संस्कृतिख़ास बात खास बात: हिंदी लेखिका और साहित्य समीक्षक हेमलता महिश्वर से 

खास बात: हिंदी लेखिका और साहित्य समीक्षक हेमलता महिश्वर से 

चेतना का आधार तो डॉक्टर अंबेडकर का चिंतन है। वहां से हम लोग अपना आधार लेते हैं। जो मनुष्यता को निर्मित करने पर केंद्रित है। निश्चित तौर पर हमारा जो समाज है। वो विभिन्न तरह के खांचों में बंटा हुआ है और आज भी उस खांचे की जो खाई है, वो हम दूर नहीं कर पाए हैं।

जाति और लैंगिक भेदभाव के इतिहास को जब हम पढ़ते हैं, तो अक्सर सत्ता के गलियारों से लिखी गई कहानियां ही सामने आती हैं। लेकिन उन कथित दलित महिलाओं की आवाज़ें, जो रोज़मर्रा के जीवन में सबसे गहरे हिंसक ढांचों का सामना करती हैं, अभी भी साहित्य और अकादमिक विमर्श के हाशिए पर दबी हैं। न्याय, समानता और आज़ादी के संवैधानिक वादों के बावजूद, जातिगत हिंसा और संस्थागत भेदभाव की परतें आज भी हमारे सामाजिक ढांचे में मौजूद हैं। इन जटिल अनुभवों को समझने और सामने लाने का महत्वपूर्ण काम कर रही हैं। अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच की सदस्य और जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर हेमलता महिश्वर, जिनके विचार दलित नारीवाद, सामाजिक न्याय और साहित्यिक प्रतिनिधित्व की कई चुनौतियों पर केंद्रित है। वे न केवल अकादमिक दुनिया की अंतर्विरोधों या मतभेदों को उजागर करती हैं, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित और हाशिए की महिलाओं के संघर्षों को और अपने अनुभव, दोनों स्तरों पर गहराई से समझती हैं। डिजिटल दौर में दलित स्त्री लेखन की संभावनाओं, संरचनात्मक चुनौतियों और भविष्य की राजनीति पर फेमिनिज़म इन इंडिया की उनसे बातचीत हुई। यह बातचीत हमें समझने का अवसर देती है कि कैसे दलित महिलाएं अपने अनुभवों को लेखन और डिजिटल माध्यमों के ज़रिए दर्ज कर रही हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आप अखिल भारत दलित लेखिका मंच से कब और क्यों जुड़ी और आपके लिए दलित स्त्री चेतना का मूल आधार क्या है? 

हेमलता महिश्वर : चेतना का आधार तो डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का चिंतन है। वहां से हम लोग अपना आधार लेते हैं, जो मनुष्यता को निर्मित करने पर केंद्रित है। निश्चित तौर पर हमारा जो समाज है, वो विभिन्न तरह के खांचों में बंटा हुआ है और आज भी उस खांचे की जो खाई है। वो हम दूर नहीं कर पाए हैं। जब हम भारत के संविधान को देखते हैं, तो वो हमें एक नागरिक चेतना से भरा हुआ मनुष्य बनाता है। उस संविधान को लिखे जाने के पीछे जो डॉक्टर अंबेडकर की सोच थी, वही सोच मेरी चेतना का प्रस्थान बिंदु है। मैं वहीं से संचालित होती हूं। विभिन्न तरह के महिला आंदोलन के बाद, यहां तक कि समाजवादी महिला आंदोलन के बाद भी मुझे ऐसा लगा कि मैं अपनी जगह पर नहीं हूं। हम जिस तरह की मनुष्यता की संकल्पना लेकर चलते हैं, वो समाजवाद में नहीं मिल रहा है, वो वर्ग की अवधारणा पर काम करता है। वर्ण की अवधारणा पर उसके कारण होने वाले जो कठिनाइयां हैं, जो परेशानियां हैं, उसको वो एड्रेस ही नहीं करता है, तब ये दलित लेखिका मंच बनाया गया। साल 2016 से रजनी तिलक के नेतृत्व में इस मंच की स्थापना हुई और हम सब तब से इसपर काम कर रहे हैं।

