इंटरसेक्शनलजेंडर महिलाओं और हाशिये के वर्ग के जीवन में डिजिटल ट्रेनिंग के ज़रिये बदलाव लाता ‘सूचनाप्रेन्योर’

महिलाओं और हाशिये के वर्ग के जीवन में डिजिटल ट्रेनिंग के ज़रिये बदलाव लाता ‘सूचनाप्रेन्योर’

सूचनाप्रेन्योर कार्यक्रम लोगों की सूचना से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह एक ग्रामीण इंटरप्रेन्योरशिप बेस्ड प्रोजेक्ट है जो ग्रामीण भारत के लोगों को सशक्त करने कि दिशा में काम करता है।

आज लोगों का जीवन पूरी तरह बदल गया है, जिसकी बड़ी वजह डिजिटल तकनीक है। डिजिटल तकनीक के द्वारा लोगों का जीवन आसान हो रहा है और आजीविका के नये-नये साधन पैदा हो रहे हैं। डिजिटल तकनीक की इस परिधि ने हर वर्ग के लोगों के जीवन में अनेक बदलाव लाए हैं। तकनीकी विकास धीरे-धीरे महिलाओं के सशक्तिकरण का माध्यम भी बनता जा रहा है। ग्रामीण से लेकर शहरी वर्ग तक की महिलाएं अपने रोज़मर्रा के जीवन में इससे जुड़कर छोटे-बड़े स्तर पर बदलाव ला रही हैं।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में डिजिटल असमानता

भारत में इंटरनेट के उपभोक्ता लगातार बढ़ रहे हैं। टेलीकॉम रेग्युलेरिटी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) के अनुसार मार्च 2021 तक भारत में 82.5 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता मौजूद हैं। हालांकि, भारत में अभी भी एक बड़ी आबादी इंटरनेट की पहुंच से दूर है। ख़ासकर बात अगर हम क्षेत्रीयता और जेंडर के आधार पर करे तो बड़ी संख्या में आज भी महिलाओं के हाथ में विशेषकर, ग्रामीण क्ष्रेत्र की महिलाओं के हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट नहीं पहुंच पाया है।

डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन ने समाज में हाशिये पर रहनेवाले लोगों के उत्थान के लिए साल 2016 में ‘सूचनाप्रेन्योर प्रोग्राम’ की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को सूचना क्रांति में शामिल करके उनके जीवन स्तर को बेहतर करना है। यह प्रोजेक्ट पंचायत स्तर पर विशेष तौर पर ग्रामीण लोगों तक सूचना सुविधाएं मुहैया करवाता है। 

भारत में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में डिजिटल माध्यमों की पहुंच में बहुत बड़ा अंतर है। इस अंतर की बात करें तो टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी ख़बर के अनुसार भारत में ग्रामीण क्षेत्र के केवल चार प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर की पहुंच है। वहीं शहरों में यह दर 23.4 प्रतिशत है। एनएसओ के आंकड़ों के अनुसार शहरी क्षेत्र में 42 प्रतिशत आबादी की पहुंच इंटरनेट तक है। ग्रामीण क्षेत्र में केवल 14.9 फीसद लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाते हैं। आईटीयू वर्ल्ड टेलीकम्यूनिकेशन के अनुसार भारत में केवल 43 फीसदी आबादी के पास इंटरनेट की पहुंच है।

कैसे इंटरनेट पहुंच सब तक सुनिश्चित कर रहा है डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन

सूचना और तकनीक के क्षेत्र तक सबकी सामान पहुंच बनाने के लिए अनेक संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं। उनमे से एक डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन (डी.ई.एफ.) का प्रयास सराहनीय है जो हर क्षेत्र, वर्ग के लोगों को सूचना से जोड़ने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है। डी.ई.एफ. डिजिटल तकनीक के माध्यम से लोगों तक सूचना की पहुंच, डिजिटल शिक्षा और डिजिटल सशक्तिकरण का काम कर रहा है। इस संस्था का मुख्य काम डिजिटल माध्यमों तक सबकी समान और आसान पहुंच सुनिश्चित करना है। 

सूचनाप्रेन्योर प्रोग्राम का उद्देश्य जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, आजीविका, आर्थिक समावेशन और रोज़गार के क्षेत्र में जानकारी देना और अधिकारों तक लोगों की पहुंच करना है।

यह संगठन पिछले 20 सालों से स्थानीय समुदायों में डिजिटल शिक्षा, सभी तक सूचनाओं तक पहुंच, डिजिटल आंत्रप्रन्यूर्शिप, इंटरनेट का सही प्रयोग, डिजिटल स्वास्थ्य और डाटा के सही प्रयोग आदि क्षेत्रों में काम करके कर रहा है। डी.ई.एफ. भारत के 24 राज्यों के 135 जिलों के ग्रामीण, आदिवासी, हाशिये के समूह और दूर-दराज़ के क्षेत्रों अपने सूचना केंद्रों के माध्यम से डिजिटल सेवाएं प्रदान कर रहा है। इस पहल से अब तक 30 मिलियन लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं जिनमें गरीब, महिलाएं, युवा, विकलांग, स्थानीय कारीगर आदि शामिल हैं। 

