नारीवाद मेरा फेमिनिस्ट जॉय: अपने शरीर को अपनाने का मेरा राजनीतिक कदम

मेरा फेमिनिस्ट जॉय: अपने शरीर को अपनाने का मेरा राजनीतिक कदम

मैंने यह सीखा है कि मेरे शरीर पर सबसे पहला और आख़िरी अधिकार सिर्फ़ मेरा है। मुझे तय करना है कि मैं क्या करूँगी और क्या नहीं। और अगर मैं कुछ भी नहीं करना चाहती, तो वह भी मेरा ही फ़ैसला है। यही मेरा फेमिनिस्ट जॉय है। अपने शरीर पर अपना अधिकार।

हमारा समाज औरतों के शरीर को लंबे समय से सार्वजनिक संपत्ति की तरह देखता आया है। पितृसत्तात्मक समाज में लोगों को लगता है कि उसे यह तय करने का हक़ है कि एक औरत का शरीर कैसा होना चाहिए। वह कैसे कपड़े पहने। उसकी त्वचा कैसी हो या उसके शरीर पर बाल होने चाहिए या नहीं। सामान्य लगने वाली ये बातें असल में संस्कृति या सुंदरता से नहीं बल्कि पितृसत्ता के वे तरीके हैं, जिनके ज़रिए औरतों को नियंत्रित किया जाता है। एक ऐसी सोच, जिसमें औरत को सिर्फ एक स्वतंत्र व्यक्ति नहीं, बल्कि आब्जेक्टिफाइ किया जाता है। उसके शरीर के हर हिस्से को परखा जाता है और फिर उसे बताया जाता है कि वह सामाजिक मानदंडों के अनुसार अच्छी है या नहीं।

यह शरीर की राजनीति है। यह राजनीति बहुत चुपचाप काम करती है, लेकिन इसका असर बहुत गहरा होता है। इसकी शुरुआत अमूमन स्कूलों और घरों से होती है, जहां लड़कियों को सिखाया जाता है कि कैसे बैठना है, कैसे चलना है और कैसे दिखना है। इस राजनीति का सबसे बड़ा असर यह होता है कि औरत अपने शरीर से कटने लगती है। वह अपनी सहजता, अपनी पसंद और अपने आराम से ज़्यादा दूसरों की नज़रों की चिंता करने लगती है। वह यह सोचने लगती है कि कहीं उसका शरीर किसी को ‘गलत’ न लग जाए। यह डर और अपराधबोध उसकी आज़ादी को सीमित कर देता है।

यह शरीर की राजनीति है। यह राजनीति बहुत चुपचाप काम करती है, लेकिन इसका असर बहुत गहरा होता है। इसकी शुरुआत अमूमन स्कूलों और घरों से होती है, जहां लड़कियों को सिखाया जाता है कि कैसे बैठना है, कैसे चलना है और कैसे दिखना है।

असमान मापदंडों की असलियत

जब मैं कॉलेज में गई, तब मुझे दिखा कि हर लड़की अपनी त्वचा और बालों को लेकर तभी आत्मविश्वास महसूस कर पा रही थी जब वो इन मापदंडों में फ़िट हो रही थी। लड़कियां कक्षाओं के बीच में भी आइब्रोज़ की बात करती थीं या अगर किसी के पैरों पर बाल दिख गए तो वो शर्मिंदा महसूस करती थीं। धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि ये सिर्फ़ व्यक्तिगत चिंता नहीं थी। दरअसल, पितृसत्ता और उपभोक्तावाद मिलकर हमें ये बताते हैं कि हमारा ‘शरीर’ कैसे होना चाहिए या किस शरीर को हम ‘सुंदर’ कह सकते हैं। सौंदर्य उद्योग ने इन असुरक्षाओं को व्यवसाय में बदल दिया। खास बात तो ये भी है कि ये मापदंड सबके लिए एक जैसे नहीं हैं।

गोरी त्वचा वाली लड़कियों को भाग्यशाली माना जाता है, जबकि सांवली लड़कियों को लगातार ब्लीच और फ़ेयरनेस क्रीम की सलाह दी जाती है। मोटी लड़कियों को फ़िट होने का दबाव का सामना करना पड़ता है, वहीं पतली लड़कियों को कमज़ोर कहा जाता है। विकलांग महिलाओं के शरीर को तो अक्सर बातचीत और मुख्यधारा से ही बाहर रखा जाता है, जैसे उनकी सुंदरता मायने ही न रखती हो। ये मापदंड वर्ग और जाति से भी गहराई से जुड़े हैं जहां सभ्य या सुसंस्कृत दिखना एक ख़ास तरह के सामाजिक और आर्थिक विशेषाधिकार की निशानी बन जाता है। घर के अंदर हो या बाहर, हर जगह लड़कियों का रंग, शारीरिक बाल, शरीर की बनावट—ये सब हमेशा एक मुद्दा बन जाता है।

पुरुषों के शरीर के बाल मर्दानगी की पहचान माने जाते हैं, जबकि महिलाओं के शरीर के बाल शर्म की वजह बना दिए जाते हैं। पुरुष अपने शरीर के साथ जैसे हैं, वैसे जी सकते हैं। लेकिन महिलाओं से हर दिन यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने शरीर को “ठीक” करें, “साफ़” रखें और समाज के बनाए सुंदरता के पैमानों पर खरा उतरें।

