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गुजरात दंगों के दौरान पुलिसवालों से गुहार लगाकर रोते हुए क़ुतुबुद्दीन अंसारी की तस्वीर आज भी हमें विचलित करती है। लेकिन हमारे जीवन में हमें शायद ही कोई ऐसी घटना याद हो जहां हमने अपने परिवार के पुरुष सदस्यों को स्वाभाविक तौर पर, सार्वजनिक रूप से रोते-बिलखते या कमजोर पड़ते देखा हो। प्रकृति ने जहां औरत और मर्द में केवल जैविक अंतर किया। वहीं, समाज ने महिला और पुरुषों को उठने, बैठने, बोलने के ढंग, कपड़े, व्यवहार आदि गैर ज़रूरी चीज़ों के आधार पर बांट दिया। यह समझने के लिए कि पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं के जीवन को किस तरह प्रभावित कर रहा है, आपको विशेषज्ञ होने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन समाज में व्याप्त पितृसत्ता से पुरुष भी जाने-अनजाने प्रभावित होते हैं। हम लैंगिक समानता की बात तो करते हैं लेकिन अकसर पुरुषों की भूमिका को नजरंदाज करते हैं। पुरुषों पर पितृसत्ता का और अपने पुरुषत्व के आदर्शों को स्थापित करने का दबाव न केवल महिलाओं और लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार में योगदान देता है। साथ ही यह पुरुषों और लड़कों को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक रूप से भी चोट भी पहुंचाता है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2019 में, महिलाओं के 29.8 प्रतिशत की तुलना में पुरुषों के आत्महत्या का दर 70.2 प्रतिशत था। 2018 में, आत्महत्या का यह आंकड़ा महिलाओं के लिए 31.5 प्रतिशत था। वहीं पुरुषों में यह 68.5 प्रतिशत दर्ज किया गया। 18 से 60 वर्ष से ऊपर के पुरुषों की बात करें तो महिलाओं की तुलना में उनके आत्महत्या की संख्या काफी अधिक है। निश्चित ही हर मृत्यु दुखद होती है, लेकिन इन आंकड़ों से यह जरूर समझ आता है कि पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चुप्पी, एक आदर्श सशक्त पुरुष की छवि और पुरुषत्व के आदर्शों को बरकरार रखने का कितना दबाव है।

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पितृसत्ता पुरुषों को बेहतर और महिलाओं को नीचा दिखाती है और पुरुषों को महिलाओं से बेहतर मानती है। लेकिन यह पुरुषों को पहले से तय मानदंडों में ढलने को मजबूर भी करती है। न केवल पुरुषों को बचपन से ही लैंगिक आधार पर सुविधाएं दी जाती हैं, बल्कि उनसे इस ‘मिथक पुरुषत्व’ को अपनाने और जीने की अपेक्षा की जाती है। भावनाओं को व्यक्त न करना, शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत छवि बनाकर रखना, कभी किसी पर निर्भर न होना, अपनी चुप्पी में पीड़ित होना और किसी भी कीमत पर जीतना, ऐसे ही कुछ मानदंड हैं जो पुरुषों के लिए तय किए गए हैं। यह प्रवृत्ति महिलाओं के सहभागिता और विकास के लिए ही नहीं, पुरुषों के लिए भी नुकसानदायक है।

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पुरुषों और लड़कों का यह समझना ज़रूरी है कि लैंगिक समानता एक प्रगतिशील समाज के लिए आवश्यक है। साथ ही एक समान दुनिया हासिल करने के लिए उन्हें पहले यह महसूस करना होगा कि लैंगिक असमानता की समस्या उनकी समस्या भी है। जिस समाज में लड़कों को लड़कियों के सौंदर्य उत्पादों के इस्तेमाल भर करने से ही हीन दिखाया जाता हो, वहां कल्पना की जा सकती है कि लीक से हटकर सोचने और करने वालों को कितनी सामाजिक अवहेलना का सामना करना पड़ता होगा। यह धारणाएं न केवल लैंगिक मानदंड तय कर देते हैं बल्कि ट्रांस समुदाय या LGBTQAI+ समुदाय के लोगों के प्रति हमें संवेदनहीन बनाते हैं। इन्हीं कारणों से हम अकसर शास्त्रीय नृत्य और शास्त्रीय संगीत से जुड़े पुरुषों को, ‘कमज़ोर’ या ‘छक्का’ कह संबोधित करते हैं। मृदुभाषी और संवेदनशील पुरुष पितृसत्ता समाज के आचार संहिता में है ही नहीं। जहां महिलाओं को सुंदरता के आदर्शों के अनुरूप होना होता है, वहीं पुरुषों को भी ‘माचो’ छवि में फिट होने के लिए मजबूर किया जाता है।

पितृसत्ता पुरुषों को उनके विशेषाधिकार में, उनके प्रभुत्व में, उनके सम्मान में ही सहज रहने की आदत के स्थिति को आरामदायक बनाता है। पुरुषों के लिए, उस ‘साथी’ को ढूंढना आसान है, जो उन सभी चीजों को करेंगे जो वे ‘करना नहीं चाहते या नहीं करेंगे’।

