बात साल 2021 की प्रभावशाली महिला नेताओं की
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समाज में लैंगिक समानता हो; इसके लिए यह जरूरी है कि महिलाओं को हर क्षेत्र में भागीदारी करने की आज़ादी और अवसर मिले। इन सबमें राजनीति एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। राजनीति में महिलाओं का होना इसलिए भी जरूरी है ताकि नीति निर्माण में महिलाओं के समस्याओं या जरूरतों को नज़रअंदाज़ न किया जा सके। हालांकि, आज देश के चुनावों में महिला मतदाताओं के संख्या में सुधार हुआ है, लेकिन राजनीतिक भागीदारी में सुधार न होने की वजह हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था है। यह व्यवस्था आम तौर पर किसी महिला को नेतृत्व और निर्णय लेने की भूमिका में अपना नहीं पाता। सालों से भारतीय राजनीति को महिलाओं के लिए अनुचित बताया गया है। भारतीय सिनेमा में भी, किसी सशक्त राजनीतिक महिला किरदार को अगर पर्दे पर लाया गया भी हो, तो उसके पीछे किसी ‘पुरुष गॉड फादर’ का योगदान दिखाया जाता है। युग बदलते रहे, लेकिन भारतीय राजनीति का परिवेश और लोगों की मानसिकता नहीं। लेकिन साल 2021 में ऐसी कई महिला नेता अपने योगदान के लिए जानी गई। आज हम उन महिलाओं के बारे में जानेंगे जिनका नाम भारतीय राजनीति में उल्लेखनीय रहेगा।

1. के के शैलजा

के.के शैलजा के बहाने वामपंथ में निहित पितृसत्त्ता की बात
के.के शैलजा के बहाने वामपंथ में निहित पितृसत्त्ता की बात

शैलजा टीचर’ के नाम से लोकप्रिय, 64 वर्षीय केके शैलजा साल 2004 में राजनीतिक क्षेत्र में शामिल हुईं। उन्होंने रसायन विज्ञान में स्नातक किया और साल 1980 में बीएड किया। इसके बाद शैलजा कन्नूर के शिवपुरम हाई स्कूल में भौतिक विज्ञान शिक्षिका के रूप में काम करती रहीं। बतौर शिक्षिका सात साल काम करने के बाद, वह पूरी तरह राजनीति में आ गई। साल 2016 में वह पिनाराई विजयन के सरकार में मंत्री बनीं। शैलजा साल 2018 में निपाह वायरस के रोकथाम में अपने अभूतपूर्व काम के लिए जानी जाती हैं। इसके बाद, कोविड-19 के रोकथाम में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत में कोरोना महामारी का पहला मामला दर्ज होने से पहले ‘आपातकाल की स्थिति’ घोषित करने और कोविड -19 वार रूम स्थापित करने वाली वह पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं। शैलजा को संयुक्त राष्ट्र ने कोरोना महामारी से निपटने में उनके प्रयासों के लिए सम्मानित किया। वह संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा दिवस के अवसर पर आमंत्रित किए गए चुनिन्दा विश्व नेताओं में से एक थीं। केके शैलजा को साल 2021 में सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी (सीईयू) ओपन सोसाइटी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

2.  वीणा जॉर्ज

तस्वीर साभार: Wikipedia

वीणा जॉर्ज केरल की वर्तमान स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री हैं। वह केरल के अराणमूला विधान सभा क्षेत्र से सीपीआई(एम) का प्रतिनिधित्व करती हैं। कॉलेज के दिनों में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की कार्यकर्ता रह चुकी जॉर्ज ने पहली बार साल 2016 के विधानसभा चुनाव अराणमूला सीट से लड़ा था। इस चुनाव में उन्होंने वरिष्ठ कांग्रेस नेता शिवदासन नायर को हराया था। केरल के राजनीतिक जीवन में पूरी तरह आने से पहले जॉर्ज कैराली टीवी, मनोरमा न्यूज़ और रिपोर्टर टीवी जैसे लोकप्रिय मलयालम समाचार चैनलों के साथ बतौर पत्रकार काम कर चुकी हैं। वह 16 सालों से भी अधिक समय से प्रमुख मलयालम समाचार चैनलों के साथ काम कर चुकी हैं। मलयालम समाचार चैनलों की वह पहली महिला एग्जिक्यूटिव एडिटर रह चुकी हैं।

