है। वे किसी न किसी पारिवारिक ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए रोज़ तड़के सुबह घर से निकलती हैं। पूजा रामदास कांबले घणसोली में फलों का स्टॉल लगाती हैं और कई सालों से यह काम कर रही हैं। वह बताती हैं, “कर्ज़ और पति की बीमारी की वजह से मुझे यह काम शुरू करना पड़ा। मेरे दो बच्चे हैं। मैं सुबह चार बजे उठती हूं, फल साफ़ करती हूं, उन्हें ठीक से बॉक्स में पैक करती हूं और बेचने निकल जाती हूं। इस काम में मेहनत बहुत है, लेकिन आमदनी कम है। ज़िम्मेदारियों के कारण मुझे रोज़ काम करना पड़ता है। अगर कोई महिला मुश्किल समय में परिवार चलाने के लिए काम कर रही है, तो उसे समाज और व्यवस्था दोनों का सहयोग मिलना चाहिए।”

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की अदृश्य श्रमिक

पूजा की तरह हर महिला की अपनी अलग कहानी है। घरेलू काम के साथ बाहर नियमित नौकरी करना उनके लिए अक्सर संभव नहीं होता। कभी समय की कमी होती है, तो कभी सामाजिक रोक-टोक आड़े आती है। स्ट्रीट मार्केट उन्हें ऐसा विकल्प देता है, जहां वे सीमित समय में कुछ कमाई कर सकती हैं और फिर घर लौटकर घरेलू ज़िम्मेदारियां निभा सकती हैं। यह उनके लिए आसान रास्ता नहीं, बल्कि हालात में चुना गया एकमात्र रास्ता है। स्ट्रीट मार्केट में काम करने वाली महिलाएं अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। यहां न नौकरी की सुरक्षा है, न तय आमदनी, न सामाजिक सुरक्षा और न ही सरकारी योजनाओं तक आसान पहुंच। बारिश हो, तेज़ गर्मी हो या बीमारी—काम न करने का मतलब है उस दिन कोई कमाई नहीं। इसके बावजूद ये महिलाएं पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करती हैं। ज़्यादातर महिलाएं साफ़-सफाई का पूरा ध्यान रखती हैं। वे ताज़े फल, साफ़ पानी और ढके हुए बर्तन इस्तेमाल करती हैं। फिर भी उन्हें अक्सर अवैध, अव्यवस्थित या असुविधा पैदा करने वाली मान लिया जाता है। यह सोच सामाजिक असमानता के साथ-साथ जेंडर आधारित असंवेदनशीलता को भी दिखाती है।

मैं तड़के सुबह चार बजे पोहा, साबुदाना और डोसा बनाना शुरू कर देती हूं। पहले मैं नौकरी करती थी, लेकिन पूरे दिन घर से बाहर रहने के कारण बच्चे को झूलाघर में छोड़ना पड़ता था। कमाई से ज़्यादा खर्च हो जाता था और घर पर भी ठीक से ध्यान नहीं दे पाती थी। इसी वजह से मैंने नाश्ते का ठेला शुरू किया।

सुरक्षित जगह और समय की कमी से बढ़ता दबाव

इन महिलाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या काम करने के लिए सुरक्षित और वैध जगह की कमी है। घणसोली में नाश्ते का स्टॉल लगाने वाली श्रावणी धुली बताती हैं, “मैं तड़के सुबह चार बजे पोहा, साबुदाना और डोसा बनाना शुरू कर देती हूं। पहले मैं नौकरी करती थी, लेकिन पूरे दिन घर से बाहर रहने के कारण बच्चे को झूलाघर में छोड़ना पड़ता था। कमाई से ज़्यादा खर्च हो जाता था और घर पर भी ठीक से ध्यान नहीं दे पाती थी। इसी वजह से मैंने नाश्ते का ठेला शुरू किया।” श्रावणी के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था क्योंकि ठेला चलाने वाली महिलाओं को समाज अक्सर सम्मान की नज़र से नहीं देखता। लेकिन परिवार की ज़िम्मेदारी और बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए उन्होंने यह रास्ता चुना। कड़ी मेहनत और रोज़ की भागदौड़ से उन्होंने समझौता कर लिया है, लेकिन सुबह दस बजे के बाद स्टॉल न चलाने की बाध्यता उनके काम को सीमित कर देती है। वह कहती हैं, “अगर मुझे दो-तीन घंटे अतिरिक्त काम करने की अनुमति मिल जाए, तो मेरी रोज़ की कमाई बढ़ सकती है। स्थायी जगह न होने की वजह से मुझे रोज़ मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। डर रहता है कि कहीं आज स्टॉल हटा न दिया जाए, बेवजह जुर्माना न लगा दिया जाए या सामान ज़ब्त न कर लिया जाए। यह असुरक्षा मेरे आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है।”