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इन प्रचलित दिशानिर्देशों, पुरुषत्व के आदर्शों और अवधारणाओं के कारण पुरुषों को करियर की पसंद से लेकर कपड़ों की पसंद तक हर चीज में प्रतिबंध है। ध्यान रहे कि हम एक ऐसे समाज की बात कर रहे हैं जो पुरुष और महिलाओं को समान समझे। किसी भी लिंग के लोगों पर किसी प्रकार का लैंगिक प्रतिरोध या उत्पीड़न न हो। ऐसे में, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पुरुष भी पितृसत्तामक नियमों और कायदों का शिकार न हो। आज ‘जनरेशन इक्वलिटी’ की बात हो रही है जहां सिर्फ महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न और हिंसा का अंत नहीं, समान वेतन, अवैतनिक और घरेलू कार्यों के समान बंटवारे, स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं और राजनीतिक जीवन में समान भागीदारी और सभी क्षेत्रों में सभी के निर्णय लेने के अधिकार की नींव रखी जा रही है। इस बुनियादी बदलाव के जरूरत को महसूस करने के कारण ही, केन्या के 40 साल के कार्यकर्ता एरिक #माईड्रेसमाईचॉइस जैसे अभियानों को शुरू करने का साहस दिखा पाएं हैं। लैंगिक भूमिकाओं के रूढ़िवाद को नकारते हुए, विराट कोहली ‘पैटरनल लीव’ ले पाए हैं।

बड़े होने के दौरान हम सब ने कभी न कभी ‘लड़के नहीं रोते’, ‘लड़कियों के जैसा मत रो’, ‘अच्छी लड़कियां शाम के बाद बाहर नहीं जाती’, ‘तुम्हें नौकरी करनी है, इसलिए अच्छे से पढ़ो’ जैसे अनगिनत चीज़ें सुनी होंगी। जिस समय से हम पैदा होते हैं, उसी समय से हमें लैंगिक भूमिका के बारे में सिखाना शुरू कर दिया जाता है। साथ ही यह भी बता दिया जाता है कि बतौर ‘महिला’ या ‘पुरुष’ के रूप में हमारी क्या भूमिका है, कैसे व्यवहार होने चाहिए या क्या विशेषता है। एक ओर जहां ‘स्त्रीत्व’ को परिभाषित किया जाता है, वहीं ‘पुरुषत्व’ को भी संदर्भित किया जाता है।

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साधारणतः हम अपने आप को जिस भी स्थिति में सुविधाजनक पाते हैं, उसी में रहना चाहते हैं। जब कोई स्थिति या चीज हमें पसंद नहीं आती, तो हम अपनी सुविधानुसार अपना क्षेत्र बदल लेते हैं। किसी भी कीमत पर आरामदायक स्थिति में रहने की प्रवृत्ति पुरानी है। पितृसत्ता पुरुषों को उनके विशेषाधिकार में, उनके प्रभुत्व में, उनके सम्मान में ही सहज रहने की आदत के स्थिति को आरामदायक बनाता है। पुरुषों के लिए, उस ‘साथी’ को ढूंढना आसान है, जो उन सभी चीजों को करेंगे जो वे ‘करना नहीं चाहते या नहीं करेंगे’। साथ ही इन विशेषाधिकारों को त्यागना अकसर पितृसत्तात्मक समाज में चुनौतीपूर्ण होता है। पितृसत्तात्मक मानदंडों के अधीन पुरुषत्व की कई नकारात्मक पहलुओं में से एक पुरुषों की एक-दूसरे के साथ लगातार प्रतिस्पर्धा में रहने की प्रवृत्ति भी है।

लैंगिक समानता वाले समाज में, पुरुषों के लिए उनके मानसिक, शारीरिक या आर्थिक जोखिम में कमी और मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने की आज़ादी होगी। इससे न केवल पुरुष सभी रिश्तों का अधिक आनंद लेने में सक्षम होंगे बल्कि महिलाओं और अन्य पुरुषों के साथ भरोसेमंद और सम्मानजनक संबंध की स्थापना कर पाएंगे। उनके पास अपने व्यावसायिक या व्यक्तिगत जीवन के लिए अधिक अवसर होंगे। साथ ही जरूरत है कि हम ‘मर्द को दर्द नहीं होता’, ‘मेन विल बी मेन’ जैसे नकारात्मक सूचकों का इस्तेमाल न करें। किसी भी व्यवसाय को लिंग से न जोड़े। पुरुषों को उनके स्वाभाविक भावों को व्यक्त करने दें। हर समुदाय या लिंग के प्रति समावेशी आचरण अपनाये ताकि आने वाली पीढ़ी को मर्दों वाली क्रीम और आंसू छिपाने वाली प्रणालियों की आवश्यकता न हो। 

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तस्वीर साभार : सुश्रीता भट्टाचार्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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