सामाजिक स्तर पर बदलाव समय के साथ लगातार बढ़ रहा है लेकिन इसमें स्थान लिंग, वर्ग, समुदाय स्तर पर लोगों में अंतर भी बढ़ रहा है। इसी अंतर को खत्म करने के लिए डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन ने समाज में हाशिये पर रहनेवाले लोगों के उत्थान के लिए साल 2016 में ‘सूचनाप्रेन्योर प्रोग्राम’ की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को सूचना क्रांति में शामिल करके उनके जीवन स्तर को बेहतर करना है। यह प्रोजेक्ट पंचायत स्तर पर विशेष तौर पर ग्रामीण लोगों तक सूचना सुविधाएं मुहैया करवाता है। 

क्या है सूचनाप्रेन्योर कार्यक्रम

सूचनाप्रेन्योर कार्यक्रम लोगों की सूचना से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह एक ग्रामीण इंटरप्रेन्योरशिप बेस्ड प्रोजेक्ट है जो ग्रामीण भारत के लोगों को सशक्त करने कि दिशा में काम करता है ताकि ग्रामीण लोग जानकारी के अभाव से बाहर निकलकर सार्वजनिक सेवाओं का लाभ उठा सकें और जीवन को बेहतर कर सकें। यह प्रोजेक्ट ग्रामीण युवाओं, विशेषकर महिलाओं और विकलांग लोगों द्वारा चलाया जा रहा है जो सूचना सेवक (सूचनाप्रेन्योर) के रूप में बदलाव के वाहक बन रहे हैं।

सूचनाप्रेन्योर प्रोग्राम का उद्देश्य जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, आजीविका, आर्थिक समावेशन और रोज़गार के क्षेत्र में जानकारी देना और अधिकारों तक लोगों की पहुंच करना है। इस प्रोजक्ट के तहत समुदाय के उद्यमी युवाओं को पहचान कर उनको सूचना प्रन्योर (सूचना उद्यमी) बनने की ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद उन्हें एक एंड्रॉयट टैबलेट और मीरा ऐप (मोबाइल फोन एप्लीकेशन) से लैस किया जाता है। इस ऐप में बहुत सी जानकारी के साथ जन कल्याणकारी योजनाओं के बारे में पता चलता है। सूचना प्रेन्योर, घर-घर जाकर इच्छुक परिवारों को जन कल्याणकारी योजनाओं जिनके लिए वे योग्य हैं उनके लिए आवेदन करने में मदद करते हैं।

पश्चिमी बंगाल के मालदा के रहनेवाले सूचनाप्रेन्योर मौ. माबुद अली का कहना है, “विकलांग होना मेरे लिए जीवन में अभिशाप जैसा था। बहुत से लोग मुझे देखकर मेरी मजाक उड़ाते थे। जब मैं पढ़ रहा था तब भी अन्य विद्यार्थी मुझे देखकर मेरी हंसी उड़ाते थे। लेकिन मैंने कभी इन चीजों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और अपने रास्ते चलता रहा। जब मैं पढ़ रहा था मेरी कमाई का कोई ज़रिया नहीं था। उस समय डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन ने मुझे कम्प्यूटर, प्रिंटर और अन्य सामान दिया। सूचनाप्रेन्योर के रूप में मुझे खुद का कम्प्यूटर सेंटर खोलने का मौका दिया। आज इस कम्प्यूटर सेंटर से मेरी अच्छी आमदनी होती है और समाज में भी मुझे बहुत सम्मान और आदर से देखा जाता है।” 

सूचनाप्रेन्योर योजना का विस्तार

सूचनाप्रेन्योर योजना का मुख्य उद्देश्य सूचना के इको-सिस्टम को मज़बूत कर उसमें ग्रामीण क्षेत्र के अनेक समुदाय और वर्ग के लोगों को शामिल करना है। डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल करते हुए उद्यम को स्थापित कर दलित-पिछड़े वर्ग की महिलाओं और विकलांग लोगों को डिजिटल अवसर प्रदान करना है। सूचना प्नन्योर ग्रामीण सूचना सेवाओं को स्थापित कर हर समुदाय और वर्ग को डिजिटल शिक्षा और सेवाओं से जोड़ते है। इस क्रार्यक्रम में अब तक 25000 से अधिक महिलाओं को डिजिटल एंट्रोप्रेनर्स की ट्रेनिंग प्रदान की गई है। साथ ही इस कार्यक्रम से पंद्रह मिलियन से अधिक ग्रामीण महिलाएं लाभ ले चुकी हैं। साथ ही 2000 से अधिक सूचना प्रेन्योर सेंटर के ज़रिये विशेषतौर पर समाज में हाशिये पर जीवन जीनेवाले लोगों को डिजिटल शिक्षा देकर उन्हें काम करने के लिए सक्षम बनाया जा रहा है।