मानसिक दबाव, अदृश्य श्रम और लगातार अपेक्षाएं

द हिंदू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक तंगी के कारण इन महिलाओं पर मानसिक दबाव लगातार बना रहता है। वे परिवार की ज़िम्मेदारियां, बच्चों का भविष्य, पति की बीमारी, समाज की टिप्पणियां और प्रशासन की अनदेखी का बोझ रोज़ उठाती हैं। इन महिलाओं का श्रम केवल स्टॉल तक सीमित नहीं रहता। स्टॉल से लौटने के बाद भी उनका काम खत्म नहीं होता। घर के काम, खाना बनाना, बच्चों की पढ़ाई और अगले दिन की तैयारी उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है।

यहां न नौकरी की सुरक्षा है, न तय आमदनी, न सामाजिक सुरक्षा और न ही सरकारी योजनाओं तक आसान पहुंच। बारिश हो, तेज़ गर्मी हो या बीमारी—काम न करने का मतलब है उस दिन कोई कमाई नहीं। इसके बावजूद ये महिलाएं पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करती हैं।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के टाइम यूज़ सर्वे के अनुसार, शहरी भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में तीन गुना अधिक समय बिना पारिश्रमिक के घरेलू काम में लगाती हैं, भले ही वे दिन भर बाहर काम क्यों न करती हों। यह दोहरी ज़िम्मेदारी समाज में अक्सर स्वाभाविक मान ली जाती है। स्टॉल लगाने वाली महिलाओं की मांगें बहुत बड़ी नहीं हैं। वे न सब्सिडी मांगती हैं और न ही मुफ्त सुविधाएं। उनकी मांग बस इतनी है कि उन्हें सम्मान और स्थिरता मिले।

मेहनत करती महिलाएं, नज़रअंदाज़ करती व्यवस्था

इन महिलाओं को स्ट्रीट वेंडिंग के लिए तय और सुरक्षित जगह चाहिए, काम के समय में थोड़ी बढ़ोतरी चाहिए, महिला वेंडर्स के लिए पहचान और सुरक्षा चाहिए, और लाइसेंस की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए। काग़ज़ों में भले ही स्ट्रीट वेंडर्स (आजीविका संरक्षण और स्ट्रीट वेंडिंग विनियमन) अधिनियम, 2014 मौजूद है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका लाभ बहुत कम महिलाओं तक पहुंच पाता है। जब ये महिलाएं मेहनत, ईमानदारी और साफ़-सुथरे तरीके से काम कर रही हैं, तो उन्हें बार-बार हटाया जाना या अपमानित किया जाना कैसे न्यायसंगत है? समाज को यह समझने की ज़रूरत है कि स्ट्रीट मार्केट कोई अव्यवस्था नहीं, बल्कि गरीब और मध्यम वर्ग के लिए रोज़गार और सस्ते भोजन का बड़ा स्रोत हैं। नवी मुंबई के स्ट्रीट मार्केट में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी सिर्फ़ आर्थिक बदलाव नहीं, बल्कि एक सामाजिक सच्चाई है। यह दिखाता है कि महिलाएं हर परिस्थिति में अपने लिए रास्ता निकालना जानती हैं, लेकिन व्यवस्था अब भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाई है।

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