आधुनिक समय में कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, जो नारी सशक्तिकरण का एक अच्छा उदाहरण है। यह हमारे समाज के लिए गर्व की बात है कि महिलाएं कारखानों और कार्यालयों में मजबूत भूमिका निभा रही हैं। लेकिन इसके साथ ही महिलाओं को कार्यस्थलों पर कई तरह की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है, जैसे वर्कप्लेस में असुरक्षित माहौल, भेदभाव और शोषण के मामले चिंता का विषय हैं। ऐसे में महिलाओं के अनुकूल कार्यस्थल बनाना बेहद जरूरी है ताकि वे सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में काम कर सकें। यह न केवल महिलाओं के लिए अच्छा है, बल्कि पूरे संगठन के विकास के लिए भी फायदेमंद है। किसी भी देश की तरक्की के लिए यह जरूरी है कि वहां के कार्यस्थलों पर पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान अवसर और सम्मान मिले।
1. वैतनिक समानता है जरूरी
लैंगिक असमानता और महिलाओं से जुड़े मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय हैं। काम में उनकी योग्यता और मेहनत के बावजूद कई बार उन्हें सही मौके नहीं मिलते। कई बार पदों का आवंटन लिंग के आधार पर किया जाता है, जबकि यह प्रक्रिया पूरी तरह से योग्यता और क्षमताओं पर आधारित होनी चाहिए। वेतन में भेदभाव भी बड़ी समस्या है। खेल, फिल्म और कॉर्पोरेट सेक्टर में महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन मिलता है, चाहे उनका काम बराबर या बेहतर ही क्यों न हो।

लिंक्डइन के 2021 सर्वे में 85 प्रतिशत भारतीय महिलाओं ने माना कि जेंडर के कारण उन्हें वेतन बढ़ोतरी और प्रमोशन नहीं मिलते। भारत में समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 के तहत पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन देने का नियम है। फिर भी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 2021 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अब भी महिलाओं को पुरुषों से करीब 20 प्रतिशत कम वेतन मिलता है। इस अंतर को खत्म करने के लिए जरूरी है कि महिलाओं की नियुक्ति और वेतन पूरी तरह योग्यता और कुशलता पर आधारित हों।
भारत में समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 के तहत पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन देने का नियम है। फिर भी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 2021 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अब भी महिलाओं को पुरुषों से करीब 20 प्रतिशत कम वेतन मिलता है।
2. जीवन की चुनौतियों पर बात हो
कार्यस्थल को महिलाओं के अनुकूल बनाने के लिए सबसे जरूरी है कि उनकी चुनौतियों पर खुलकर बात की जाए। यह समझना जरूरी है कि उन्हें काम के दौरान किस तरह की मुश्किलें आती हैं, जैसे काम का दबाव, समय की कमी या सहकर्मियों का गलत व्यवहार। अगर महिला विवाहित है तो घर और ऑफिस की जिम्मेदारियों को संभालना भी मुश्किल हो सकता है। ऐसे में संगठन को उन्हें भरोसा देना चाहिए कि वे हर समस्या में उनके साथ हैं। जरूरत पड़ने पर लचीला समय और सहयोग मिलना चाहिए। इससे महिलाओं का तनाव कम होगा और वे अच्छे माहौल में बेहतर काम कर पाएंगी।
3. पीरियड लीव की हो गुंज़ाइश
पीरियड्स के दौरान महिलाओं को शारीरिक और मानसिक कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे हालात में ऑफिस में काम करना महिलाओं के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कुछ कंपनियां महिलाओं को पीरियड लीव देती हैं, लेकिन अभी भी कई जगहों पर यह सुविधा नहीं है। कार्यस्थलों को यह समझना जरूरी है कि पीरियड लीव को एक सामान्य जरूरत के रूप में देखा जाए और इस पर खुलकर बात हो। विक्टोरियन विमेन ट्रस्ट एंड सर्कल द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक, 70 प्रतिशत महिलाएं ऑफिस में पीरियड्स के बारे में बात करने में झिझकती हैं। यू वी हेल्थ द्वारा किए गए सर्वे में पाया गया कि 45.2 प्रतिशत अमेरिकी महिलाओं को पीरियड्स की अनियमितताओं के चलते छुट्टी लेनी पड़ती है। कार्यस्थलों को इस विषय पर खुलकर बात करने का माहौल बनाना चाहिए ताकि महिलाएं बिना झिझक अपनी जरूरतें साझा कर सकें।
विक्टोरियन विमेन ट्रस्ट एंड सर्कल द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक, 70 प्रतिशत महिलाएं ऑफिस में पीरियड्स के बारे में बात करने में झिझकती हैं। यू वी हेल्थ द्वारा किए गए सर्वे में पाया गया कि 45.2 प्रतिशत अमेरिकी महिलाओं को पीरियड्स की अनियमितताओं के चलते छुट्टी लेनी पड़ती है।
4. मैटरनिटी लीव और कामकाजी जीवन में बैलन्स

