समाजकार्यस्थल गर्लबॉस से बर्नआउट तक: क्यों महिलाओं की थकान को सामान्य बना दिया गया है

गर्लबॉस से बर्नआउट तक: क्यों महिलाओं की थकान को सामान्य बना दिया गया है

पूंजीवाद ज़्यादा काम करने को शौक़, जुनून या आज़ादी के नाम पर सही ठहराया जाता है। ऐसा दिखाया जाता है मानो इंसान अपनी मर्ज़ी से खुद को थका रहा हो। दार्शनिक ब्युंग-चुल हान अपनी किताब द बर्नआउट सोसाइटी (2010) में लिखते हैं कि आज का इंसान खुद ही खुद का शोषण करने लगा है।

आज के समय में उत्पादक होना सिर्फ़ काम करने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक तरह का नैतिक फ़र्ज़ बन चुका है। जो व्यक्ति लगातार काम में लगा रहता है, उसे अनुशासित, महत्वाकांक्षी और काबिल माना जाता है। समय का पूरा इस्तेमाल होना चाहिए, ऊर्जा व्यर्थ नहीं जानी चाहिए और आराम भी तभी सही ठहरता है, जब वह अगली मेहनत के लिए मददगार हो। ऐसे माहौल में थक जाना किसी चेतावनी की तरह नहीं, बल्कि सफलता की एक सामान्य क़ीमत की तरह देखा जाता है। इसी सामाजिक माहौल में ‘गर्लबॉस’ की सोच उभरती है। गर्लबॉस उस महिला की छवि है जो अपने दम पर आगे बढ़ती है, काम और आज़ादी—दोनों को एक साथ संभालती है। पहली नज़र में यह सशक्तिकरण जैसा लगता है, लेकिन यह सोच पूंजीवाद से बाहर नहीं जाती। दरअसल, यह उसी व्यवस्था की उपज है। गर्लबॉस पूंजीवादी दबाव का विरोध नहीं करती, बल्कि उसे अपने भीतर समेट लेती है। यहां शोषण किसी बाहरी ज़बरदस्ती की तरह नहीं, बल्कि “खुद की चाह” के रूप में दिखाई देता है।

उत्पादकता और पूंजीवाद का अनुशासन

पूंजीवाद को सिर्फ़ काम करने वाले लोगों की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है जो खुद को लगातार अनुशासित रखें। उत्पादकता की संस्कृति यही काम करती है। वह काम को नैतिक मूल्य बना देती है जहां ज़्यादा काम करना अच्छा और आराम करना आलस माना जाता है। साल 1905 में समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने अपनी किताब द प्रोटेस्टेंट एथिक एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज़्म में बताया था कि कैसे पूंजीवाद ने मेहनत को इंसान की क़ीमत से जोड़ दिया। उस समय यह सोच धार्मिक नैतिकता से जुड़ी थी, लेकिन आज यही विचार नौकरी, लक्ष्य, डेडलाइन, परफॉर्मेंस और ग्रोथ जैसे शब्दों के ज़रिये हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। पूंजीवादी व्यवस्था में काम की कोई स्पष्ट सीमा नहीं होती।

साल 1905 में समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने अपनी किताब द प्रोटेस्टेंट एथिक एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज़्म में बताया था कि कैसे पूंजीवाद ने मेहनत को इंसान की क़ीमत से जोड़ दिया।

दफ़्तर अब सिर्फ़ दफ़्तर तक सीमित नहीं है। मोबाइल और लैपटॉप के ज़रिये काम हर समय हमारे साथ रहता है। ऐसे में पूंजीवादको लोगों पर सीधे दबाव डालने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, क्योंकि लोग खुद ही खुद पर दबाव डालने लगते हैं। इस तरह उत्पादकता की संस्कृति पूंजीवादी दबाव को हमारे भीतर बसा देती है और उसे सामान्य बना देती है। इसी संदर्भ में वर्क फ्रॉम होम को सिर्फ़ एक आधुनिक सुविधा मानना भी भ्रामक है। विकासशील देशों में घर से काम करने वाली महिलाएं कोई नई श्रेणी नहीं हैं। वे दशकों से घर के भीतर बैठकर उत्पादन कर रही हैं कम मज़दूरी पर, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के और लगभग अदृश्य रहकर।

