संस्कृतिकिताबें साहित्य लेखन में महिला लेखिकाओं के समक्ष चुनौतियां

साहित्य लेखन में महिला लेखिकाओं के समक्ष चुनौतियां

हिंदी साहित्य में इस्मत चुग़ताई का उदाहरण लें तो उनकी लिखी “लिहाफ” कहानी को अश्लीलता के आरोपों का सामना करना पड़ा और उन्हें अदालतों में अपने लेखन का बचाव करना पड़ा। हिंदी लेखिका महादेवी वर्मा ने भी अपनी लेखनी के शुरुआती दौर में इसी संघर्ष का सामना किया।

“आप चाहें तो अपने पुस्तकालयों में ताले जड़ दें लेकिन मेरे मस्तिष्क की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाने के लिए न कोई दरवाजा है, न ताला और न ही कोई कुंडी। लेखिका वर्जीनिया वुल्फ का यह विचार केवल भारत में ही नही, बल्कि विश्वभर में सत्य है कि महिलाओं की भागीदारी सरकारी, गैर सरकारी नौकरियों और व्यवसायों में निश्चित रूप से बढ़ी है परंतु साहित्य के क्षेत्र में अभी भी महिलाओं को लंबी और कठिन लड़ाई लड़नी है। क्योंकि न केवल लेखन के क्षेत्र में पुरूषों का एकाधिकार है बल्कि प्रकाशन और लोकप्रियता में भी पुरुष प्रधान समाज ने महिलाओं को हाशिए पर रखा है। अगर यह सब बाधाएं पार हो जाए तो भी महिला लेखकों का चरित्र हनन कर उन्हें लिखने से हतोत्साहित किया जाता है। महिला लेखिकाओं के संघर्ष कई स्तर पर है।

लेखन की स्वतंत्रता एवं स्त्री संघर्ष

पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं को लेखन की न्यूनतम सुविधा प्रदान की है अर्थात ऐसी संरचनाएं एवं परिस्थितियां निर्मित की गई हैं जिनमें महिलाओ के लिए लेखन एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है। वर्जीनिया वुल्फ अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “रूम ऑफ वनस ओन” में दलील पेश करती है कि महिला द्वारा कुछ भी लिखने के लिए अति आवश्यक है “पैसा और अपना कमरा” होना। उनका मानना है जब आपके पास पैसा होगा तो आप बिना आजीविका की चिंता किए निश्चिंत होकर लंबे समय तक लिख सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ अपना कमरा होना इसलिए आवश्यक है ताकि महिलाओं के पास स्वतंत्रता से चिंतन करने का निजी स्थान हो जहां वो नए नए विचारों को संग्रहित कर रचनात्मक लेखन का रूप दें सके। परंतु एतिहासिक समय से महिलाओं को घर का अवैतनिक श्रम सौंप और पुरूषों पर आश्रित कर उन्हें वित्तीय स्वायत्तता तथा स्वयं के लिए जीने से वांछित रखा गया।

जब भी एक स्त्री कुछ बेहद सृजनात्मक विषयों पर लिखती है तो उसे उनके व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ दिया जाता है और मान लिया जाता है कि ये उनकी आपबीती है। जैसे नमिता गोखले ने “पारो” नामक उपन्यास लिखा जो बहुत चर्चित हुआ परंतु इसे लेखिका के निजी जीवन के साथ जोड़ दिया गया और फिर शुरू हुआ त्रासदियों का सिलसिला।

हिंदी साहित्य में इस्मत चुग़ताई का उदाहरण लें तो उनकी लिखी “लिहाफ” कहानी को अश्लीलता के आरोपों का सामना करना पड़ा और उन्हें अदालतों में अपने लेखन का बचाव करना पड़ा। हिंदी लेखिका महादेवी वर्मा ने भी अपनी लेखनी के शुरुआती दौर में इसी संघर्ष का सामना किया। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, “लिखना मेरे लिए जीवन का विस्तार था, लेकिन समाज के लिए यह मात्र एक व्यर्थ का कार्य था। मुझे खुद को साबित करने के लिए कई बार संघर्ष करना पड़ा, लेकिन मैं लिखती रही क्योंकि मेरे लेखन में मेरा अस्तित्व था।” हजारों सालों से महिलाएं साहित्य के संसार में आज भी पुरुषों की चालबाजी के चलते खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं। उनके सामने यह डर भी होता है कि उनके काम को पुरुष प्रधान संपादको द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि पुरुष संपादको द्वारा अक्सर उन्हें यह बताया जाता कि वे क्या लिख सकती हैं और क्या नहीं।