हम जिस तरह की मनुष्यता की संकल्पना लेकर चलते हैं, वो समाजवाद में नहीं मिल रहा है, वो वर्ग की अवधारणा पर काम करता है। वर्ण की अवधारणा पर उसके कारण होने वाली जो कठिनाइयां  हैं, जो परेशानियां हैं, उसको वो एड्रेस ही नहीं करता है, इसलिए तब ये दलित लेखिका मंच बनाया गया। साल 2016 से रजनी तिलक के नेतृत्व में इस मंच की स्थापना हुई और हम सब तब से इसपर काम कर रहे हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया: इस देश में संविधान लागू है जो सबको समानता और स्वतंत्रता देने की बात करता है। लेकिन आज़ादी के इतने सालों के बाद भी इस देश में जातिगत हिंसा जैसी घटनाएं हो रही है। इसका कारण आप क्या समझती हैं ?

हेमलता महिश्वर: संविधान एक वैचारिक चेतना की यात्रा है और कोई भी देश हो या फिर विश्व को भी हम सामने रखे, तो वैचारिकता पहले एकदम से नहीं आ गई थी। हमको इस पर बात करते हुए मनुष्य प्रजाति की पैदाइश और धीरे-धीरे उसके भौतिक विकास को ध्यान में रखना होगा, तब हमको समझ में आता है कि मनुष्य के पैदा होने के साथ परिवार नहीं पैदा हो गया था। शादी नाम की संस्था नहीं आई थी, कबीले नहीं आए थे। मनुष्य जब अपनी अज्ञान अवस्था में था, तो प्रकृति के प्रकोप से डरता था और जिन चीजों से डरता था उसी को उसने देवताओं का नाम दे दिया और देवताओं के माध्यम से उसने फिर यह जाना है कि यह बहुत आसान तरीका है, मनुष्य समाज पर राज करने का। तो धीरे धीरे इस तरह से एक धार्मिक अवधारणा निर्मित होती है और उस धर्म से संचालित होने वाला लगभग सारा समुदाय था।

अगर हम भारत की बात करें तो भारत में चार्वाक और गौतम बुद्ध से लेकर तमाम नास्तिक लोग हुए हैं और एक संघर्ष बराबर चलता रहा पर जैसे ही औद्योगीकरण आया तो इसने जनमानस को बड़े सकारात्मक तरीके से प्रभावित किया। पर उन्हीं को प्रभावित किया जो इसपर चिंतन कर रहे थे कि धर्म ज़्यादा ज़रूरी है या धर्म से इतर भी मनुष्य का विकास हो सकता है। तो हम ये देखते हैं इस विज्ञान के युग में। विज्ञान ने धर्म को बड़ी चुनौति दी। इस पृष्ठभूमि के साथ मैं ये कहना चाहूंगी कि जो ज़्यादातर जनता होती है, वो चिंतनपरक दुनिया के साथ वास्ता नहीं रखते हैं, वो अनुसरण और अनुगमन करते हैं।

जो चिंतन करने वाला हिस्सा होता है। हमेशा से ही समाज में बहुत थोड़ा सा ही हिस्सा रहा है और वही लगातार समाज में जड़ता को, परंपरा को, रूढ़ियों पर सवाल खड़े करता रहता है और नए समाज की ओर जाने के लिए प्रेरित करता है, जब ज्यादा जनता इस तरह की नहीं होती है तो धार्मिक बेड़ियों को काट पाना बहुत मुश्किल होता है।

जो चिंतन करने वाला हिस्सा होता है, वो हमेशा से ही समाज में बहुत थोड़ा सा ही हिस्सा रहा है और वही लगातार समाज में जड़ता को, परंपरा को, रूढ़ियों पर सवाल खड़े करता रहता है और नए समाज की ओर जाने के लिए प्रेरित करता है, जब ज्यादा जनता इस तरह की नहीं होती है तो धार्मिक बेड़ियों को काट पाना बहुत मुश्किल होता है। संविधान 75 साल का मामला है और ये बहुत जबरदस्त किस्म के वैज्ञानिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मांग करता है। जो सबके पास नहीं है और धर्म सबके पास है। इसलिए ये कॉन्फ्लिक्ट है। अगर शिक्षा को अच्छे से और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लागू किया जाएगा, तब ही ये संभव है कि हम धर्म आधारित बेड़ियों को तोड़ पाएंगे, पर हम देख रहे हैं, जहां से शिक्षा संचालित होती है। अकादमिक दुनिया में भी धर्म अपनी जड़ सत्ता बनाए हुए हैं और इसलिए ये संघर्ष बना हुआ है।