कपड़ों के कारख़ानों से लेकर खाने-पीने के छोटे उत्पादों तक, सप्लाई चेन का एक बड़ा हिस्सा घरों के भीतर पूरा होता है। यह काम अक्सर महिलाएं इसलिए चुनती हैं क्योंकि घरेलू ज़िम्मेदारियों के साथ यही उनके लिए सबसे संभव विकल्प होता है। इस श्रम की मज़दूरी बहुत कम होती है और अधिकार लगभग न के बराबर। इसके बावजूद काम लगातार चलता रहता है। इस तरह पूंजीवादी व्यवस्था घर को भी कार्यस्थल में बदल देती है और महिला श्रम को सुविधाजनक बताकर उसका अवमूल्यन करती है। यहां उत्पादकता आज़ादी का प्रतीक नहीं बनती, बल्कि एक ऐसी संरचना बन जाती है जिसमें काम नज़र नहीं आता, लेकिन उसका सबसे भारी बोझ उन्हीं पर पड़ता है जिनके पास उसे चुनौती देने की सबसे कम ताक़त होती है।

कपड़ों के कारख़ानों से लेकर खाने-पीने के छोटे उत्पादों तक, सप्लाई चेन का एक बड़ा हिस्सा घरों के भीतर पूरा होता है। यह काम अक्सर महिलाएं इसलिए चुनती हैं क्योंकि घरेलू ज़िम्मेदारियों के साथ यही उनके लिए सबसे संभव विकल्प होता है। इस श्रम की मज़दूरी बहुत कम होती है और अधिकार लगभग न के बराबर।

हालिया आंकड़े भी इसी संरचनात्मक दबाव की पुष्टि करते हैं। फ़ोर्ब्स इंडिया पर प्रकाशित डेटा के अनुसार, केवल 59 प्रतिशत महिलाएं ही फुल-टाइम और पूरी तरह ऑफ़िस आधारित नौकरी स्वीकार करने को तैयार हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 66 प्रतिशत है। महिलाओं द्वारा वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता देना यह साफ़ दिखाता है कि देखभाल का बोझ, घरेलू श्रम और सामाजिक अपेक्षाएँ अब भी मुख्य रूप से महिलाओं पर ही डाली जा रही हैं। ऐसे में वर्क फ्रॉम होम महिलाओं के लिए समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसका विस्तार बन जाता है। घर के भीतर ही उन्हें पेशेवर काम, देखभाल की ज़िम्मेदारियां और घरेलू श्रम, तीनों को एक साथ निभाना पड़ता है। इस पूरे बोझ को अक्सर खुद की पसंद के रूप में पेश किया जाता है, जबकि वास्तव में यह विकल्प सीमित परिस्थितियों से उपजा होता है, न कि समान अवसरों से।

गर्लबॉस: पूंजीवाद का पसंदीदा चेहरा

इस व्यवस्था में ‘गर्लबॉस’ का विचार आदर्श के रूप में सामने आता है। वह हर दबाव को झेलती है, खुद को लगातार प्रेरित करती है और शिकायत नहीं करती। उसकी सफलता की कहानी यह संदेश देती है कि सिस्टम में कोई समस्या नहीं है, बस मेहनत और आत्म-नियंत्रण की ज़रूरत है। इस सोच में कम तनख़्वाह, लंबे काम के घंटे और अस्थिर नौकरियों जैसे सवाल पीछे छूट जाते हैं। इसके बजाय संघर्ष, जज़्बे और खुद पर काम करने की बात को केंद्र में रखा जाता है। अगर एक महिला सफल हो सकती है, तो यह मान लिया जाता है कि हर कोई हो सकता है। और जो नहीं हो पाया, उसकी नाकामी को उसकी व्यक्तिगत कमी मान लिया जाता है। यह सोच पूँजीवाद के लिए बेहद सुविधाजनक है, क्योंकि इससे सिस्टम की असमानताओं और विफलताओं को व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी में बदल दिया जाता है। गर्लबॉस बदलाव की मांग नहीं करती, बल्कि खुद को और बेहतर ढंग से ढालने की कोशिश करती है। इस तरह दबाव सिस्टम से हटकर सीधे महिलाओं के कंधों पर डाल दिया जाता है।