3.  सीके आशा

तस्वीर साभार: फेसबुक

सीके आशा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की सदस्य और केरल के वायकोम क्षेत्र की विधायक हैं। वह साल 2021 के केरल विधानसभा चुनाव में वायकोम निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ीं और कांग्रेस नेता पीआर सोना को हराकर जीत हासिल की। वह साल 2016 में केरल की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार के 11 फीसद महिला मंत्रियों में से एक रह चुकी हैं। कोट्टायम का वायकोम विधानसभा क्षेत्र में साल दर साल सीपीआई जीतती रही है। वायकोम में सीपीआई ने अब तक 12 विधानसभा चुनाव और एक उपचुनाव जीता है। इसलिए आशा का सीपीआई पार्टी से इस क्षेत्र के लिए चुनाव लड़ना और जीत, दोनों ही केरल के इतिहास में महत्वपूर्ण रहा है।

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4.  केके रीमा

तस्वीर साभार: अमर उजाला

के के रीमा रेवोल्यूश्नरी मार्कसिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (आरएमपीआई) की कार्यकर्ता है। आरएमपीआई के संस्थापक स्वर्गीय टी. पी. चंद्रशेखरन की पत्नी रीमा निर्वाचन क्षेत्र से जीतने वाली पहली महिला कम्युनिस्ट हैं। रीमा साल 2021 के केरल विधानसभा चुनाव के दौरान वडकारा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ी और जीत हासिल की। उन्होंने एसएफआई के राज्य उपाध्यक्ष के रूप में काम किया और 90 के दशक में राज्य समिति की सदस्य थीं। वह पिछले एक दशक में केरल में राजनीतिक हत्या और बलात्कार की संस्कृति और महिलाओं के अधिकारों के लिए एक सशक्त आवाज़ बन कर उभरी हैं।

5.  नुसरत जहान

नुसरत जहान और बच्चे के पिता का नाम जानने को बेचैन हमारा पितृसत्तात्मक समाज
तस्वीर साभार: NDTV

नुसरत जहान बंगला फिल्म अभिनेत्री और राजनीतिज्ञ हैं। वह साल 2019 में सक्रिय रूप से राजनीति में शामिल हुई। जहान साल 2019 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में पश्चिम बंगाल के नॉर्थ 24 परगना के बशीरहाट निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सदस्य के रूप में चुनी गई। जहान का जन्म कोलकाता, पश्चिम बंगाल में पिता मुहम्मद शाहजहाँ और माँ सुषमा खातून के घर हुआ। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा कोलकाता के आवर लेडी क्वीन ऑफ़ द मिशन्स स्कूल में पूरी की। इसके बाद उन्होंने कोलकाता के भवानीपुर कॉलेज से स्नातक किया। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी ने जहान की शादी, या बाद में उस शादी का अवैध घोषित होना या उनके बच्चे के ऊपर कई सवाल खड़े किए। राजनीतिक चर्चों का हिस्सा रह चुकी जहान हमेशा ही अपने निजी और वैवाहिक जीवन के बारे में मुखर रही हैं। अपनी शादी और बच्चे के लिए विवादों में घिरी जहान मीडिया और समाज के दबाव के बाद भी अपने बच्चे को लेकर पीछे नहीं हटीं। ट्विटर पर इस शादी को अमान्य बताने के बाद, सामाजिक पूर्वाग्रह, राजनीतिक दबाव और रूढ़िवाद आदि सबका उन्होंने सामना किया। विपक्षी पार्टियों ने कभी उनके सिंदूर लगाने, कभी शादी और कभी पहनावे पर टिप्पणियां तक कीं।

6.  लतिका सुभाष

तस्वीर साभार: ट्विटर

लतिका सुभाष का जन्म साल 1964 में पेरुम्बाएकाडु, केरल में हुआ। वह केरल के कांग्रेस पार्टी की पूर्व महिला कांग्रेस प्रमुख रह चुकी हैं। सालों से कांग्रेस के साथ जुड़े रहने के बाद, हाल ही में, लतिका ने केरल विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने पर पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने शरद पवार के राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल होने की संभावना भी जाहिर की थी। हालांकि द इंडियन एक्सप्रेस के एक रिपोर्ट मुताबिक, लतिका ने बाद में घोषणा की कि वह एट्टूमानूर से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ेंगी। कांग्रेस से उनके निर्वाचन क्षेत्र एट्टूमानूर के लिए टिकट नहीं दिए जाने पर, उन्होंने विरोध में न सिर्फ अपने पद से इस्तीफा दे दिया बल्कि तिरुवनंतपुरम के कांग्रेस कार्यालय के सामने अपना सिर मुंडवा लिया। उनके बयान मुताबिक यह विरोध सोनिया गांधी या राहुल गांधी के विरुद्ध नहीं, बल्कि राज्य के कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व के खिलाफ था जिन्होंने पार्टी में महिलाओं की संख्या को बढ़ने नहीं दिया।