फेमिनिज़म इन इंडिया:आप काफी लंबे समय से अकादमिक के क्षेत्र में हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित और हाशिए के समुदायों की महिला विद्यार्थीयों के सामने आज भी किन संरचनात्मक बाधाओं को आप सबसे गंभीर मानती हैं। 

हेमलता महिश्वर : अभी भी हमारे सामने प्रवेश प्राप्त करना जगह बनाना एक कठिन समस्या है। आज भी हमारी योग्यता पर सवाल उठाए जाते हैं। जिसे प्रतिभा या मेरिट कहा जाता है, उसे धर्म के नाम पर दबाया जाता है। बार-बार कहा जाता है कि उच्च शिक्षा दलितों, हाशिये के समुदाय और महिलाओं के लिए नहीं होनी चाहिए। जैसे ही संविधान ने ये अधिकार प्रदान किया तो ये तीनों ही बल्कि आदिवासी समुदाय भी बड़ी तेजी से अपना विकास करते हैं और वो जो धर्म आधारित संरचना थी, जिसमें इन सबको शिक्षा देने से मना कर दिया गया था। लेकिन अब यह लोग बड़ी-बड़ी जगहों पर राष्ट्रपति भी हैं। तो आप देखते हैं वो चुनौती मिल रही है।

अभी भी हमारे सामने प्रवेश प्राप्त करना जगह बनाना एक कठिन समस्या है। आज भी हमारी योग्यता पर सवाल उठाए जाते हैं। जिसे प्रतिभा या मेरिट कहा जाता है, उसे धर्म के नाम पर दबाया जाता है। बार-बार कहा जाता है कि उच्च शिक्षा दलितों और महिलाओं के लिए नहीं होनी चाहिए।

लेकिन बावजूद इसके अगर आप सभी केवल शिक्षा की नहीं, हर एक क्षेत्र में देखेंगे तो आपको एक वर्ण विशेष दिखाई देगा। जो अधिक संख्या में वहां पर काबिज़ है और उसको ये लगता है कि अध्ययन -अध्यापन तो उसका कार्य क्षेत्र है और उसके कार्यक्षेत्र को आरक्षण ने ध्वस्त कर दिया है। वह तरह- तरह के हथकंडे अपनाता है कि इनको कैसे दूर किया जाए। आज भी उच्च शिक्षा में चाहे वो दलित या आदिवासी हो इनका जो जनसंख्या का अनुपात है, पूरा नहीं हो पाया है। अब एक बात ये भी है कि जो लोग एजुकेशन प्राप्त करके आ रहे हैं और इन पदों पर काबिज़ हो रहे हैं। वो भी कहीं-न-कहीं कुछ लोग उस धार्मिक सत्ता से जुड़े हुए लोग होते हैं। वो डरते हैं, वो उस चुनौती को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। तो दोनों ही तरह से हमारे सामने अकादमिक जगत में परेशानियां है।

फेमिनिज़म इन इंडिया: हिंदी साहित्य में दलित महिलाओं  की आवाज़ को जगह देने में सबसे बड़ी बाधा कौन है ? 

