संस्कृतिकिताबें ‘मैडम सर’: बिहार की पहली महिला आईपीएस मंजरी जारूहर की साहस और संघर्ष की कहानी

‘मैडम सर’: बिहार की पहली महिला आईपीएस मंजरी जारूहर की साहस और संघर्ष की कहानी

जब उन्होंने पुलिस सेवा जॉइन की, उस समय यह क्षेत्र पूरी तरह पुरुष-प्रधान था। अधिकतर पुरुष सहकर्मी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते थे और सोचते थे कि महिलाएं कठोर और जोखिम भरे कामों के लिए बनी ही नहीं हैं।

देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी से तो अधिकतर लोग परिचित हैं, लेकिन बिहार की पहली महिला आईपीएस अधिकारी का नाम शायद ही कोई जानता हो। बिहार की पहली महिला आईपीएस अधिकारी मंजरी जारूहर की पहली किताब ‘मैडम सर’ नाम से प्रकाशित हुई। यह किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इसमें उस लड़की की कहानी है जिसने बिहार के एक साधारण माहौल से निकलकर सिविल सेवा तक का सफर तय किया। इसमें बचपन, पढ़ाई, यूपीएससी की तैयारी, पुलिस की ट्रेनिंग, पहली पोस्टिंग, और काम के दौरान रोजमर्रा की चुनौतियों को बताया गया है।

साल 1976 भारतीय पुलिस सेवा के इतिहास में खास रहा। इसी वर्ष मंजरी जारूहर ने आईपीएस की वर्दी पहनकर एक नया अध्याय रचा। वह न केवल बिहार की पहली महिला आईपीएस अधिकारी बनीं, बल्कि पूरे देश की सिर्फ पांचवीं महिला अधिकारी थीं। उस समय पुलिस सेवा पूरी तरह से पुरुष-प्रधान माना जाता था और महिलाओं की मौजूदगी लगभग नामुमकिन-सी लगती थी। ऐसे माहौल में मंजरी का यह कदम न सिर्फ साहसिक था बल्कि एक मिसाल भी था।

दिलचस्प बात यह है कि मंजरी जारूहर शुरू में किताब लिखना ही नहीं चाहती थीं। उनका मानना था कि उनकी जिंदगी, उनके संघर्ष और उनके अनुभवों में भला दूसरों के लिए ऐसा क्या होगा जो लिखा या पढ़ा जाए। उन्हें लगता था कि उनकी कहानी भी उन लाखों-करोड़ों कहानियों जैसी है, जिनमें कठिनाइयां और संघर्ष तो है, लेकिन आम जनता के लिए साधारण हैं।

दिलचस्प बात यह है कि मंजरी जारूहर शुरू में किताब लिखना ही नहीं चाहती थीं। उनका मानना था कि उनकी जिंदगी, उनके संघर्ष और उनके अनुभवों में भला दूसरों के लिए ऐसा क्या होगा जो लिखा या पढ़ा जाए। उन्हें लगता था कि उनकी कहानी भी उन लाखों-करोड़ों कहानियों जैसी है, जिनमें कठिनाइयां और संघर्ष तो है, लेकिन आम जनता के लिए साधारण हैं। लेकिन उनके भाई ने उन्हें  बार-बार समझाया कि उनकी यात्रा साधारण नहीं, बल्कि असाधारण है। जिस दौर में महिलाएं घर से बाहर निकलने में भी हिचकती थीं, उस दौर में बिहार की एक लड़की ने पुलिस जैसी कठिन और चुनौतीपूर्ण सेवा में कदम रखा। उनके भाई ने उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी आत्मकथा आने वाली पीढ़ियों, खासकर लड़कियों के लिए प्रेरणा बनेगी। धीरे-धीरे मंजरी भी इस बात को मान गईं कि उनके अनुभव और संघर्ष केवल उनके निजी नहीं हैं, बल्कि समाज के लिए भी मायने रखते हैं।

