मध्यकालीन भारत, मुग़ल शासन के दौरान अपनी चित्रकला के लिए एशिया से लेकर यूरोप तक जाना जाता था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के तौर पर मुग़ल काल की जितनी भी चित्रकला हम आम तौर पर देखते हैं। वह सभी ज़्यादार पुरुष चित्रकारों की बनाई हुई हैं। ऐसा माना जाता है कि मुगल काल में चित्रकला को पेशे के रूप में अपनाने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम थी। जबकि इतिहासकारों का मानना है कि मुगल ज़नाना (महिलाओं के रहने का अलग स्थान) में महिलाएं भी पुरुषों की तरह ही चित्रकला में रुचि रखती थीं। वह कलाकृतियां बनवाती थीं और यहां तक कि खुद चित्रकारी भी करती थीं। मुग़ल काल की 17वीं शताब्दी की एक किताब मुराक़्क़ा-ए-गुलशन में उस काल की महिला चित्रकारों और उनके काम के बारे में जानकारी मिलती है। इस किताब को मुग़ल बादशाह जहांगीर के दौर में लिखा गया था। इससे पता चलता है कि महिला चित्रकार भी कला के क्षेत्र में मौजूद थी।
इतिहास में हमेशा से ही महिलाओं की उपस्थिति और योगदान को नजरअंदाज किया गया है। कला का इतिहास भी ऐसा ही रहा है, जहां पुरुषों के योगदान और भागीदारी को बखूबी दर्ज किया गया है। वहीं इतिहास में महिलाओं को कला संरक्षक और कलाकार दोनों रूपों में पर्याप्त जगह नहीं मिली है। इस पर नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ का कहना था कि, इतिहास के हर काल और समय में महिलाएं अक्सर गुमनाम थीं। इसका मतलब इतिहास, में महिलाओं की भूमिका, काम और योगदान को पुरुषों की तरह न तो सराहा गया और न बराबर स्थान दिया। इसके बाबजूद इतिहास के कला क्षेत्र में मध्यकालीन भारत के मुग़ल शासन के दौरान कुछ ऐसी महिला चित्रकार हुई, जिन्होंने मुग़ल कला को महिलाओं के नजरिए से रचा और कला क्षेत्र में, पुरुषों की तरह अपनी एक महिला चित्रकार के तौर पर पहचान बनाई।
मुग़ल काल की 17वीं शताब्दी की एक किताब मुराक़्क़ा-ए-गुलशन में उस काल की महिला चित्रकारों और उनके काम के बारे में जानकारी मिलती है। इस किताब को मुग़ल बादशाह जहांगीर के दौर में लिखा गया था। इससे पता चलता है कि महिला चित्रकार भी कला के क्षेत्र में मौजूद थीं।
साहिफ़ा बानू
साहिफ़ा बानू मुग़ल बादशाह जहांगीर के शासनकाल की महिला कलाकारों में से सबसे प्रसिद्ध चित्रकार थीं। उनके कला चित्रण अनोखे हैं, मध्यकालीन ऐतिहासिक साक्ष्यों में ऐसी चार पेंटिंग मिली हैं, जिन्हें उन्होंने बनाया था। उनकी चित्रकारी में नारीवादी दृष्टिकोण साफ दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर उनकी एक पेंटिंग जिसमें, महिला अपना चित्र बना रही है। जबकि उसकी सेविका दर्पण पकड़े उसके सामने खड़ी है। इस पेंटिंग में उन्होंने महिला कक्ष का चित्रण किया है। उनकी बनाई गई बाकि पेंटिंग हमें एक ऐसी दुनिया की अनूठी झलक प्रदान करती हैं, जो काफी हद तक उस दौर में महिलाओं के लिए बंद थी।
