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यशस्विनी पाण्डेय

धर्म को न मानने वाली एक बिन-ब्याही मां ‘जेसिंडा ऑर्डन’ न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री खुद में एक ऐतिहासिक औरत हैं जिसे हम अपने भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में देश की पॉलिटिक्स या वोट देना तो दूर, अपने घर में घुसने लायक भी न समझें। 21 जून 2018 में जेसिंडा ने एक बेटी को जन्म दिया वो दुनिया में दूसरी ऐसी लीडर हैं जो प्राइम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट का रोल निभाने के दौरान मां बनीं और प्रेगनेंट होते ही लोगों ने पूछा कि क्या वो मैटरनिटी लीव लेंगी? लेंगी तो देश का क्या होगा? जेसिंडा ने एक रेडियो प्रोग्राम में कहा, ‘मैं लीव लूं या न लूं, ये मेरी चॉइस होगी । हर औरत का अधिकार होता है ये चुनना कि वो कितना और कब तक काम करना चाहती है।’

जिस तरह से स्त्रैण समझे जाने वाले गुणों करुणा, संवेदना और कंपैशन को राजनीति की लाइमलाइट में ले आई हैं वह काबिले तारीफ़ है। वरना जिसतरह से राजनीति हमेशा एक मर्दाना इलाक़ा रहा है, वहाँ भाषा से लेकर व्यवहार तक में स्त्रीत्व के लिए कोई खास जगह है नहीं। और है भी तो उसे बहुत बोलने के बहुत अवसर नहीं मिलते या फिर शायद सत्ता में आने के बाद भी वो खुद इस लायक नहीं होतीं कि अपने को बेहतर संतुलित बौद्धिक और कुशल राजनैतिक सामाजिक नेता साबित कर सकें। देश के महत्वपूर्ण और निर्णय लेने वाले पदों पर पुरुष ही आसीन रहते हैं ।

कुछ समय पहले यूनाईटेड नेशन यूनिवर्सिटी के ‘वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’  की एक रिपोर्ट सामने आई है। साल 2018 में हुए इस शोध में सामने आया है भारत में महिला विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा आर्थिक विकास हुआ है। यह शोध महिला विधायकों को चुनने के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करने के लिए किया गया था। ताकि आर्थिक विकास पर एक नेता के लिंग के कारण पड़ने वाले प्रभावों की जांच की जा सके। इस बात से पता चलता है महिलाएं जिस भी काम में हाथ डालती हैं वे उसे पूरी तत्परता और कमिटमेंट से करने की कोशिश करती हैं।

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यह अफसोसजनक है कि महिला विधायकों के इतना बेहतरीन काम करने के बाद भी आम जनता उनकी अपेक्षा पुरुष विधायकों को ही ज्यादा चुनती है।

हालाँकि अपवाद हर जगह है और हर किसी में अपनी दुर्बलताएं हैं पर तुलनात्मक रूप से एकाग्रता और प्रतिबद्धता की बात की जाये तो महिलाएं अक्सर ही बेहतर साबित होती हैं। राजनीति आम महिलाओं के लिए एक नया क्षेत्र है, उसके बावजूद उन्होंने यहां आते ही अपने काम से पहचान बना ली है। लेकिन इसके बावजूद अभी भी समाज राजनीति में महिलाओं को देखने का आदि नहीं है। हाल ही में ‘इंडिया स्पेंड’ नामक एक डेटाएनेलेसिस करने वाली न्यूजसाईट ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में हुए विधानसभा चुनावों पर एक शोध किया है। इसमें सामने आया है कि इस चुनाव में इन पांच राज्यों में चुने गए कुल विधायकों में महिला विधायकों की संख्या सिर्फ नौ प्रतिशत हैं। जबकि 2013-14 में हुए चुनावों में यह संख्या 11 प्रतिशत थी। इनमें मिजोरम में अकेला ऐसा राज्य है जहां महिला उम्मीद्वारों की संख्या बढ़ने के बावजूद आज भी कोई महिला विधायक नहीं है। जबकि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा यानी राज्य के कुल 14 प्रतिशत महिलाएं चुनी गईं।

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इस शोध में सामने आया है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों से महिला मतदाताओं और चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीद्वारों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। लेकिन इस सबके बावजूद महिला विधायक बहुत कम संख्या में चुनी जाती हैं और यह तो तब है जबकि महिला विधायक पुरुष विधायकों से ज्यादा बेहतर काम करती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार महिलाओं और पुरुषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर पाया गया। इस शोध को ज्यादा तथ्यात्मक बनाने के लिए नासा द्वारा ली गई तस्वीरों का भी अध्ययन किया गया था। जिससे महिलाओं और पुरुषों के विधानसभा क्षेत्रों में बिजली के प्रसार का फर्क सामने आया।

तस्वीर साभार : entrepreneur

इन तस्वीरों में पता चला कि महिला विधानसभाओं में न सिर्फ बिजली का प्रसार पुरुष विधानसभाओं से ज्यादा हुआ है, बल्कि सड़क निर्माण में भी वे काफी आगे हैं। महिला निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा अधूरी सड़क परियोजनाओं की संख्या भी 22 फीसद कम पाई गई। लेकिन यह अफसोसजनक है कि महिला विधायकों के इतना बेहतरीन काम करने के बाद भी आम जनता उनकी अपेक्षा पुरुष विधायकों को ही ज्यादा चुनती है और इसका एक महत्वपूर्ण कारण ये है लोगों की मानसिकता कि पुरुष ही इस काम के लिए फिट और बेहतर है और हो सकता है, उसे गलतियाँ करने का हक़ भी है।

क्यों कम चुनी जाती है महिला विधायक ?