जारूहर का परिचय

मंजरी मूल रूप से बिहार की रहने वाली हैं। परिवार में तीन बहनें और एक भाई थे। अधिकांश भारतीय परिवारों की तरह इनके परिवार वाले भी लड़कियों की उच्च शिक्षा को जरूरी नहीं मानते थे। जारूहर  अपनी किताब में लिखती हैं कि “कैरियर, उच्चाकांक्षा, स्वाधीनता, आत्मनिर्भरता हमारे लिए नहीं थे। हमसे अपेक्षा थी कि ठीक से पढ़ाई करें अपनी और घर का साज-संवार-संभाल सीखें ताकि हमारी शादी एक अच्छे परिवार में हो सके, वह भी किसी ऐसे व्यक्ति से जो वो हमारे लिए चुनें।” किताब का शीर्षक ‘मैडम सर’ बहुत दिलचस्प और सोचने पर मजबूर करने वाला है।

बिहार की पहली महिला आईपीएस अधिकारी मंजरी जारूहर की पहली किताब ‘मैडम सर’ नाम से प्रकाशित हुई। यह किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इसमें उस लड़की की कहानी है जिसने बिहार के एक साधारण माहौल से निकलकर सिविल सेवा तक का सफर तय किया।

आज भी अमूमन पुलिस विभाग में महिला अधिकारियों को अक्सर ऐसे ही संबोधित किया जाता है। यह संबोधन अपनेआप में समाज की रूढ़िवादी मानसिकता को दिखाता है। ‘मैडम’ कहकर महिला होने का भाव व्यक्त किया जाता है, वहीं ‘सर’ कहकर अधिकारी के पद और ताक़त को माना जाता है। यह नामकरण बताता है कि मंजरी जारूहर  जैसी महिला अधिकारियों को अपने पूरे करियर में इन दोनों पहचान, एक महिला और एक अधिकारी के बीच लगातार संतुलन बनाना पड़ा और संघर्ष करना पड़ा।

बिहार की जटिल परिस्थितियां और उनकी नौकरी

मंजरी के जीवन में संघर्षों की कोई कमी नहीं रही। जब उन्होंने पुलिस सेवा जॉइन की, उस समय यह क्षेत्र पूरी तरह पुरुष-प्रधान था। अधिकतर पुरुष सहकर्मी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते थे और सोचते थे कि महिलाएं कठोर और जोखिम भरे कामों के लिए बनी ही नहीं हैं। लेकिन उन्होंने बार-बार अपने काम से यह साबित किया कि ईमानदारी, मेहनत, संवेदनशीलता और दृढ़ संकल्प से कोई भी मुश्किल पार की जा सकती है। बिहार जैसे राज्य में पुलिस सेवा करना अपने आप में बहुत कठिन था। यहां आज भी जातिवाद, अपराध, नक्सलवाद और राजनीति का दबाव जैसी कई चुनौतियां हैं। इन सबके बीच काम करना किसी भी पुलिस अधिकारी के लिए कठिन था, और एक महिला अधिकारी के लिए तो और भी मुश्किल। उन्होंने अपनी किताब में साफ लिखा है कि उन्हें कई बार राजनीतिक दबावों में काम करना पड़ता था। नेताओं और सत्ता से जुड़े लोगों का दबाव हमेशा बना रहता था, लेकिन उन्होंने अपनी निष्ठा और सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। यही वजह है कि वे अपनी ईमानदार और सख्त छवि के लिए जानी जाती हैं।

जब उन्होंने पुलिस सेवा जॉइन की, उस समय यह क्षेत्र पूरी तरह पुरुष-प्रधान था। अधिकतर पुरुष सहकर्मी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते थे और सोचते थे कि महिलाएं कठोर और जोखिम भरे कामों के लिए बनी ही नहीं हैं।