दोहरे मापदंड की सच्चाई

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शरीर को लेकर बनाए गए ये सारे नियम सिर्फ़ महिलाओं के लिए होते हैं। पुरुषों के शरीर के बाल मर्दानगी की पहचान माने जाते हैं, जबकि महिलाओं के शरीर के बाल शर्म की वजह बना दिए जाते हैं। पुरुष अपने शरीर के साथ जैसे हैं, वैसे जी सकते हैं। लेकिन महिलाओं से हर दिन यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने शरीर को “ठीक” करें, “साफ़” रखें और समाज के बनाए सुंदरता के पैमानों पर खरा उतरें। यह दोहरा मापदंड कोई संयोग नहीं है। यह पितृसत्ता की एक सोची-समझी रणनीति है। जब महिलाओं की पूरी ऊर्जा अपने शरीर को समाज के लिए स्वीकार्य बनाने में लग जाती है, तो उनके पास अपने अधिकारों के लिए सोचने, बोलने और लड़ने की जगह ही नहीं बचती। इसीलिए अपने शरीर के बालों को स्वीकार करना सिर्फ़ एक निजी पसंद नहीं है। यह एक राजनीतिक कदम भी है। यह उस झूठ को तोड़ने का तरीका है जिसमें कहा जाता है कि महिलाओं का शरीर दूसरों की नज़र और पसंद के लिए है, न कि खुद उनके लिए।

मेट्रो में वो एक पल और मेरी आज़ादी

मुझे आज भी एक घटना साफ़ याद है। दिल्ली में मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान एक दिन मैं मेट्रो में स्कर्ट पहनकर बैठी थी। सामने बैठी कुछ महिलाओं की नज़र मेरे पैरों पर गई और वहीं टिक गई। उनके चेहरे पर हैरानी और नापसंदगी साफ़ दिख रही थी। वे आपस में फुसफुसाने लगीं। उस पल मुझे महसूस हुआ कि मेरे पैरों के बाल, जो पूरी तरह सामान्य और स्वाभाविक थे, किसी के लिए चर्चा का विषय बन सकते हैं। यह सोच अजीब लगी कि जो चीज़ इतनी प्राकृतिक है, वह समाज को इतनी असहज क्यों करती है। मैंने पहले ही तय कर लिया था कि इन बातों से मुझे फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन उस दिन उन नज़रों ने मुझे परेशान किया। इसलिए नहीं कि मुझे लगा मैं गलत हूं, बल्कि इसलिए कि मुझे यह एहसास हुआ कि समाज को लगता है कि उसे मेरे शरीर पर राय देने का अधिकार है।

सामने बैठी कुछ महिलाओं की नज़र मेरे पैरों पर गई और वहीं टिक गई। उनके चेहरे पर हैरानी और नापसंदगी साफ़ दिख रही थी। वे आपस में फुसफुसाने लगीं।

जब से यह आत्मविश्वास मेरे भीतर आया है, मैं चाहती हूं कि और लोग भी यह समझें कि किसी और की सोच या नज़र हमारे शरीर को सही या गलत तय नहीं कर सकती। हमें खुद को इन बेकार के मापदंडों में ढालने की ज़रूरत नहीं है। मैंने यह फ़ैसला लिया है कि मैं अपने शरीर के साथ वही करूंगी जो मुझे सही लगता है। अगर मुझे कुछ करना होगा, तो अपने लिए करूंगी। आज 29 साल की उम्र में जब मैं अपनी शर्तों पर जीती हूं, तो मुझे एक अलग तरह की खुशी मिलती है। यह सिर्फ़ शरीर के बालों की बात नहीं है। यह उन सभी ज़रूरतों और मजबूरियों को ठुकराने की बात है जो पितृसत्ता ने महिलाओं पर थोप दी हैं। यह उन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करने की आज़ादी है जो कहती हैं, लड़की होकर ऐसे रहती हो?

मेरा शरीर, मेरा अधिकार

मैंने यह सीखा है कि मेरे शरीर पर सबसे पहला और आख़िरी अधिकार सिर्फ़ मेरा है। मुझे तय करना है कि मैं क्या करूँगी और क्या नहीं। और अगर मैं कुछ भी नहीं करना चाहती, तो वह भी मेरा ही फ़ैसला है। यही मेरा फेमिनिस्ट जॉय है। अपने शरीर पर अपना अधिकार। अपनी शर्तों पर जीने की आज़ादी। और यह भरोसा कि मेरी खूबसूरती किसी और के मापदंड से नहीं, बल्कि मेरे आत्मविश्वास और आत्म-स्वीकृति से तय होती है। जिस दिन हम अपने शरीर को लेकर लोगों की बातों को नज़रअंदाज़ करना सीख लेते हैं, उस दिन हम पितृसत्ता के एक बड़े हथियार को बेअसर कर देते हैं। यही असली आज़ादी है—अपने शरीर के साथ प्यार से रहना, उसे जैसा है वैसा स्वीकार करना, और दूसरों की राय से ज़्यादा अपनी खुशी को अहमियत देना। यही छोटी-छोटी आज़ादियां हमें वह ताक़त देती हैं, जिससे हम अपने लिए खड़े हो पाते हैं, अपनी आवाज़ उठा पाते हैं और समाज के बनाए नियमों को चुनौती दे पाते हैं।

Comments:

  1. Very well articulated, truly inspiring as coming from someone who breaks such stereotypes everyday!

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