  1. महिला उम्मीदवारों से लेकर महिला मतदाताओं तक दोनों ही पक्ष, आज भी राजनीति को सिर्फ पुरुषों का ही कार्यक्षेत्र मानते हैं और उन्हें ही इस क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहयोग करते हैं। इसलिए बतौर नेता महिलाओं की कार्य क्षमता पर समाज के लोगों को अभी भी ज्यादा विश्वास नहीं है, यहां तक की स्वयं महिलाएं भी महिला विधायकों पर भरोसा करके उन्हें वोट नहीं देती क्योंकि पुरुषसत्तात्मक सोच कहीं न कहीं पुरुषों से ज्यादा महिलाओं में होती हैं। आधी आबादी कही जाने वाली महिलाएं भी अपने पिछड़ेपन और समाज और जिंदगी को और बेहतर करने न बना पाने का स्वयं कारण हैं।
  2. महिलाओं को अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने का नुकसान राजनीति में भी भरना पड़ता है। परिवार, पार्टी या फिर अन्य सामजिक समूहों की तरफ से महिला उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के लिए उस तरह से दिल खोल के आर्थिक सहायता नहीं मिलती जैसे की पुरुषों को मिलती है। आर्थिक रूप से पुरुषों की अपेक्षा कमजोर होने के कारण वे अपने लिए बहुत आक्रामक प्रचार नहीं कर पाती। इसका प्रमुख कारण आज भी भारत के हर क्षेत्र में कानून बनने के बाद भी महिलाओं को अपनी सम्पति में आधा हिस्सा उसे नहीं मिलता उसे घर से ही आर्थिक दृष्टि से निर्भर रहने का सिस्टम बनाया गया है।
  3. बड़ी-बड़ी पार्टियां आज भी बहुत कम संख्या में महिलाओं को टिकट देती हैं ‘नेशनल इलेक्शनवाच’ नामक एक संस्था के अनुसार भाजपा और काँग्रेस ने इन पांच राज्यों में सिर्फ 12 प्रतिशत महिलाओं को ही टिकट दिया था। महिलाओं को टिकट देने में राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां ही अभी बहुत ज्यादा उत्साही नहीं दिखाई दे।
  4. चुनावों में जिस तरह से जाति, समुदाय और धर्म का का कार्ड चलता है उस तरह से लिंग कार्ड नहीं चलता। मतलब यह कि आज भी ज्यादातर वोटर अपने समुदाय या जाति के उम्मीदवार को एकजुट होकर वोट देते हैं, लेकिन यह बात महिला उम्मीदवारों पर लागू नहीं होती। महिला मतदाता कभी भी एकजुट होकर महिला उम्मीदवार को वोट नहीं देती क्योंकि आमतौर पर महिलाएं राजनीति और देश की चर्चा नहीं करतीं। यहां एक तथ्य यह भी है की घर-परिवार की महिलाएं अक्सर ही अपनी पसंद से वोट डालने को स्वतंत्र नहीं होती। उन्हें परिवार के मुखिया की पसंद से वोट डालना होता है, अक्सर ही किसी परिवार की वोट सामूहिक रूप से किसी खास मतदाता या पार्टी को डाली जाती है। इस कारण भी महिला उम्मीदवार के पिछड़ने की संभावना बढ़ जाती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार महिलाओं और पुरुषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर पाया गया।

असल में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना उन्हें न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत करेगा बल्कि देश में सामाजिक संतुलन व शांति की संभावना भी बढ़ जाएगी। इसके लिए बड़ी राजनीतिक पार्टियों को पहल करनी। पहले तो सालों से लटके महिला आरक्षण बिल को ही पारित करना होगा।

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निश्चित तौर पर यह आरक्षण बिल राजनीति में महिलाओं की भूमिका और सक्रियता बढ़ाने में सहयोगी साबित होगा। इसके साथ ही महिलाओं को भी राजनीति को करियर के तौर पर देखना शुरू करना होगा। उन्हें इन पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होना चाहिए कि राजनीति उनके वश का नहीं, उनमे इतनी योग्यता नहीं, या उसमे केवल शोषण ही है। शोषण तो उनका परिवार, समाज व ऑफिस में भी किसी न किसी का स्तर पर होता है। बल्कि शोषण सबके जीवन में किसी न किसी स्तर पर है इसलिए महिलाओं को सबसे पहले तो मानसिक रूप से खुद को तैयार करना होगा खुद को इस योग्य पहचानने का कि उसकी सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक योग्यता और प्रतिभा कितनी है? और कैसे और निखारनी है? अपने स्त्री के गुणों भी साथ में निखारते हुए।

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यह लेख यशस्विनी पाण्डेय ने लिखा है, जिसे इससे पहले स्त्रीकाल में प्रकाशित किया जा चुका है।

तस्वीर साभार : abc.net

'स्त्रीकाल', स्त्री का समय और सच हिन्दी में स्त्री मुद्दों पर एक ठोस वैचारिक पहल है, जिसने पाठकों और अध्येताओं का विश्वास हासिल करने में सफलता पाई है। इस अनियतकालीन पत्रिका का हर अंक संग्रहणीय रहा है। अब तक हमने स्त्रीकाल के कई अंक प्रकाशित किये हैं , जिनमें स्त्री सत्ता : यथार्थ या विभ्रम , वैयक्तिक , राजनीतिक और दलित स्त्रीवाद विशेषांक क़ॆ रूप में प्रकाशित हुए हैं |

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