इतिहास वाहिदा जहां बेगम: महिलाओं की शिक्षा के लिए प्रयास करने वाली की एक अनसुनी नायिका| # IndianWomenInHistory

वाहिदा जहां बेगम: महिलाओं की शिक्षा के लिए प्रयास करने वाली की एक अनसुनी नायिका| # IndianWomenInHistory

अलीगढ़ आंदोलन के कई समर्थक भी महिलाओं के बाहर जाकर पढ़ने के खिलाफ थे। इन सबके बावजूद, शेख अब्दुल्ला और वाहिदा जहां बेगम ने हार नहीं मानी। उन्होंने सबसे पहले लड़कियों की शिक्षा के लिए महिला शिक्षिकाओं को तैयार किया, ताकि परिवारों का भरोसा जीता जा सके।

आज का भारत भले ही आधुनिक और विकासशील हो, जहां महिलाओं की शिक्षा के लिए कई स्कूल और कॉलेज मौजूद हैं, लेकिन यह स्थिति हमेशा ऐसी नहीं थी। एक समय था जब महिलाओं को पढ़ने के लिए समाज से लंबा और कठिन संघर्ष करना पड़ता था। इस बदलाव के पीछे कई समाज सुधारकों की अहम भूमिका रही, जिनमें ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के नाम प्रमुख हैं। फिर भी, शिक्षा में समानता की इस लड़ाई में कुछ ऐसे नाम हैं, जो इतिहास में उतनी पहचान नहीं पा सके। ऐसा ही एक नाम है वाहिदा जहां बेगम का, जिन्होंने मुस्लिम समुदाय की महिलाओं की शिक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गईं।

साल 1874 में दिल्ली के एक ज़मींदार परिवार में सबसे छोटी बेटी के रूप में जन्मी वाहिदा की शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता, मिर्जा मोहम्मद इब्राहिम बेग, जो एक छोटे नगरपालिका अधिकारी थे, ने उनकी पढ़ाई की जिम्मेदारी खुद उठाई। उस समय लड़कियों के लिए औपचारिक शिक्षा के ज्यादा साधन नहीं थे, इसलिए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनकी बेटी उर्दू और फ़ारसी अच्छी तरह सीखे। इसके साथ ही अंकगणित और शुरुआती अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए उन्होंने एक शिक्षिका भी रखी। पिता के प्रयासों से उन्हें उस दौर में शिक्षा पाने का एक बड़ा मौका मिला। इसी अनुभव ने उनके मन में यह सपना जगाया कि समाज की बाकी महिलाओं को भी शिक्षा का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में इस सपने को सच करने की ठानी।

साल 1904 में उन्होंने उर्दू मासिक पत्रिका ‘खातून’ की शुरुआत की। इस पत्रिका का उद्देश्य महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के प्रति समाज को जागरूक करना था। इसके बाद, साल 1906 में उन्होंने मुस्लिम लड़कियों के लिए एक प्राथमिक विद्यालय शुरू किया, जिसमें शुरुआत में केवल 7 छात्राएं थीं। धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर साल 1909 तक लगभग 100 हो गई।

स्कूल की शुरुआत

शुरुआत में उन्होंने अपने घर के आस-पास काम करने वाले लोगों के बच्चों को इकट्ठा करके पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका यह प्रयास एक छोटे से स्कूल का रूप लेने लगा और आस-पास की लड़कियों के बीच लोकप्रिय हो गया। उस समय जब कई समाज सुधारक केवल महिलाओं के लिए स्कूल खोलने की बात कर रहे थे, तब वाहिदा ने अपने छोटे स्तर पर ही इस काम को सच कर दिखाया। उनकी इस कोशिश में उनके जीवनसाथी ने भी उनका साथ दिया। उनकी शादी कश्मीरी वकील शेख अब्दुल्ला से हुआ, जो महिलाओं की शिक्षा के पक्षधर थे। वे अलीगढ़ आंदोलन से जुड़े थे और सर सैयद अहमद खान के विचारों से प्रभावित थे। बाद में उन्होंने मोहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस के महिला शिक्षा विभाग में भी जिम्मेदारी निभाई। शेख अब्दुल्ला जैसे प्रगतिशील विचारों वाले साथी के साथ, उन्होंने अपने सपनों को और मजबूती से आगे बढ़ा सकीं। दोनों ने मिलकर महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए काम किया और अपने सपनों को हकीकत में बदला।

चुनौतियां और उनके समाधान

नॉर्मल स्कूल शुरू करने में असमर्थ रहने पर वाहिदा ने अपने पति को सलाह दी कि वे उच्च वर्ग (शरीफ) की लड़कियों के लिए एक प्राथमिक स्कूल शुरू करें। इसी दिशा में साल 1904 में मोहम्मडन एजुकेशन कॉन्फ्रेंस ने अलीगढ़ में लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का प्रस्ताव पारित किया। वह एक कुशल प्रबंधक और धन जुटाने वाली साबित हुईं। साल 1905 में उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर मुस्लिम महिलाओं की एक बैठक आयोजित की, जो अपने समय की एक ऐतिहासिक और साहसिक पहल थी। इस बैठक में लाहौर और बंबई (मुंबई) जैसे दूर-दराज़ शहरों से भी महिलाएं शामिल हुईं। उस दौर में, जब मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा बहुत सख्त थी, ऐसा आयोजन करना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था।

