इंटरसेक्शनलजेंडर ऑटोइम्यून डिसऑर्डर: महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक चुनौतीपूर्ण समस्या 

ऑटोइम्यून डिसऑर्डर: महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक चुनौतीपूर्ण समस्या 

ऑटोइम्यून विकार तब होते हैं, जब शरीर की रक्षा प्रणाली, जो आमतौर पर संक्रमणों से बचाती है, लेकिन गलती से अपने ही ऊतकों पर हमला कर देती है। इन विकारों में गठिया, ल्यूपस, थायरॉइडाइटिस, सोरायसिस और सोजोग्रेन सिंड्रोम आदि शामिल हैं।

हमारा शरीर एक मशीन की तरह काम करता है, जिसमें इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) सबसे महत्वपूर्ण रक्षा तंत्र है। इसे हम एक सेना की तरह समझ सकते हैं, जो दिन-रात हमारे शरीर की सुरक्षा करती रहती है। लेकिन कभी-कभी यह कन्फ्यूज हो जाती है और अपने ही शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है। इसी स्थिति को स्व-प्रतिरक्षित या  ऑटोइम्यून डिसऑर्डर कहा जाता है। गौरतलब है कि महिलाएं इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। 

भारत में, डॉक्टरों का कहना है कि यह समस्या महिलाओं में और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि महिलाएं अक्सर थकान, जोड़ों में अकड़न या सूजन जैसे शुरुआती लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देती हैं, उन्हें मामूली समस्या, तनाव या बढ़ती उम्र का नतीजा मानकर खारिज कर देती हैं। जबकि पारिवारिक जिम्मेदारियों, जागरूकता की कमी या सामाजिक कारणों से कई महिलाएं डॉक्टर के पास जाने में देरी करती हैं, जिससे बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और गंभीर रूप ले लेती है।  हेल्थ वर्ल्ड की साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटोइम्यून बीमारियों का सामना कर रहे, लोगों में लगभग 70 फीसदी महिलाएं हैं, और इसे देश में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या के रूप में मान्यता देने की ज़रूरत है।

ऑटोइम्यून विकार तब होते हैं, जब शरीर की रक्षा प्रणाली, जो आमतौर पर संक्रमणों से बचाती है, लेकिन गलती से अपने ही ऊतकों पर हमला कर देती है। इन विकारों में गठिया, ल्यूपस, थायरॉइडाइटिस, सोरायसिस और सोजोग्रेन सिंड्रोम आदि शामिल हैं।

ऑटोइम्यून डिसऑर्डर कैसे होता है ?

विशेषज्ञ अभी तक यह पता नहीं लगा पाए हैं कि इन रोगों का असल कारण क्या है। शोधकर्ता अभी भी इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि आखिर प्रतिरक्षा प्रणाली हमें नुकसान पहुंचाना क्यों शुरू करती है। ऑटोइम्यून विकार तब होते हैं, जब शरीर की रक्षा प्रणाली, जो आमतौर पर संक्रमणों से बचाती है, लेकिन गलती से अपने ही ऊतकों पर हमला कर देती है। इन विकारों में गठिया, ल्यूपस, थायरॉइडाइटिस, सोरायसिस और सोजोग्रेन सिंड्रोम आदि शामिल हैं। ये रोग जोड़ों, त्वचा, रक्त वाहिकाओं और यहां तक ​​कि हृदय और फेफड़ों जैसे आंतरिक अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि कुछ कारक (ट्रिगर्स) ऑटोइम्यून बीमारी विकसित होने के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। क्लीवलैंड क्लिनिक के प्रकाशित शोध में बताया गया है कि, कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां आनुवंशिक होती हैं, यानी वे जैविक परिवार की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक फैल सकती हैं। इसके अलावा एक ऑटोइम्यून बीमारी होने से दूसरी ऑटोइम्यून बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके साथ ही रसायनों या अन्य पर्यावरणीय कारकों (जो हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं) के संपर्क में आने से ऑटोइम्यून बीमारियां शुरू हो सकती हैं। 

 हेल्थ वर्ल्ड की साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटोइम्यून बीमारियों का सामना कर रहे, लोगों में लगभग 70 फीसदी महिलाएं हैं, और इसे देश में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या के रूप में मान्यता देने की ज़रूरत है।

ऑटोइम्यून बीमारियों के लक्षण और महिलाओं पर इसका प्रभाव 

ऑटोइम्यून बीमारियों के कारण कई प्रकार के हो सकते हैं। ये हमारे शरीर को सिर से लेकर पैर तक लगभग पूरी तरह से प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, जो बीमारियां मांसपेशियों को प्रभावित करती हैं, वे मांसपेशियों में कमजोरी पैदा कर सकती हैं। रुमेटॉइड आर्थराइटिस जैसी बीमारी में जोड़ों में दर्द, सूजन या अकड़न महसूस हो सकती है। वहीं टाइप 1 मधुमेह में रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। इसके अलावा कुछ स्थितियों में देखने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती हैं। इसके साथ ही गर्मी का अहसास,त्वचा का रंग बदलना,बाल झड़ना, बार – बार संक्रमण होना, बुखार, और लगातार थकान रहना आदि लक्ष्ण शामिल हैं। कई ऑटोइम्यून बीमारियों में लक्षण बार-बार सामने आते रहते हैं। जब लक्षण अचानक ज़्यादा तेज़ या गंभीर हो जाते हैं, तो ऐसे समय को फ्लेयर या अटैक कहा जाता है।