इससे जुड़ी हुई, पहली पेंटिंग पिता के शोक में डूबे पुत्र की है, जो फारसी कविता मंतिक अल-तैर (पक्षियों का सम्मेलन) के एक दृश्य को सामने लाती है। कविता एक पक्षी की मृत्यु के भय को व्यक्त करता है। दूसरी पेंटिंग खवारनाक़ किले का निर्माण और तीसरी पेंटिंग ईरान के शाह तहमास की है। साहिफ़ा बानू की बनाई गई, यह सभी पेंटिंग्स लगभग 17 वीं शताब्दी के दौरान बनाई गई थीं, जो आज अलग-अलग देशों के संग्रहलयों में मौजूद हैं और एक होनहार महिला कलाकार के तौर में मुग़ल दरबार में उनकी मौजूदगी का प्रमाण दे रही हैं। ये पेंटिंग साहिफ़ा बानू की एक चित्रकार के रूप में बुद्धिमत्ता, कौशल और बारीकियों पर ध्यान देने की क्षमता को साफ़ तौर पर दिखाती हैं।
साहिफ़ा बानू की एक पेंटिंग में, महिला अपना चित्र बना रही है। जबकि उसकी सेविका दर्पण पकड़े उसके सामने खड़ी है। इस पेंटिंग में उन्होंने महिला कक्ष का चित्रण किया है। उनकी बनाई गई बाकि पेंटिंग हमें एक ऐसी दुनिया की अनूठी झलक प्रदान करती हैं, जो काफी हद तक उस दौर में महिलाओं के लिए बंद थी।
रुकैया बानू
अमेरिकन कला इतिहासकार मीका नैटिफ अपनी किताब मुगल ऑक्सीडेंटलिज़्म में मुग़ल कलाकार रुकैया बानू और उनकी दो प्रसिद्ध पेंटिंग्स के बारे में जानकारी देती हैं, जिसमें पहली बैठे हुए यूरोपीय नग्न पुरुष की पेंटिंग है, जिसको रुकैया बानू ने 17 वीं शताब्दी में बनाया था। यह पेंटिंग फ्लेमिश कलाकार जोहान्स सैडेलर की एक उत्कीर्णन कृति पर आधारित है, जो स्वयं क्रिसपिन वैन डेन ब्रोएक की एक अन्य पेंटिंग पर आधारित है। नैटिफ का कहना है, कि ये दोनों पुरुष देखने में एक जैसे लग सकते हैं। लेकिन वे दो बिल्कुल अलग-अलग अवधारणाओं को व्यक्त करते हैं। कला इतिहासकार येल राइस, इन युरोपियन शैली की पेंटिंग्स को मुग़ल शैली में बनाने बाली, इन महिला चित्रकारों के चित्रण को विसंगतियां कहा, उनके हिसाब से यह नकल नहीं है।
महिला मुग़ल कलाकार अपनी अनोखी कला के ज़रिए मौजूदा पेंटिंग को नए अर्थ, रूप और विषय के साथ सामने लाती हैं। उदाहरण के तौर पर, रुकैया बानू की मुग़ल चित्रकला शैली में मांसल पुरुष के शरीर पर दिया जाने वाला ज़ोर साफ़ तौर पर कम हो जाता है। इससे उनकी पेंटिंग्स में एक चिंतनशील और शांत माहौल बनता है। गुलशन एल्बम में मिली एक नग्न आकृति को भी रुकैया बानू का बनाया हुआ माना जाता है। यह ‘अहमद चित्रकार’ के बनाए गए रेखाचित्रों के साथ एक मिश्रित चित्र का हिस्सा है, जो उनकी कलात्मकता को दिखता है।
अमेरिकन कला इतिहासकार मीका नैटिफ अपनी किताब मुगल ऑक्सीडेंटलिज़्म में मुग़ल कलाकार रुकैया बानू और उनकी दो प्रसिद्ध पेंटिंग्स के बारे में जानकारी देती हैं, जिसमें पहली बैठे हुए यूरोपीय नग्न पुरुष की पेंटिंग है, जिसको रुकैया बानू ने 17 वीं शताब्दी में बनाया था।
नूरी नादिरा बानो
द हेरिटेज लैब में छपे एक लेख के मुताबिक, नूरी नादिरा बानो मुग़ल दरबार की 17 वीं शताब्दी की एक महिला चित्रकार और प्रसिद्ध मुग़ल चित्रकार आक़ा रिज़ा की छात्रा थी। कला इतिहासकार प्रोफेसर कविता सिंह गुलशन एल्बम में यूरोपीय और ईसाई चित्रकला पर आधारित एक मिश्रित पेंटिंग संत मैथ्यू की पेंटिंग के बारे में जानकारी देती है, जिसे नादिरा बानो ने बनाया था। इस चित्र में नूरी नादिरा बानो के हस्ताक्षर भी दिखाई देते हैं,जिसमें वह खुद को प्रसिद्ध मुग़ल चित्रकार आक़ा रिज़ा की छात्रा के रूप में दिखाती है।