भारत में शादी और बच्चों के बाद महिलाओं की ज़िम्मेदारियां कई गुना बढ़ जाती हैं। अशोका यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 73 प्रतिशत भारतीय महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद नौकरी छोड़ देती हैं और दोबारा काम पर लौटना उनके लिए मुश्किल होता है। इस समस्या के समाधान के लिए:
- कार्यस्थल को मातृत्व अवकाश के साथ ही लचीला कामकाजी माहौल देना चाहिए।
- ऑफिस में चाइल्ड केयर की व्यवस्था हो, ताकि महिलाएं अपने बच्चों को साथ रखकर काम कर सकें।
- महिलाओं के लिए रिटर्न-टू-वर्क प्रोग्राम शुरू किए जाने चाहिए।
- महिलाओं के लिए वर्क फर्म होम की सुविधा होनी चाहिए ताकि वे वैतनिक कार्यबल में आसानी से शामिल हो सकें।
5. महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देना
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट के अनुसार 2017-19 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की कार्य भागीदारी 24.6 प्रतिशत से बढ़कर 41.5 प्रतिशत हो गई। लेकिन नेतृत्व के स्तर पर उनकी संख्या बेहद कम है। फॉर्च्यून इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कंपनियों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 11 प्रतिशत है। कार्यस्थल को महिलाओं के अनुकूल बनाने के लिए ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जिनमें महिलाओं की शीर्ष पदों पर भागीदारी बढ़े।
अशोका यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 73 प्रतिशत भारतीय महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद नौकरी छोड़ देती हैं और दोबारा काम पर लौटना उनके लिए मुश्किल होता है।
6. महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कार्यस्थल
समाज में महिलाओं को लेकर कई पूर्वाग्रह मौजूद हैं। सिनेमा, मीडिया और कॉरपोरेट सेक्टर में भी यह असमानता देखी जा सकती है। कार्यस्थल को ऐसी मानसिकता से मुक्त बनाना चाहिए जिससे महिलाएं बिना किसी दबाव के काम कर सकें। कार्यस्थलों पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की स्थिति हो सकती है। इसके लिए जेंडर सेंसिटिविटी ट्रेनिंग प्रोग्राम एक प्रभावी कदम हो सकता है। इसके अलावा, महिलाओं के कौशल को बढ़ाने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
8. महिलाओं की सुरक्षा

अगस्त 2024 में कोलकाता में एक प्रशिक्षु महिला डॉक्टर के साथ आरजी कर अस्पताल में हुए बलात्कार की घटना ने कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, 31 प्रतिशत महिलाएं अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करती हैं। कार्यस्थलों को महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
- महिला कर्मचारियों के लिए सुरक्षित परिवहन व्यवस्था करनी चाहिए।
- कार्यस्थल पर महिलाओं की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
- महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 के तहत आंतरिक शिकायत समिति का अनिवार्य रूप से गठन किया जाना चाहिए।
महिलाओं के अनुकूल कार्यस्थल बनाना सिर्फ महिला कर्मचारियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे संगठन और समाज के लिए फायदेमंद है। कार्यस्थलों को महिलाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए और उन्हें समान अवसर देने चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा, समान वेतन, मातृत्व अवकाश, पीरियड लीव, और नेतृत्व के अवसर देने से कार्यस्थल अधिक समावेशी और प्रगतिशील बन सकता है।