इस व्यवस्था में ‘गर्लबॉस’ का विचार आदर्श के रूप में सामने आता है। वह हर दबाव को झेलती है, खुद को लगातार प्रेरित करती है और शिकायत नहीं करती। उसकी सफलता की कहानी यह संदेश देती है कि सिस्टम में कोई समस्या नहीं है, बस मेहनत और आत्म-नियंत्रण की ज़रूरत है।

खुद को थकाना और ‘चुनाव’ का भ्रम

पूंजीवाद ज़्यादा काम करने को शौक़, जुनून या आज़ादी के नाम पर सही ठहराया जाता है। ऐसा दिखाया जाता है मानो इंसान अपनी मर्ज़ी से खुद को थका रहा हो। दार्शनिक ब्युंग-चुल हान अपनी किताब द बर्नआउट सोसाइटी (2010) में लिखते हैं कि आज का इंसान खुद ही खुद का शोषण करने लगा है। व्यक्ति खुद को लगातार आगे धकेलता है। दबाव महत्वाकांक्षा बन जाता है और थकान को सफलता की सीढ़ी समझ लिया जाता है। ‘गर्लबॉस’ इसी भ्रम की एक मिसाल है। वह कहती है कि वह ज़्यादा काम अपनी मर्ज़ी से कर रही है। लेकिन, असलियत यह है कि काम से मना करने का मतलब होता है पैसों की कमी, करियर में पीछे रह जाना या समाज की नज़रों में कमतर दिखना। पूंजीवादी दबाव हमेशा और हर किसी के लिए एक सा काम नहीं करता। वह जेंडर से जुड़ी अपेक्षाओं के ज़रिये संरचित होता है।

उत्पादकता की संस्कृति भले यह दावा करे कि वह सिर्फ़ मेहनत को पुरस्कृत करती है, लेकिन हकीकत में वह एक विशाल अदृश्य श्रम-भंडार पर निर्भर करती है, ऐसा श्रम जो असमान रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। नारीवादी विचारक सिल्विया फेडेरिची अपनी किताब कैलिबान एंड द विच (2004) में साफ़ करती हैं कि पूंजीवाद सिर्फ़ वेतन वाले काम पर नहीं टिका है। यह व्यवस्था उतनी ही निर्भर है उस अदृश्य श्रम पर जो रोज़ घरों में होता है, शरीरों की देखभाल, बच्चों को पालना, बीमारों को संभालना, रिश्तों को निभाना और भावनात्मक सहारा देना। यह श्रम न तो किसी बैलेंस शीट में दर्ज होता है और न ही इसके बदले वेतन मिलता है।

उत्पादकता की संस्कृति भले यह दावा करे कि वह सिर्फ़ मेहनत को पुरस्कृत करती है, लेकिन हकीकत में वह एक विशाल अदृश्य श्रम-भंडार पर निर्भर करती है, ऐसा श्रम जो असमान रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। नारीवादी विचारक सिल्विया फेडेरिची अपनी किताब कैलिबान एंड द विच (2004) में साफ़ करती हैं कि पूंजीवाद सिर्फ़ वेतन वाले काम पर नहीं टिका है।

आज यह अदृश्य श्रम ख़त्म नहीं हुआ है, बल्कि उसका बोझ और बढ़ गया है। अब महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे पूरी तरह वेतन वाले काम में हिस्सा लें और साथ ही देखभाल से जुड़ा अधिकांश काम भी संभालें। खाना बनाना, सफ़ाई करना, बच्चों या बुज़ुर्गों की देखभाल करना और भावनात्मक संतुलन बनाए रखना इन सबको स्त्रीत्व की ‘स्वाभाविक’ ज़िम्मेदारी की तरह पेश किया जाता है, न कि ऐसे काम के रूप में जिसमें समय, ऊर्जा और श्रम लगता है। वर्ल्ड बैंक ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं अपने समय का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा बिना वेतन वाले देखभाल काम में लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 3 प्रतिशत। यह असमानता दिखाती है कि सामाजिक जीवन को चलाने की लागत आज भी मुख्य रूप से महिलाओं पर डाल दी जाती है—बिना किसी मुआवज़े के और इसी से पूँजीवाद को सीधा फ़ायदा होता है।