हेमलता महिश्वर : निश्चित तौर पर जो आलोच्य वर्ग है, हालांकि अब तो बहुत सारी रचनाएं आ चुकी हैं। अगर हिंदी में पहली आत्मकथा कौशल्या बैसंत्री के दोहरा अभिशाप से ले कर, आज तक की बात करें तो पंद्रह से सत्रह आत्मकथाएं दलित महिलाओं की आ चुकी हैं। कहानी संकलन है, कविता संकलन है, नाटक भी आ चुके हैं। पर इन पर बात हिंदी आलोचना उस तरह से नहीं करती है। अब हिंदी आलोचना में भी जो ब्राह्मणवादी सोच है, जो इन चर्चाओं को करने से बचता है, क्योंकि ये जो दलित चिंतन है पूरी तरह से ब्राह्मणवादी व्यवस्था को  धराशाही कर देती है। वो उसपर सवाल लगा देती है। वे जिन कारणों से अपनी वरिष्ठता और वर्चस्व बनाए रखते हैं, उन्हें वह खारिज कर देती है। जब तक अकादमिक दुनिया की आलोचना तटस्थ रूप में मानवता के हक में नहीं आएगी, तब तक थोड़ी परेशानियां तो बनी रहेंगी। पर इसके बाद भी आवाजें तो आ रही हैं।

निश्चित तौर पर जो आलोच्य वर्ग है, हालांकि अब तो बहुत सारी रचनाएं आ चुकी हैं। अगर  हिंदी में पहली आत्मकथा कौशल्या बैसंत्री के दोहरा अभिशाप से ले कर, आज तक की बात करें तो पंद्रह से सत्रह आत्मकथाएं दलित महिलाओं की आ चुकी हैं। कहानी संकलन है, कविता संकलन है, नाटक भी आ चुके हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया: दलित साहित्य को अक्सर पीड़ा केंद्रित कहकर सीमित कर दिया जाता है। आप इस तरह की आलोचना को कैसे देखती हैं? 

हेमलता महिश्वर : मुझे लगता है कि साहित्य तो पीड़ा केंद्रित ही है। अगर मान लीजिए रामायण की हम बात करें तो आदिकवि वाल्मीकि क्रौंचवध को देखकर परेशान हो कर रचनाएं रच रहे हैं। तुलसीदास की पीड़ा कौन सी कम थी, तो जब आपके पास कोई आधार नहीं होता है, तब आप इस तरह के आरोप लगाते हैं। जिसने जो देखा, जो सहा, जो जाना, वो उसी की ही अभिव्यक्ति करेगा और इस पीड़ा के अभिव्यक्ति से संपूर्ण ब्राह्मणवाद कटघरे में खड़ा हो जाता है, तो वो अपना स्व-आलोकन नहीं करना चाहते हैं। जब वे इस साहित्य के सामने खुद को कमजोर स्थिति में पाते हैं, तो नजरें चुराने लगते हैं। अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर नया समाज बनाने के बजाय, वे इसे हटाने और मिटाने की कोशिश करते हैं। लेकिन विलोपन से बात बनती नहीं है। अलिखित साहित्य की दुनिया की चीजें हमारे सामने आज भी मौजूद है, तो आज तो लिखित दुनिया है। इसको अस्वीकार नहीं किया जा सकता। जो जितना अस्वीकार करेगा उसको आगे आज न सही लेकिन आने वाली पीढ़ियां उसपर शर्म महसूस करेंगी कि इन्होंने ऐसा किया था।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आज डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने साहित्य के उत्पादन और उपभोग को बहुत बदल दिया है। इस बदलाव में दलित स्त्री लेखन के लिए कौन सी नई संभावनाएं या चुनौतियां बन रही हैं?

हेमलता महिश्वर : दो तरह के लोग हैं। एक तो चाहे सोशल मीडिया हो तो सोशल मीडिया पर भी बात रखी जा रही है और इसके अलावा जो लेखन की पारंपरिक दुनिया है, किताबों के माध्यम से वहां भी बातचीत हो रही है। समय के अनुसार नए उपादान या कारण आते हैं और वो बहुत स्वाभाविक भी होते हैं। सोशल मीडिया हमारे लिए कभी भी किसी भी तरह की परेशानी का कारण नहीं रहा है, बल्कि वो तो एक सहायक के तौर पर आया है आपने कोई बात कही और वो तुरंत कहीं और जाकर के सुन ली गई। पुराने समय में ये नहीं होता था कि किताबें पहले छपती थीं, छपेंगी भी या नहीं छपेंगी इसकी भी परेशानियां होती थीं। आज ब्राह्मणवाद पूरी दुनिया में भारतीय व्यवस्था के साथ फैल चुका है। इसलिए अपनी बात या पहुंच बनाने में अब पहले जैसी दिक्कत नहीं है। मैं नहीं समझती कि दलित साहित्य और दलित महिला साहित्यकार के सामने कहीं कोई सोशल मीडिया की वजह से परेशानी है। वो अपने काम कर रही हैं और लगातार आने वाली किताबें इसका प्रमाण है।