महिला पुलिस अधिकारी होने की चुनौती

महिला पुलिस अधिकारी होने के नाते उन्हें घर और नौकरी दोनों की जिम्मेदारियां निभानी पड़ती थीं। कई बार उन्हें अपनी पहचान साबित करनी पड़ती थी कि वे किसी से कम नहीं हैं। उन्हें बार-बार यह दिखाना पड़ा कि महिला होना कमजोरी नहीं है, बल्कि संवेदनशीलता और दृढ़ता दोनों को साथ लेकर चलने की ताकत है। उस दौर में महिलाओं के लिए पेशेवर जीवन और निजी जीवन में संतुलन बनाना और भी कठिन था, क्योंकि समाज अक्सर उनसे अपेक्षा करता था कि वे परिवार को ही प्राथमिकता दें। पुलिस सेवा में, जहां हर निर्णय साहस और तुरंत कार्रवाई की मांग करता है, वहां उन्हें बार-बार यह साबित करना पड़ा कि वे किसी से कम नहीं हैं। कई बार उनके पुरुष सहकर्मी उन्हें हल्के में लेते थे या यह सोचते थे कि वे कठिन हालात का सामना नहीं कर पाएंगी। उनकी संवेदनशीलता ने उन्हें आम लोगों के दुख-दर्द को समझने में मदद की, और उनकी दृढ़ता ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में सही फैसले लेने की हिम्मत दी। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि महिला होना कमजोरी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सख़्ती दोनों को साथ लेकर चलने की क्षमता है।

उन्होंने साबित किया कि एक महिला अधिकारी भी उतनी ही सक्षम, कठोर और न्यायप्रिय हो सकती है, जितना कोई पुरुष अधिकारी। यह किताब हमें यह एहसास कराती है कि किसी भी महिला के लिए पुलिस जैसी कठोर और चुनौतीपूर्ण नौकरी केवल एक पेशा नहीं होती, बल्कि लगातार चलने वाला संघर्ष और आत्म-संघर्ष होता है। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों के ज़रिए यह साबित किया कि कठिन हालात, सामाजिक बाधाएं और निजी जिम्मेदारियाँ किसी महिला की राह को रोक नहीं सकतीं। यह किताब दिखाती है कि संवेदनशीलता और दृढ़ता मिलकर किस तरह एक महिला को और भी सशक्त बनाती हैं। उन्होंने अपने काम से साबित किया कि महिला होना कमजोरी नहीं, बल्कि एक विशेष ताकत है। उनके अनुभव आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं को यह भरोसा देते हैं कि अगर मन में हिम्मत और आत्मविश्वास हो, तो कोई भी क्षेत्र उनके लिए बंद नहीं है। इस किताब से हमें यह सीख मिलती है कि बदलाव आसान नहीं होता, लेकिन जब कोई औरत साहस के साथ अपनी पहचान बनाने की ठान ले, तो वह बदलाव की राह ज़रूर खोल देती है। मंजरी जी की कहानी केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा नहीं है, बल्कि यह उन सभी महिलाओं की प्रेरक गाथा है।

About the author(s)

मेरा नाम नंदिनी राज है। मैं बिहार के छपरा जिले से हूं। समाज में मौजूद रूढ़िवाद, भेदभाव और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दों को समझने, लिखने और उनपर बातचीत करने में मेरी गहरी रूचि है। मैंने बचपन से देखा है कि किस तरह हमारे समाज में लड़कियों को चुप रहना सिखाया जाता है और कैसे रूढ़िवाद और भेदभाव उनकी आकांक्षाओं को सीमित कर देता है। मैं मानती हूं कि लेखनी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि परिवर्तन की शुरुआत भी हो सकती है। मेरी कोशिश  है कि मैं अपने गांव और समाज के उन तबकों की आवाज़ बनूं, जिन्हें सदियों से बोलने और सुने-जाने का अवसर नहीं मिला।

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