किस तरह से औरतें और युवा लड़कियों के जीवन में बदलाव ला रही है यह डिजिटल ट्रेनिंग

डी.ई.एफ प्रोग्राम के तहत ट्रेनिंग हासिल करने वाली हरियाणा के नूह की रहनेवाली बबली बताती हैं, “मैं समाज के उस हिस्से से आती हूं जहां लोगों की सोच यह है कि एक महिला शादी करने, साफ-सफाई करने, बच्चे को जन्म देने और उनकी देखभाल करने के लिए बनी है। एक महिला होने के नाते यह सबकुछ मुझे हमेशा परेशान करता था। बचपन से मैंने बहादुर रानियों और देवियों की कहानी सुनी थी जिनका सब सम्मान करते थे लेकि जब मैं अपने गांव में देखती की यहां महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है। यहां तक कि मेरा जीवन भी ऐसा ही होता।”

आगे उनका कहना है, “एक दुर्घटना ने मेरे पति को शारीरिक रूप से विकलांग बना दिया। उन्हें अपनी प्राइवेट नौकरी छोड़नी पड़ी और हमारे सामने भविष्य को लेकर बहुत चिंताएं पैदा हो गई। लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी। मेरी सिलाई में बहुच रुचि थी। मेरी ससुराल में एक सिलाई मशीन थी जो मेरी सास के गुजर जाने पर कभी इस्तेमाल नहीं हुई थी। मेरी पड़ोसी सुशीला ने मुझे डीईएफ प्रोग्राम के बारे में जानकारी दी। मुझे अभी भी याद है कि घर से बाहर निकलते हुए मैं कितना घबराई हुई थी। बुजुर्ग पुरुष मुझे घूर रहे थे। लेकिन ये एक कदम जो मुझे आगे बढ़ने के लिए लेना ही था। बाद में बहुत मेहनत और ट्रेनिंग के बाद मैंने अलग-अलग तरह के हैंडबैग्स सिलने शुरू किए। मेरी मेहनत की वजह से धीरे-धीरे मेरे काम काम को पहचान मिल गई। मुझे आसपास के गांव-कस्बों से बड़े आर्डर मिलने शुरू हो गए। इन सबसे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने इन बैग्स का ब्रांड बनाकर बेचना शुरू किया। आज, मैं अपने पूरी परिवार की आर्थिक तौर पर मदद कर पा रही हूं और अपनी दुकान खोलना चाहती हूं। ज्यादा पैसे कमाकर अपनी बेटी को अच्छा पढ़ाना चाहती हूं। डीईएफ ने मेरी परेशानियों और डर को दूर किया है।”

मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट 2022 के अनुसार भारत में 83 प्रतिशत पुरुषों के पास खुद का मोबाइल है। वहीं, महिलाओं में यह दर 71 फीसदी है। मोबाइल ओनरशिप के मामले में पुरुषों और महिलाओं के बीच 14 प्रतिशत का अंतर है। बात जब फोन में इंटरनेट इस्तेमाल की आती है तो इसमें महिलाएं काफ़ी पीछे रह जाती हैं। मोबाइल फोन रखने वाले पुरुषों में से 51 प्रतिशत इंटरनेट का इस्तेमाल करते है। यह दर महिलाओं में केवल 30 प्रतिशत है। महिला और पुरुष तक इंटरनेट की पहुंच में 41 फीसद का अंतर है।

सूचना प्रेन्योर के तहत मिली ट्रेनिंग महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसके माध्यम से महिलाओं को सूचना तकनीक से जोड़ा जा रहा है। इसमें महिलाएं को डिजिटल माध्यमों को चलाने की ट्रेनिंग और जीवन में उन्हें इस्तेमाल कर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। भारत में महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले डिजिटल माध्यमों से कम जुड़ी हुई हैं इस अंतर को खत्म करने के लिए ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को इंटरनेट की शिक्षा दी जा रही है। ग्रामीण भारत में रहने वाले महिलाओं के उत्थान के लिए सूचना और तकनीक के माध्यमों का इस योजना के तहत विशेष तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। 

सूचना प्रेन्यौर के तहत मिली ट्रेनिंग के द्वारा महिलाओं को डिजिटल साक्षर बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रहा है। इसके तहत महिलाओं को विशेषतौर पर कम्प्यूटर और इंटरनेट से जोड़कर उन्हें कई तरह के काम सिखाएं जा रहे हैं। ट्रेनिंग पूरा करने के बाद वे स्वयं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के साथ साथ अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो रही हैं। सूचना प्रेन्योर के तहत मिली ट्रेनिंग से घर में रहकर भी महिलाएं अपना काम शुरू कर रही हैं। 


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