प्रकाशन की समस्याएं

साहित्य में महिलाओं को हाशिए पर रखने का एक ओर तरीका है उनकी रचनाओं को प्रकाशन में जगह न देना। जब भी साहित्य लेखन पर चर्चा होती है तो पांच सात पुरुष लेखकों के नाम सामने आते हैं और उन्हीं के लेखन को प्रकाशन में अधिक वरीयता तथा बिक्री में लोकप्रियता मिलती है। इसके अलावा महिलाओं को अपना लेखन प्रकाशित करवाने के लिए किसी प्रभावशाली पुरुष की सहायता लेनी पड़ती है जैसे ऊषा महाजन अपनी पुस्तक “बाधाओं के बावजूद, नई औरत” में बताती है कि ‘उन्होंने किसी अखबार को एक कहानी भेजी, पर अखबार ने टिप्पणी के साथ कहानी वापिस लौटा दी, टिप्पणी में था कि कहानी खुशवंत सिंह से पास कराइए, हमें आपके विषय में जानकारी नहीं है।

साल 2021 में न्यूजलॉन्ड्री ने यूएन वुमन और हयात (अमेरिकी बहुराष्ट्रीय हॉस्पिटैलिटी कम्पनी) के साथ मिल कर “जेंडर रिप्रेजेंटेशन इन इंडियन न्यूजरूम” नामक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट में प्रिंट मीडिया में छपे 21988 लेखों के विश्लेषण में पाया गया कि इनमें 75 फीसदी लेख पुरुषों द्वारा लिखे गए थे। इनमें इंग्लिश भाषी अखबारों में महिलाओं द्वारा लिखे लेखों का हिस्सा केवल 26.2 फीसदी था वहीं हिंदी भाषी अखबार में यह केवल 14 फीसदी। हिंदी भाषा में महिलाओं की स्थिति और भी नाजुक है, इस रिपोर्ट से सामने आया कि हिंदी भाषी अखबारों के पहले पेज पर छपा हुआ सब कुछ पुरुषों द्वारा ही लिखा गया है और दैनिक हिंदी अखबार ‘प्रभात खबर’ में छपे व्यक्तिगत बायलाइन वाले सभी लेखों में से 99 फीसदी पुरुषों द्वारा लिखे गए हैं। आंकड़ों से स्पष्ट है कि महिलाओं द्वारा लिखा गया पुरुष संपादकों और मालिकों द्वारा प्रकाशित नहीं किया जाता।

तस्वीर साभार: Canva

हिंदी साहित्य के छायावादी युग की कवयित्री महादेवी वर्मा ने अपने निबंध संग्रह ‘श्रृंखला की कड़ियां’ (1942) में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहती है, “स्त्री जीवन का सृजनात्मक पक्ष उसे साहित्य में विशेष स्थान प्रदान करता है, लेकिन समाज में उसकी सृजनात्मकता को मान्यता देना अभी शेष है।” वहीं मन्नू भंडारी, जिन्होंने “आपका बंटी” जैसी कालजयी कृति लिखी, को भी पुरुष प्रधान साहित्यिक समाज से चुनौती मिली। उनके लेखन को भी कई एक ‘स्त्री दृष्टिकोण’ के रूप में हाशिए पर धकेलने का प्रयास किया गया।

स्त्री साहित्य को ग्राहकों की चुनौती

तस्वीर साभारः  Her Circle

स्त्रियों द्वारा लिखे साहित्य के समक्ष पितृसत्तात्मक समाज द्वारा न पढ़ने और न खरीदने की प्रवृति सामने आई है। इंग्लैंड के “नीलसन बुकडाटा कंज्यूमर रिसर्च 2023” में पाया गया है कि महिलाएं तो पुरुषों द्वारा लिखे गए साहित्य को खरीद रही है वहीं पुरुषों ने महिलाओं द्वारा लिखे साहित्य को खरीदने में उदासीनता दिखाई है। जैसे कि आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023 में यूके की टॉप 10 बेस्ट सेलिंग महिला लेखकों के कुल बिकने वाले साहित्य का केवल 19 फीसदी हिस्सा ही पुरुषों द्वारा खरीदा गया है वहीं टॉप 10 बेस्ट सेलिंग पुरुष लेखकों की किताबों को खरीदने में महिलाओं की भागीदारी 45 फीसदी है। यह तब है जब महिलाओं द्वारा लिखी गई कृतियां वर्ष की बेस्ट सेलिंग का अवार्ड जीत रही हैं, जैसे वर्ष 2017 के टॉप 5 बेस्ट सेलिंग लिटरेरी फिक्शन नोवेल ले तो पाएंगे कि ये सारे महिलाओं द्वारा लिखे गए थे और टॉप 10 में यह संख्या 9 थी। अर्थात सबसे ज्यादा बिकने वाले नोवेल में केवल एक ही नोवेल ऐसा था जो पुरुष द्वारा लिखा गया था, इसका मतलब साफ है कि महिलाओं का लेखन असाधारण और उम्दा है परंतु इसके बावजूद पुरुषों द्वारा न तो इसे खरीदा जा रहा है और न ही पढ़ा जा रहा है। ऐसा करने पर साहित्य समाज द्वारा उन पर कोई प्रश्नचिन्ह भी नहीं लगाया जा रहा। इन पुरुष लेखकों पर कभी अज्ञानता का आरोप भी नहीं लगता। वहीं दूसरी तरफ यदि एक महिला ने किसी पुरुष का लेखन न पढ़ा हो तो उसे अज्ञानी साबित कर दिया जाता है और उसकी अभिरुचि पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाता है। अमृता प्रीतम, ने “मैं तेनु फेर मिलांगी” जैसी अपनी अनगिनत विश्वप्रसिद्ध कविताओं और कहानियों में नारी स्वतंत्रता और प्रेम की अभिव्यक्ति पेश की परंतु इसके बावजूद पुरुष समाज उनके लेखन को पढ़ने और स्वीकारने में हिचकिचाता रहा है।

