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कोरियन पॉप म्यूजिक या ‘के-पॉप’ आजकल दुनियाभर के युवाओं में काफ़ी लोकप्रिय हो रहा है। जिन्हें कोरियन नहीं भी आती हो, वे भी के-पॉप कलाकारों को बड़े चाव से सुन रहे हैं। युवाओं को भी के-पॉप का उतना ही शौक है जितनी अमेरिकन या इंग्लिश संगीत का, और यह शौक सिर्फ़ संगीत तक सीमित नहीं हैं। कोरियन टीवी सीरीज़ (के-ड्रामा), फ़िल्मों और फ़ैशन की भी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ रही है। एक के-पॉप बैंड पिछले कुछ ही सालों में बहुत मशहूर हुआ है और इसका नाम भी शायद आपने सुना होगा। इस बैंड का नाम है: बीटीएस।

बीटीएस का पूरा नाम है ‘बांगतान सोन्येओंदान’, जिसका सीधा अंग्रेज़ी अनुवाद है, ‘बुलेटप्रूफ़ बॉय स्काउट्स’। यह बैंड दक्षिण कोरिया की राजधानी सीओल में साल 2013 में बनाया गया था। सात सदस्यों का यह बैंड अब तक चार बिलबोर्ड म्यूजिक अवॉर्ड, चार अमेरिकन म्यूजिक अवॉर्ड और सात एशियन आर्टिस्ट अवॉर्ड जीत चुका है। गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में 13 बार इसका नाम आ चुका है वह बात अलग है। टाइम मैगजीन ने इस बैंड को ‘पॉप के राजकुमार’ का नाम दिया है और कई लोगों का यह कहना कि बीटीएस ने वह कर दिखाया है जो आज तक के-पॉप इंडस्ट्री का कोई भी कलाकार नहीं कर पाया है। दुनियाभर में इतनी लोकप्रियता अब तक किसी कोरियन संगीत कलाकार को नहीं मिली है, वह भी इस हद तक कि सिर्फ़ युवा ही नहीं बल्कि 50-60 साल के लोग भी उनके गाने सुनते हैं। 

बीटीएस के सदस्य हैं तीन रैपर-किम नामजून (आर.एम.), जुंग हो-सियोक (जे. होप), मिन यूंगी (शुगा)-और चार गायक-पार्क जिमिन, किम ते-ह्युंग (वी), जियोन जुंगकूक और किम सियोक-जिन। क्या खूबी है इन सात लड़कों में जिसकी वजह से पूरी दुनिया उन पर फ़िदा है? संगीत के अलावा भी यह बैंड कुछ ऐसा कर रहा है जो इससे पहले शायद बहुत कम कलाकारों ने करने की कोशिश की है। यह मर्दानगी की परिभाषा बदल रहा है।

तस्वीर साभार: NBC NEWS

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पुरुषों की सुंदरता, उनके व्यवहार के जो मानक हमारे लैंगिक भेदभाव से ओतप्रोत समाज ने तय किए हैं, बीटीएस उन सभी मानकों को तोड़ता नज़र आता है। बैंड के नाम ‘बुलेटप्रूफ़ बॉय स्काउट्स’ के पीछे भी यही मकसद है। रैपर जे.होप कहते हैं, “समाज जो उम्मीदें, जो आलोचनाएं और जो स्टीरियोटाइप्स बंदूक की गोलियों की तरह युवाओं पर बरसाता है, हम अपने आप पर उनका असर नहीं होने देते और अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीते हैं।” बीटीएस के सदस्यों के लिए ‘बुलेटप्रूफ़’ होने का मतलब है संवेदनशील होना, अपनी भावनाएं प्रकट करने से न कतराना और ‘मर्द बनने’ के चक्कर में अपने अस्तित्व को अस्वीकार न करना।

बीटीएस मर्दों की एक नई पीढ़ी का प्रतीक है। एक ऐसी पीढ़ी जिसमें थोड़ा सा मेकअप लगा लेने से मर्द की मर्दानगी कम नहीं हो जाती। जिसमें मर्द ‘लड़कियों की तरह’ चलने, बोलने, हंसने, गाने से संकोच नहीं करते।

ऐसे कम ही सिसजेंडर पुरुष सेलेब्रिटी होंगे जो लिपस्टिक और आईलाइनर लगाकर स्टेज पर आने और हाई हील्स पहनकर नाचने से नहीं शर्माएंगे, या जो इंटरव्यू में बेझिझक यह कहेंगे कि उन्हें मेकअप इतना पसंद है कि वे अपने पापा का भी मेकअप करना चाहते हैं। सिर्फ़ पोशाक के मामले में नहीं, बीटीएस हर तरह से मर्दानगी के कठोर नियमों का उल्लंघन करता है। 

बीटीएस के गाने उनके निजी संघर्षों और समस्याओं की कहानी के साथ-साथ समाज पर एक टिप्पणी भी हैं। उनके गाने मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, स्कूल की ज़िंदगी, किशोरावस्था जैसे विषयों पर हैं। अपने गानों के ज़रिए वे अपनी भावनाएं और अपने अंदर की तकलीफों को दुनिया के सामने प्रकट करने से डरते नहीं हैं। वे एक-दूसरे के लिए अपनी भावनाएं व्यक्त करने से भी नहीं शर्माते। जहां आमतौर पर मर्दों का एक दूसरे के लिए शारीरिक स्नेह जताने को अच्छे नज़र से नहीं देखा जाता, बीटीएस के सदस्य खुलेआम एक दूसरे को माथे पर चूमते हैं, एक दूसरे की तारीफ़ करते हैं, और एक दूसरे को गोद में उठा लेते हैं। समाज चाहे कुछ भी कहे, वे कैमरे के सामने रोने और अपनी भावनाएं खुलकर ज़ाहिर करने में भी नहीं शर्माते।

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जो मर्द ‘मर्दानगी’ की सदियों पुरानी रूढ़िवादी परिभाषा पर खरे नहीं उतरते, जिनकी दाढ़ी-मूंछ नहीं बढ़ती, जो बात- बात पर रो देते हैं और अपना मुंह ढककर हंसते हैं, जो लिपस्टिक लगाना पसंद करते हैं और अपनी तारीफ़ सुनकर शर्मा जाते हैं, उन्हें समाज मर्द नहीं मानता। उन पर ‘छक्का’, ‘मीठा’ जैसी गालियां बरसाई जाती हैं। उन्हें ‘असली मर्द’ बनने की तालीम दी जाती है और कई क्षेत्रों में उनका उत्पीड़न किया जाता है।

बीटीएस मर्दों की एक नई पीढ़ी का प्रतीक है। एक ऐसी पीढ़ी जिसमें थोड़ा सा मेकअप लगा लेने से मर्द की मर्दानगी कम नहीं हो जाती। जिसमें मर्द ‘लड़कियों की तरह’ चलने, बोलने, हंसने, गाने से संकोच नहीं करते। यह आज के ज़माने के मर्द हैं जो सदियों पुराने बंधनों में नहीं बंधना चाहते और अपनी मर्दानगी की परिभाषा खुद लिखना चाहते हैं। उम्मीद है हमें अपने आसपास ऐसे और मर्द देखने को मिलें जो सामाजिक और सांस्कृतिक बंधनों से पूरी तरह आज़ाद हो और ‘मर्द’ बनने की जगह इंसान बनने में जिनका ध्यान ज़्यादा हो।

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तस्वीर साभार : USA Today

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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