नीनी
नीनी मुग़ल बादशाह शाहजहां के समय की एक जानी मानी महिला कलाकार थी। उनको मुग़ल चित्रकला कला को यूरोपियन शैली में बनाने के लिए जाना जाता है। इसके साथ वह मुग़ल दरबार में अपनी लघु चित्रकला शैली के लिए प्रसिद्ध थी। इसके साथ ही उनको संत सेसिलिया की शहादत नामक पेंटिंग के लिए जाना जाता है। हालांकि मुख्य तौर पर इस पेंटिंग को हिरोनिमस वियरिक्स ने बनाया था। नीनी ने उत्कीर्ण चित्र की प्रतिकृति की थी। इस पेंटिंग में समानता होने के बावजूद यह कई मायनों में अलग थी। उदाहरण तौर पर उन्होंने पेंटिंग की कला में संत के गर्दन के घावों को हटाकर चित्र में हिंसा को सीमित कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने चित्र के नीचे की सुलेख में अमीर खुसरो की ग़ज़ल लिखी।
नीनी मुग़ल बादशाह शाहजहां के समय की एक जानी मानी महिला कलाकार थी। उनको मुग़ल चित्रकला कला को यूरोपियन शैली में बनाने के लिए जाना जाता है। इसके साथ वह मुग़ल दरबार में अपनी लघु चित्रकला शैली के लिए प्रसिद्ध थी। इसके साथ ही उनको संत सेसिलिया की शहादत नामक पेंटिंग के लिए जाना जाता है।
ग़ज़ल का विषय प्रेम के कारण होने वाले त्याग और पीड़ा को दिखाता है। इस तरह से मूल पेंटिंग का विषय शहादत, उनकी पेंटिंग में बदलकर प्रेम से होने वाली पीड़ा और त्याग में बदल जाता है। यह उनकी चित्रकला में नारीवादी दृष्टिकोण को दिखाने के साथ उनकी कला और साहित्य की गहरी समझ को दिखाता है। मुग़ल चित्रकला पर यूरोपियन शैली के प्रभाव पर इतिहासकार मीका नैटिफ मानती है कि, यूरोपीय उत्कीर्ण चित्र की उदासी के विपरीत, इस चित्रकला में प्रकाश और सुंदरता का संचार होता है, और पात्रों के चेहरे के भाव कोमल और शांत प्रतीत होते हैं। इस अनोखी कला शैली को बनाने में नीनी जैसी मुग़ल महिला चित्रकारों का अहम योगदान है।
खुर्शीद बानू
चित्रकार खुर्शीद बानू के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्यों से बहुत कम जानकारी मिलती है। वह अपनी पेंटिंग में हाथियों को चित्रित करती थीं । ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि मुगल काल में हाथियों की लड़ाई दरबारी मनोरंजन में काफी लोकप्रिय थी। खुर्शीद बानू अपनी पेंटिंग में दो हाथियों के बीच एक रोमांचक लड़ाई को दिखाती है, जिसमें महावत (हाथी प्रशिक्षक) अपने हाथियों को उकसा रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि, दो हाथियों की लड़ाई वाली इस पेंटिंग को खुर्शीद बानू ने बनाया । वर्तमान में उनकी यह पेंटिंग हॉवर्ड होडकिन संग्रह का हिस्सा है।
मुग़ल काल की चित्रकला केवल पुरुष कलाकारों तक सीमित नहीं थी। ज़नाना के भीतर रहते हुए भी कई महिलाएं चित्र बना रहीं थीं और अपनी कला के माध्यम से अलग नज़रिया पेश कर रही थीं। साहिफ़ा बानू, रुकैया बानू, नूरी नादिरा बानो, नीनी और खुर्शीद बानू जैसी महिला चित्रकार इस बात का प्रमाण हैं कि मुग़ल कला में महिलाओं की भी अहम भूमिका थी। इतिहास में इन्हें भुला दिया गया, लेकिन आज ज़रूरत है कि हम कला के इतिहास को महिलाओं की भागीदारी के साथ दोबारा देखें।