स्त्री लेखन की आलोचना

जब भी एक स्त्री कुछ बेहद सृजनात्मक विषयों पर लिखती है तो उसे उनके व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ दिया जाता है और मान लिया जाता है कि ये उनकी आपबीती है। जैसे नमिता गोखले ने “पारो” नामक उपन्यास लिखा जो बहुत चर्चित हुआ परंतु इसे लेखिका के निजी जीवन के साथ जोड़ दिया गया और फिर शुरू हुआ त्रासदियों का सिलसिला। उनके पति को लोगों ने पूछ-पूछ कर परेशान कर दिया कि उनकी पत्नी कैसा भद्दा लेखन कर रही है, उनके घर अश्लील फोन आने लगे। अर्थात यदि कोई महिला लिखती है तो, आलोचनात्मक प्रतिक्रिया लेखन पर नही बल्कि महिलाओं के चरित्र पर की जाती है क्योंकि स्त्रियों के चरित्र पर आक्षेप लगा कर उनकी रचनात्मकता को बाधित कर उन्हें कमजोर कर देने का एक औजार रहा है।

वर्जीनिया वुल्फ अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “रूम ऑफ वनस ओन” में दलील पेश करती है कि महिला द्वारा कुछ भी लिखने के लिए अति आवश्यक है “पैसा और अपना कमरा” होना। उनका मानना है जब आपके पास पैसा होगा तो आप बिना आजीविका की चिंता किए निश्चिंत होकर लंबे समय तक लिख सकते हैं।

समाधान और बदलाव की आवश्यकता

सर्वप्रथम, समाज और परिवार में स्त्रियों के स्थान को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। महिलाओं को अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और घरेलू कार्यों और बच्चों की देखभाल के बारे में जो मनोवृत्तियां समाज में व्याप्त है उन्हें बदलने की आवश्यकता है। घरेलू कामकाज के बारे में पति-पत्नी के बीच एक संयुक्त जिम्मेदारी का भाव और इन कार्यों को दोनों के लिए सम्मानजनक समझने की भावना विकसित करने की आवश्यकता है। स्त्री लेखन की स्वतंत्रता की लड़ाई केवल महिलाओं की नहीं है, यह संपूर्ण समाज के उत्थान से जुड़ा विषय है। महिलाओं की आवाजों को
अनसुना करना अपने ही समाज को खोखला करने जैसा है। जब एक महिला की कलम चलती है तो वह केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि उन हजारों महिलाओं के लिए भी लिखती हैं, जिनकी आवाज अब तक दबाई गई है। इसके अलावा अब आधी आबादी को बिना सामाजिक दबाव का सामना किए, स्वतंत्र होकर लेखन करना होगा, स्वयं के प्लेटफॉर्म विकसित करने होंगे ताकि उनके विचार और आवाज कहीं दब ना जाए और सत्य आमजन तक पहुंच सके। क्योंकि यह सिर्फ शब्दों की ही लड़ाई नही है, यह एक नए समाज के निर्माण की दिशा में उठाया गया एक साहसी कदम है।


About the author(s)

Rajesh

Rajesh is a researcher. He recently completed his M.phil with a specialization in 'Voting Behaviour' along with an internship from Ashoka University after his Masters in Political Science from the University of Delhi. His academic interests are in Dalit & Women studies as well as Electoral Politics. He has been working as an Electoral and Voter Analyst for the last two years. His favourite places to hang out are coffee and book shops.

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