जब वे इस साहित्य के सामने खुद को कमजोर स्थिति में पाते हैं, तो नजरें चुराने लगते हैं। अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर नया समाज बनाने के बजाय, वे इसे हटाने और मिटाने की कोशिश करते हैं। लेकिन विलोपन से बात बनती नहीं है, जब अलिखित साहित्य की दुनिया की चीजें हमारे सामने आज भी मौजूद है, तो आज तो लिखित दुनिया है। इसको अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आपने कई दशकों के सामाजिक आंदोलनों को बदलते हुए देखा है। आपको कौन से आंदोलन, घटना या अनुभव ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया। 

हेमलता महिश्वर : एक तो नामांतर का आंदोलन बहुत बड़ा आंदोलन था। चाहे दलितों को अपनी जान गंवानी पड़ी हो। लेकिन अपनी जान गंवाने के बाद भी, अपना रक्त बहाकर के भी अपने अधिकारों को प्राप्त करने में सफल रहा है। साहित्यिक क्षेत्र में हम कथित दलित पैंथर की भूमिका को नहीं भुला सकते हैं। दलित पैंथर का जो मूवमेंट था उसने वैश्विक परिदृश्य में अपनी उपस्थिति को दर्ज कराया और यही वजह थी कि उस वैश्विक उपस्थिति के माध्यम से हमारी आवाज़ सुनी गई और देश संवैधानिक मूल्यों पर चलने के लिए बाध्य हुआ।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आने वाले समय में दलित महिलाओं के अधिकारों के लिए कौन से मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण होंगे ? अगले दस सालों में दलित नारीवाद को भारत में मुख्यधारा बनाने के लिए आप सबसे ज़रूरी तीन काम क्या मानती हैं ?

हेमलता महिश्वर : मुझे लगता है कि दलित नारीवाद मुख्यधारा में ही है। कई सारी पत्रिकाएं इस हक के लिए बात कर रही हैं, उसको छाप रही हैं। हालांकि जो दलित विशेषांक भी आए हैं, उसमें दलित स्त्रीवाद को प्रमुखता से जगह मिली हुई है, जो उसको षड्यंत्र पूर्वक अस्वीकार कर रहा है, क्योंकि वर्तमान जो राजनीति है। वो संविधान का नाम लेते हुए पीछे से छद्म या दिखावटी तरीके से संविधान पर प्रहार तो कर रही है। लेकिन, फिर भी जो दलित स्त्री रचनाकार और दलित पुरुष रचनाकार हैं ये लोग रचनाएं तो ला रहे हैं। एक बड़ा उपन्यास आया उजला अंधेरा के नाम से कैलाश वानखेड़ा का है। इतनी सारी आत्मकथाएं जो आ गई हैं दलित महिलाओं की। लेकिन हम लोगों को अपना लेखन थोड़ा सा और तेज करना होगा। इसके तरह तरह के सम्मेलन करने ही होंगे। साहित्यिक सम्मेलन करने होंगे वो चेतना पैदा करनी होगी और गांव गली तक पहुंचने का प्रयास करना होगा। मुझे लगता है कि तब इसमें तेज़ी आएगी, लेकिन हर काम की अपनी गति होती है। हम जितने भी प्रयास कर लें । पर अगर उसको कोई सरकारी सपोर्ट नहीं मिलता, कोई राजनीतिक समर्थन नहीं मिलता तो हमारे लिए परेशानियां तो बढ़ती हैं। काम ज़रूर अवरुद्ध होता है लेकिन गति से आगे बढ़ता भी रहता है।

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