गर्लबॉस नैरेटिव और बढ़ता दबाव

गर्लबॉस नैरेटिव इस दबाव को और तेज़ कर देता है। यह मान लेता है कि महिलाएं बिना किसी सीमा के अपनी क्षमता बढ़ा सकती हैं। करियर में भी बेहतरीन रहें और घर और भावनात्मक ज़िम्मेदारियां भी बिना किसी रुकावट निभाती रहें। इस सोच को और खतरनाक बनाने वाली बात यह है कि इसे शोषण के रूप में पहचाना ही नहीं जाता। अदृश्य श्रम को प्यार, कर्तव्य या निजी पसंद कहकर टाल दिया जाता है, काम मानकर नहीं। उत्पादकता संस्कृति केवल दिखाई देने वाले नतीजों, पदोन्नति, उपलब्धियों और दक्षता का जश्न मनाती है, जबकि उन कामों को निजी या महत्वहीन मान लेती है जिनके बिना ये नतीजे संभव ही नहीं। इससे गहरी असमानता पैदा होती है।

वर्ल्ड बैंक ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं अपने समय का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा बिना वेतन वाले देखभाल काम में लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 3 प्रतिशत। यह असमानता दिखाती है कि सामाजिक जीवन को चलाने की लागत आज भी मुख्य रूप से महिलाओं पर डाल दी जाती है—बिना किसी मुआवज़े के और इसी से पूँजीवाद को सीधा फ़ायदा होता है।

पुरुषों की पूंजीवादी भागीदारी अक्सर सिर्फ़ वेतन वाले काम से मापी जाती है, जबकि महिलाओं की भागीदारी वेतन वाले और बिना वेतन वाले दोनों क्षेत्रों में फैली होती है। गर्लबॉस की छवि इस व्यवस्था को तोड़ती नहीं, बल्कि अक्सर इसे और मज़बूत करती है। उसकी सफलता की कहानी अदृश्य श्रम को मिटाकर चलती है—चाहे वह उसका अपना हो या किसी और का। सहनशीलता को सशक्तिकरण बताकर यह सोच उस सवाल को दबा देती है कि महिलाओं को इतना असमान बोझ उठाना ही क्यों पड़ता है। इसी बोझ से जन्म लेता है बर्नआउट।

बर्नआउट: पूंजीवाद की आवाज़

बर्नआउट को अक्सर व्यक्तिगत मानसिक समस्या समझा जाता है। लेकिन जब बड़ी संख्या में लोग एक साथ थक रहे हों, तो यह साफ़ संकेत है कि समस्या व्यक्ति की नहीं, व्यवस्था की है। पूंजीवाद लगातार और ज़्यादा काम और उत्पादन की मांग करता है। हालांकि इंसानी शरीर, ध्यान और भावनात्मक क्षमता की एक सीमा होती है। बर्नआउट वहीं पैदा होता है, जहां सिस्टम की अपेक्षाएं इंसानी क्षमता से आगे निकल जाती हैं। महिलाओं के लिए यह अनुभव और गहरा होता है। उनसे वेतन वाला काम करने के साथ-साथ भावनात्मक श्रम, देखभाल और सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ भी निभाने की उम्मीद की जाती है।

गर्लबॉस सोच इस दबाव को ताक़त और सशक्तिकरण के रूप में पेश करती है, लेकिन उन हालात पर चुप रहती है जो इस थकान को जन्म देते हैं।  बर्नआउट इसलिए अदृश्य रहता है क्योंकि उसे सामान्य मान लिया जाता है। सिस्टम पर सवाल उठाने के बजाय, लोगों से कहा जाता है कि वे और मज़बूत बनें, तनाव बेहतर संभालें और फिर से काम पर लौट जाएं। व्यवस्था जस की तस बनी रहती है। नारीवादी जवाब यही है कि इंसान की क़ीमत को उसके काम से न आँका जाए। आराम, सीमाएं और सामूहिक देखभाल को कमज़ोरी नहीं, बल्कि प्रतिरोध माना जाए। बर्नआउट व्यक्तिगत असफलता नहीं है। यह थके हुए शरीरों के ज़रिये बोलता हुआ पूंजीवाद है।

About the author(s)

I am Mansi Singh, a writer and a student of political science. I write in both Hindi and English, working across poetry and non-fiction. My writing focuses on gender discourse, literature, society and the quieter forms of power that shape everyday life. I am interested in how gender operates not just in systems but in silences, choices and the language we live with. Over time, I have built a growing platform on Instagram where I engage with literature and gender discourse, often through open-ended questions and video essays that invite readers to think more deeply. Writing for me is a way of noticing the unseen, how people resist, conform, care or question.

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