नारीवाद मेरा फेमिनिस्ट जॉय: लखनऊ की गलियों से एलएसआर तक मेरी आज़ादी का सफर

मेरा फेमिनिस्ट जॉय: लखनऊ की गलियों से एलएसआर तक मेरी आज़ादी का सफर

स्कूली शिक्षा के दौरान मुझे अपनी शारीरिक बनावट और 'ड्रेसिंग सेंस' के प्रति अच्छा महसूस नहीं होता था। मैंने बचपन से ही बॉडी शेमिंग का सामना किया है, क्योंकि मेरी शारीरिक बनावट हमेशा से ही स्लिम रही है। माता-पिता, रिश्तेदारों और सहपाठियों, किसी ने भी मुझे सकारात्मक अनुभव नहीं कराया।

साल 2026 की दहलीज़ पर खड़े होकर, मैं अपने जीवन के बीते कुछ सालों को पीछे मुड़कर देख रही हूं। यह समय मेरे लिए आत्ममंथन का है। मैं यह समझने की कोशिश कर रही हूं कि आज से दो साल पहले मैं कैसी महिला थी और आज मैं खुद को कितना सशक्त और संतुष्ट महसूस करती हूं। यह केवल व्यक्तिगत खुशी की कहानी नहीं है, बल्कि मेरे व्यक्तित्व में आए गहरे बदलाव की यात्रा है। यह यात्रा सितंबर 2024 से शुरू हुई। बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के बाद मेरे सामने सीयूईटी यूजी 2024 की परीक्षा थी। परीक्षा देने के बाद अगस्त में जब लेडी श्री राम कॉलेज फॉर वुमन में मेरे चयन की खबर आई, तो घर में खुशी का माहौल था। परिवार के सभी सदस्य भावुक थे। माता-पिता और बहन की आंखों में गर्व और खुशी साफ दिखाई दे रही थी। यह मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

मैं भी इस नए अध्याय को शुरू करने के लिए लंबे समय से उत्साहित थी। दिल्ली जाकर पढ़ने का सपना मेरे लिए सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक कदम था। हालांकि, इस खुशी के साथ घर में एक बेचैनी भी थी। वजह साफ थी मेरा घर छोड़कर दूसरे शहर, यानी नई दिल्ली, जाना। एक महिला होने के नाते मेरे माता-पिता की चिंता स्वाभाविक थी। नई दिल्ली अक्सर महिला सुरक्षा और असुरक्षित माहौल को लेकर चर्चा में रहती है। कॉलेज में हॉस्टल की सुविधा नहीं होने के कारण मुझे पीजी में रहना पड़ा। पीजी का किराया और सुविधाएं एक-दूसरे के अनुरूप नहीं थीं। दुर्भाग्य से, मैं अभी भी उसी पीजी में रह रही हूं।

यह अनुभव सिर्फ एक छात्रा के शहर बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन सवालों और चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है, जिनका सामना देश में उच्च शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलने वाली कई युवा महिलाओं को करना पड़ता है।

मैं भी इस नए अध्याय को शुरू करने के लिए लंबे समय से उत्साहित थी। दिल्ली जाकर पढ़ने का सपना मेरे लिए सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक कदम था। हालांकि, इस खुशी के साथ घर में एक बेचैनी भी थी। वजह साफ थी मेरा घर छोड़कर दूसरे शहर, यानी नई दिल्ली, जाना।

अकेले रहने का संघर्ष और सीख

सितंबर 2024 में आते ही मुझे बहुत ही खराब अनुभव हुआ। मानसिक रूप से खुद को संभालना नामुमकिन लग रहा था। बिना किसी खिड़की वाले कमरे में जीवन में हमेशा अंधकार दिखता था। पीजी की पानी जैसी दाल और आधे पके हुए आलूओं ने घर के घी के प्रति महत्व और सम्मान बढ़ा दिया। लेकिन वह कहते हैं न, कि वर्तमान में जीवन व्यतीत करो, समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाता है और यही हुआ।

एलएसआर मेरे जीवन में किसी मील के पत्थर से कम नहीं है। मुझे एक महिला कॉलेज में ही दाखिला लेने का मन था, और ईश्वर ने मेरी सुन ली। पहले सेमेस्टर में मैंने खुद को खोजने का प्रयास किया। खुद को संभलने का समय दिया, क्योंकि नए शहर में भाषा और पहनावे का भी अंतर होता है। नई दिल्ली तो वैसे भी महानगर है। कभी बाथरूम में अकेले रोने से लेकर आज मैं खुद को आईने में देखकर बहुत सकारात्मक महसूस करती हूं।

पहले सेमेस्टर में मैंने खुद को खोजने का प्रयास किया। खुद को संभलने का समय दिया, क्योंकि नए शहर में भाषा और पहनावे का भी अंतर होता है। नई दिल्ली तो वैसे भी महानगर है। कभी बाथरूम में अकेले रोने से लेकर आज मैं खुद को आईने में देखकर बहुत सकारात्मक महसूस करती हूं।