 द वीक पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक, इंडियन रुमेटोलॉजी एसोसिएशन (आईआरएसीओएन) के 40 वें वार्षिक सम्मेलन में विशेषज्ञों ने बताया कि, भारत में यह बीमारियां पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कहीं ज़्यादा पाई जाती हैं। डॉक्टरों के अनुसार, 20 से 50 साल की उम्र की महिलाएं इससे सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। इस उम्र में हार्मोनल बदलाव और जीवनशैली से जुड़े कारक ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। इसके साथ ही महिलाओं में तनाव और अवसाद जैसी स्थितियां भी पैदा हो सकती है। हेल्थ वर्ल्ड में प्रकाशित स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने पाया कि महिलाओं के शरीर में एक्सिस्ट आरएनए नामक एक खास अणु बनता है , जो महिलाओं में मौजूद दो एक्स गुणसूत्रों में से एक को नियंत्रित करने में मदद करता है।

भारत में यह बीमारियां पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कहीं ज़्यादा पाई जाती हैं। डॉक्टरों के अनुसार, 20 से 50 साल की उम्र की महिलाएं इससे सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। इस उम्र में हार्मोनल बदलाव और जीवनशैली से जुड़े कारक ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं।

 हालांकि, यह अणु कभी-कभी प्रतिरक्षा प्रणाली को भ्रमित कर देता है, जिससे वह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं की रक्षा करने के बजाय उन पर हमला करने लगती है। नई दिल्ली स्थित एआईआईएमएस में रुमेटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. उमा कुमार ने कहा कि ऑटोइम्यून बीमारियों का सामना करने वाली लगभग दस में से सात मरीज महिलाएं होती हैं। उन्हें एक साफ़ पैटर्न यह दिखाई देता है कि महिलाएं अक्सर देर से आती हैं, क्योंकि वे लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज कर देती हैं। इसके अलावा फोर्टिस अस्पताल में रुमेटोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. बिमलेश धर पांडे ने कहा वो हर हफ्ते, ऐसी महिलाओं से मिलते हैं, जो निदान होने से पहले कई सालों तक बिना किसी स्पष्ट कारण के जोड़ों के दर्द या सूजन का सामना कर रही होती हैं। इससे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि खुद के लिए समय न निकाल पाने और जानकारी की कमी के कारण महिलाएं इससे बहुत ज्यादा प्रभावित हो रही हैं।

उपचार और बचाव के लिए क्या किया जा सकता है ?

अभी तक इसे पूरी तरह ठीक करने का कोई इलाज नहीं है, लेकिन इसे कंट्रोल किया जा सकता है। इससे बचाव के लिए, ब्लड टेस्ट, इमेजिंग टेस्ट( एक्स-रे, एमआरआई, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड ),एंटीबॉडी टेस्ट और कभी – कभीबायोप्सी करवाते रहना चाहिए, जिससे समय रहते इसके बचाव के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। इन बीमारियों के लिए कई तरह के उपचारों की ज़रूरत हो सकती है। जिस तरह इनके लक्षण अलग-अलग होते हैं, उसी तरह इसके उपचार भी अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, टाइप 1 मधुमेह वाले लोगों कोइंसुलिन थेरेपी की ज़रूरत होती है और सीलिएक रोग वाले लोगों कोग्लूटेन-मुक्त आहार का सेवन करना पड़ता है। इसके अलावा इन बीमारियों के लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए दर्द निवारक दवाएं, सूजनरोधी दवाएं जैसे कि कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स ,आईवीआईजी इन्फ्यूजन और  व्यावसायिक चिकित्सा आदि शामिल हैं। इसके अलावा ग्रामीण स्तर में महिलाओं के साथ इससे जुडी बातचीत करना ज़रूरी है। ताकि जागरूकता बढ़ सके और महिलाएं अपने स्वास्थ्य समस्याओं को गंभीरता से लें और उपचार करवा सकें। 

ऑटोइम्यून डिसऑर्डर केवल एक चिकित्सीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और लैंगिक स्वास्थ्य चुनौती भी है, जो खास तौर पर महिलाओं को प्रभावित करती है। यह बीमारी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे पितृसत्तात्मक जिम्मेदारियां, खुद को नज़रअंदाज़ करने की आदत और स्वास्थ्य से जुड़ी जागरूकता की कमी महिलाओं की तकलीफ को और गहरा बना देती है। समय पर पहचान, सही इलाज और निरंतर देखभाल से इन बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि महिलाएं अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से लें और समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था भी उन्हें समय पर सहयोग और समझ प्रदान करे। शायद तब ही इस समस्या को कम किया जा सकता है। 

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