साल 1905 में उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर मुस्लिम महिलाओं की एक बैठक आयोजित की, जो अपने समय की एक ऐतिहासिक और साहसिक पहल थी। इस बैठक में लाहौर और बंबई (मुंबई) जैसे दूर-दराज़ शहरों से भी महिलाएं शामिल हुईं। उस दौर में, जब मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा बहुत सख्त थी, ऐसा आयोजन करना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था।

अलीगढ़ आंदोलन के कई समर्थक भी महिलाओं के बाहर जाकर पढ़ने के खिलाफ थे। इन सबके बावजूद, शेख अब्दुल्ला और वाहिदा जहां बेगम ने हार नहीं मानी। उन्होंने सबसे पहले लड़कियों की शिक्षा के लिए महिला शिक्षिकाओं को तैयार किया, ताकि परिवारों का भरोसा जीता जा सके। इसी क्रम में, साल 1904 में उन्होंने उर्दू मासिक पत्रिका ‘खातून’ की शुरुआत की। इस पत्रिका का उद्देश्य महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के प्रति समाज को जागरूक करना था। इसके बाद, साल 1906 में उन्होंने मुस्लिम लड़कियों के लिए एक प्राथमिक विद्यालय शुरू किया, जिसमें शुरुआत में केवल 7 छात्राएं थीं। धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर साल 1909 तक लगभग 100 हो गई।

हालांकि, स्कूल शुरू होने के बाद भी चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। पढ़ने जाने वाली लड़कियों को पर्दा प्रथा का पालन करना पड़ता था और रास्ते में असामाजिक तत्वों से परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। इन समस्याओं का समाधान निकालते हुए वाहिदा ने एक बोर्डिंग स्कूल की भी नींव रखी। उन्होंने खुद को इस काम के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया और हॉस्टल में ही रहने लगीं। वे हर छात्रा का ख्याल अपनी बेटी की तरह रखती थीं। उन्होंने खुद भी पर्दा प्रथा का पालन किया, ताकि अभिभावकों का भरोसा बना रहे कि उनकी बेटियां सुरक्षित हैं। उनके इसी स्नेह, समर्पण और मातृत्व भाव के कारण लोग उन्हें प्यार से ‘अला बी’ कहने लगे।

वाहिदा जहां बेगम का निधन 18 अगस्त, साल 1939 को हुआ; और उनकी मृत्यु तक, जिस संस्था को स्थापित करने में उन्होंने मदद की थी, वह एक स्कूल से विकसित होकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंतर्गत डिग्री देने वाले एक महिला महाविद्यालय का रूप ले चुकी थी।

उनका निधन और उनकी विरासत

वाहिदा जहां बेगम का निधन 18 अगस्त, साल 1939 को हुआ; और उनकी मृत्यु तक, जिस संस्था को स्थापित करने में उन्होंने मदद की थी, वह एक स्कूल से विकसित होकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंतर्गत डिग्री देने वाले एक महिला महाविद्यालय का रूप ले चुकी थी। उनकी विरासत सिर्फ एक स्कूल या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सोच में बसती है, जिसने महिलाओं की शिक्षा को समाज में एक अधिकार के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। जिस दौर में महिलाओं के घर से बाहर निकलने तक पर पाबंदी थी, उस समय उन्होंने न केवल लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाज़े खोले, बल्कि समाज की मानसिकता को भी चुनौती दी।

उनके प्रयासों से शुरू हुआ छोटा सा स्कूल आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंतर्गत एक प्रतिष्ठित महिला महाविद्यालय में बदल गया, जो आज भी हजारों छात्राओं को शिक्षा प्रदान कर रहा है। यह उनकी दूरदृष्टि और मेहनत का जीवंत प्रमाण है। उन्होंने यह दिखाया कि शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और बराबरी की ओर बढ़ने का रास्ता है। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को न सिर्फ पढ़ने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी बनाया। आज भी उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सामाजिक बदलाव के लिए साहस, धैर्य और निरंतर प्रयास जरूरी हैं। उनकी विरासत हर उस महिला में दिखाई देती है, जो शिक्षा के माध्यम से अपने जीवन को बदलने का प्रयास कर रही है।

About the author(s)

मैं साक्षी राज शौर्य और साहस की प्रतिमूर्ति कुंवर सिंह की धरती आरा ( बिहार) से हुँ। पत्रकारिता की छात्रा होने के नाते  सामाजिक मुद्दों और जीवन के विविध पहलुओं पर लिखने की गहरी रुचि रखती हुँ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित लेख

Skip to content