व्यक्तिगत सीख और बॉडी पॉजिटिविटी

स्कूली शिक्षा के दौरान मुझे अपनी शारीरिक बनावट और ‘ड्रेसिंग सेंस’ के प्रति अच्छा महसूस नहीं होता था। मैंने बचपन से ही बॉडी शेमिंग का सामना किया है, क्योंकि मेरी शारीरिक बनावट हमेशा से ही स्लिम रही है। माता-पिता, रिश्तेदारों और सहपाठियों, किसी ने भी मुझे सकारात्मक अनुभव नहीं कराया। इसी कारण से मुझे असुरक्षित लगने लगा था और पहले सेमेस्टर में मैं बहुत ही सादे ड्रेसिंग सेंस में रहती थी। लेकिन फरवरी 2025 से मैंने अपने ड्रेसिंग सेंस में बदलाव करना शुरू किया। इसी के साथ मैंने बहुत सारी सेल्फी लेना भी शुरू किया, जिससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और आत्मीयता भी। मैंने अपनी वास्तविक खूबसूरती को स्वीकारा। महिला कॉलेज में मेरी सहपाठियों ने हमेशा मुझे प्रेरित और समर्थित किया। उन्होंने मेरे ड्रेसिंग सेंस की प्रशंसा की और मुझे बॉडी पॉजिटिविटी का अनुभव हुआ।

मैंने यहां पर थोड़ा मेकअप करना भी शुरू किया। खुद को आईने में निहारना मुझे हमेशा से पसंद रहा है, और अब तो यह मुझे बहुत पसंद है। मेरे ड्रेसिंग सेंस और मेकअप को माता-पिता ने भी बहुत पसंद किया, और मैंने हर तरीके की टॉक्सिसिटी को खुद मीलों दूर रखा। मैंने पहले सेमेस्टर के अंत तक अपनी एग्जामिनेशन एंग्जायटी को भी हराया। मुझे बारहवीं कक्षा से परीक्षाओं के कारण पैनिक अटैक आते थे, जो सेमेस्टर 1 से बिल्कुल खत्म हो गए। मुझे अब किसी भी परीक्षा या वाइवा से कोई तनाव नहीं होता। मेरा मानसिक स्वास्थ्य बहुत बेहतर हो गया है।

मैंने यहां पर थोड़ा मेकअप करना भी शुरू किया। खुद को आईने में निहारना मुझे हमेशा से पसंद रहा है, और अब तो यह मुझे बहुत पसंद है। मेरे ड्रेसिंग सेंस और मेकअप को माता-पिता ने भी बहुत पसंद किया, और मैंने हर तरीके की टॉक्सिसिटी को खुद मीलों दूर रखा। मैंने पहले सेमेस्टर के अंत तक अपनी एग्जामिनेशन एंग्जायटी को भी हराया।

सफ़र, सीमाएं और स्वतंत्रता का उत्सव 

अपने व्यक्तित्व में आए इस बदलाव के साथ-साथ मैंने अकेले यात्रा करना भी सीखा। एक समय था जब मैं अकेले निकलने में घबराती थी, लेकिन अब मैंने ट्रेन और विमान में अकेले सफ़र करके उस डर को जीत लिया है। विशेष रूप से, ‘दिल्ली मेट्रो’ मुझे बहुत ही ज़्यादा पसंद है। मेट्रो में अकेले आना-जाना मुझे इस महानगर में अपनी जगह और स्वतंत्रता का अहसास दिलाता है। मैंने अपनी व्यक्तिगत सीमाओं के महत्व को भी समझा, जो कि बहुत ही आवश्यक है। अपने मानसिक सुख और स्वास्थ्य के लिए हर व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत सीमाओं पर अडिग रहना चाहिए। मैंने अपने पीजी में इन सीमाओं को स्थापित किया। इसी के साथ अपने खानपान का भी ध्यान रखा। जंक फूड में मुझे कभी दिलचस्पी नहीं रही, लेकिन 10 मिनट डिलीवरी और गिग इकॉनमी वर्कर्स के आने के कारण चिप्स और इंस्टेंट नूडल्स का उपयोग बढ़ गया था, जिसे मैंने बहुत जल्द सुधारा। मुझे डांस करने और गीत गाने का भी बहुत शौक है। मैंने कॉलेज के फेस्ट्स’ और इवेंट्स में खुद को बहुत मनोरंजित किया और बहुत सारे वीडियो भी बनाए।

यह मैं लखनऊ में रहकर बिल्कुल नहीं कर पाती थी, क्योंकि मुझे वहां कभी इस प्रकार की स्वतंत्रता का अनुभव नहीं हुआ। अंत में, यह सफर सिर्फ एक शहर बदलने का नहीं, बल्कि खुद को ‘स्थापित’ करने का रहा है। समाज अक्सर महिलाओं को अपनी इच्छाओं को मारने की सीख देता है, लेकिन मैंने अपनी खुशियों और मानसिक शांति को चुनकर उस पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती दी है। अपनी पसंद के कपड़े पहनना, अकेले रहना और स्वयं की स्थापित सीमाओं पर खुश रहना ही मेरा प्रतिरोध है। आज मैं वह लड़की नहीं हूँ जो डरी हुई थी, बल्कि वह हूँ जो अपने अस्तित्व का जश्न मनाना जानती है। यही स्वतंत्रता, यही हंसी और यही आत्मविश्वास मेरा सच्चा ‘फेमिनिस्ट जॉय’ है।

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