7.  यू प्रतिभा

तस्वीर साभार: विकीपीडिया

यू प्रतिभा केरल के अलाप्पुझा जिले के कायमकुलम निर्वाचन क्षेत्र की विधायक हैं। उनका जन्म अलाप्पुझा जिले के थाकाज़ी गांव में हुआ। वह साल 2010 से 2015 तक अलाप्पुझा जिला पंचायत की अध्यक्ष रहीं और साल 2005 से 2010 के दौरान थाकाज़ी ग्राम पंचायत की अध्यक्ष थीं। उन्होंने साल 2021 केरल विधानसभा चुनाव में, कांग्रेस के अरिथा बाबू के खिलाफ जीत हासिल की। हाल ही में, गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल रामपुरम ने यू प्रतिभा के विधायक फ़ंड से आवंटित 12.33 लाख की लागत से अपने पुस्तकालय को डिजिटल पुस्तकालय में बदलने का काम किया।

8.  शशि पांजा

तस्वीर साभार: टेलिग्राफ

शशि पांजा पश्चिम बंगाल की महिला एवं बाल विकास और समाज कल्याण मंत्री हैं। पांजा एक चिकित्सक भी हैं। उन्होंने अल्ट्रासाउंड और इन्फर्टिलिटी प्रैक्टिस में विशेषज्ञता के साथ कोलकाता के आरजी. कर. मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से एमबीबीएस किया है। साल 2010 में पांजा कोलकाता नगर निगम की पार्षद चुनी गई और उन्हें शिक्षा विभाग के प्रभारी मेयर परिषद सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था। साल 2011 में वह पश्चिम बंगाल के श्यामपुकुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनी गईं। साल 2016 और हालिया विधानसभा चुनाव में वह फिर उसी निर्वाचन क्षेत्र से चुनी गईं। साल 2013 में उन्हें पश्चिम बंगाल के मंत्री परिषद में शामिल किया गया और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दिया गया। साल 2014 में, उन्हें सामाज कल्याण विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। हाल ही में हुए कोलकाता नगर निगम चुनाव में पांजा की बेटी पूजा पांजा को भी टीएमसी के ओर से टिकट दिया गया।

9.  आरती देवी

तस्वीर साभार: ट्विटर

आरती देवी ओडिशा के गंजम जिले के धुनकापाड़ा पंचायत से भारत की सबसे कम उम्र की सरपंच रह चुकी हैं। उनका नाम साल 2014 में राजीव गांधी नेतृत्व पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। आरती गंजम जिले में पली-बढ़ी और प्रारंभिक स्कूली शिक्षा इसी जिले से की। उन्होंने बेहरामपुर विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक की पढ़ाई की और सिक्किम मणिपाल विश्वविद्यालय से एमबीए भी किया। पूरी तरह से राजनीतिक जीवन में आने से पहले, आरती अपने करियर की शुरुआत एक बैंककर्मी के रूप में की थी। साल 2012 में, आरती ने बेहरामपुर के आईडीबीआई बैंक में निवेश अधिकारी की नौकरी छोड़ दी और पंचायत चुनाव में खड़ी हुई और सरपंच चुनी गई। साल 2014 में, आरती को अमेरिका में तीन सप्ताह के अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। वह संयुक्त राज्य के आयोजित राज्य और स्थानीय सरकार के वर्तमान और उभरते नेताओं के लिए इंटरनेश्नल विसिटर्स लिडरशिप प्रोग्राम (आईवीएलपी) के लिए चुनी गई वह एकमात्र भारतीय थीं। आरती ग्रामीण स्तर पर महिलाओं की शिक्षा में सुधार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कारगर बनाने में सफल रही हैं। उन्होंने महिलाओं के लिए टीपा नुहे दस्तखत (अंगूठे का निशान नहीं, केवल हस्ताक्षर) के नाम से पंचायत में महिलाओं के लिए एक प्रमुख साक्षरता अभियान शुरू किया। इसके अलावा वह गाँव में पक्की सड़कें, बिजली, स्कूलों में शिक्षकों के खाली पदों में भर्ती, पंचायत सभाओं में महिलाओं के भाग लेने, पंचायत में 1.5 लाख से अधिक पेड़ लगाने और लोक कला को दोबारा पटरी पर लाने में अपने योगदान के लिए जानी जाती हैं।


नोट : यह सूची अपने आप में संपूर्ण नहीं हैं। ऐसी कई और प्रभावशाली नेता हमारे देश में मौजूद हैं जो लगातार अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं।

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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