इंटरसेक्शनलजेंडर ‘छिपी हुई बेरोजगारी’ और महिलाओं को होती समस्याएं और चुनौतियां

‘छिपी हुई बेरोजगारी’ और महिलाओं को होती समस्याएं और चुनौतियां

भारतीय समाज में महिलाओं का श्रम सबसे अधिक दिखाई देने के बावजूद सबसे कम पहचाना जाता है। खेतों से लेकर घर और पारिवारिक उद्यमों तक, महिलाएं उत्पादन की हर प्रक्रिया में शामिल होती हैं, फिर भी उन्हें स्वतंत्र श्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि केवल 'मदद करने वाली' के रूप में देखा जाता है।

उत्तर भारत के किसी गाँव के एक छोटे से खेत की कल्पना कीजिए। वहां एक पूरा परिवार- माता, पिता, दो बेटे और एक बेटी तपती धूप में फसल काटते दिख जाएंगे। अमूमन किसी भी देखने वाले को लगेगा कि पूरा परिवार बेहद मेहनती है और सभी लोग रोजगार में हैं। इसी तरह शहर की किसी छोटी परचून की दुकान के गद्दी पर बैठे पिता के साथ सामान तौलता बेटा भी काम में व्यस्त दिखाई देता है। बाहर से सब कुछ सामान्य और उत्पादक लगता है, लेकिन वास्तविकता की परतें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि उस छोटे से खेत या दुकान में जितना काम है, उसे परिवार के आधे सदस्य ही आसानी से कर सकते हैं। बाकी सदस्यों के वहां होने या न होने से कुल उपज या कमाई पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। अर्थशास्त्र की शब्दावली में इस स्थिति को प्रच्छन्न बेरोज़गारी या ‘छिपी हुई बेरोजगारी’ कहा जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो यह वह अवस्था है, जब किसी काम में जरूरत से अधिक लोग लगे होते हैं और इन अतिरिक्त लोगों का कुल उत्पादन में कोई वास्तविक योगदान नहीं होता। लेकिन, क्या यह केवल आंकड़ों का खेल है? असल में हिडन अनेमपलॉयमेंट या प्रच्छन्न बेरोज़गारी महज एक आर्थिक विसंगति नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में गहरे पैठ जमाए बैठे पितृसत्तात्मक ढांचे, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सीधा परिणाम है। लेकिन, ये पुरुषों और महिलाओं में एक सा नहीं होता और न ही उन्हें एक जैसा प्रभावित करता है। भारत में महिलाओं में छिपी हुई बेरोज़गारी एक गंभीर, सिस्टम से जुड़ा मुद्दा है, जहां महिलाएं ऐसे काम में लगी होती हैं जो आम तौर पर खेती या घर से जुड़े अनौपचारिक काम होते हैं, जिनमें उनकी पूरी प्रोडक्टिव क्षमता का इस्तेमाल नहीं होता। उन्हें न ही कोई औपचारिक मेहनताना मिलता है और उनका आर्थिक आउटपुट में बहुत कम योगदान होता है।

उत्पादकता की प्रचलित अवधारणा यही मानती है कि केवल वही काम महत्वपूर्ण है, जिसके बदले में धन मिलता है। लेकिन, हमें यह बुनियादी सवाल पूछना होगा कि क्या परिवार का भरण-पोषण, बुजुर्गों की सेवा या समाज के लिए किया गया सहयोग उत्पादक नहीं है?

मुख्यधारा में अर्थशास्त्र की सीमाएं

मुख्यधारा का अर्थशास्त्र अक्सर सकल घरेलू उत्पाद और बड़े आर्थिक सर्वेक्षणों के आंकड़ों पर बहुत अधिक निर्भर रहता है। यह दृष्टिकोण श्रम की ज़मीनी सामाजिक सच्चाइयों को पूरी तरह नज़रअंदाज कर देता है। जब हम विकास को केवल बाज़ार और नकद लेन देन के चश्मे से देखते हैं, तो हम अनजाने में उस विशाल श्रम शक्ति को अदृश्य कर देते हैं जो घरों और खेतों के भीतर खामोशी से काम कर रही है। उत्पादकता की प्रचलित अवधारणा यही मानती है कि केवल वही काम महत्वपूर्ण है, जिसके बदले में धन मिलता है। लेकिन, हमें यह बुनियादी सवाल पूछना होगा कि क्या परिवार का भरण-पोषण, बुजुर्गों की सेवा या समाज के लिए किया गया सहयोग उत्पादक नहीं है? वास्तव में, किस श्रम का मूल्य है और किसका नहीं, यह तय करने वाला कोई निष्पक्ष आर्थिक नियम नहीं है, बल्कि यह हमारी सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है। यही कारण है कि अर्थशास्त्र में जिसे प्रच्छन्न बेरोजगारी कहा जाता है, वह अक्सर महिलाओं और वंचित समुदायों की मेहनत को जानबूझकर कम आंकने का ही एक रूप होता है।

महिलाओं का अदृश्य श्रम

भारतीय समाज में महिलाओं का श्रम सबसे अधिक दिखाई देने के बावजूद सबसे कम पहचाना जाता है। खेतों से लेकर घर और पारिवारिक उद्यमों तक, महिलाएं उत्पादन की हर प्रक्रिया में शामिल होती हैं, फिर भी उन्हें स्वतंत्र श्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि केवल ‘मदद करने वाली’ के रूप में देखा जाता है। कृषि क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है। पुरुषों के शहरों की ओर पलायन करने के कारण खेतों का अधिकतर काम महिलाओं के कंधों पर आ गया है। बीज बोने से लेकर कटाई और पशुपालन तक महिलाएं सक्रिय भूमिका निभाती हैं। इसके बावजूद ज़मीन का मालिकाना हक अमूमन पुरुषों के नाम पर होता है और ‘किसान’ की पहचान भी उन्हीं को मिलती है। यदि महिलाएं खेत से हट भी जाएं, तो उत्पादन पर असर पड़ेगा। लेकिन, फिर भी उनका श्रम आंकड़ों में दर्ज नहीं होता। एक ग्रामीण महिला का जीवन इस वास्तविकता को और स्पष्ट करता है। अमूमन ग्रामीण खेतिहर महिला मजदूर सुबह-सुबह उठकर पशुओं की देखभाल करती है, घर संभालती है और फिर खेतों में काम करती है। दिन के सोलह से अठारह घंटे काम करने के बावजूद सरकारी आंकड़ों में वह अक्सर ‘गृहिणी’ या ‘आंशिक रूप से नियोजित’ कहलाती है।

एच. वागीशन और गेडम कमलाकर (2025) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी पिछले दो दशकों में लगभग 10 प्रतिशत गिरकर 29 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। इसका मूल कारण यह है कि 72 प्रतिशत महिलाएं अवैतनिक कामों में लगी हैं।

एच. वागीशन और गेडम कमलाकर (2025) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी पिछले दो दशकों में लगभग 10 प्रतिशत गिरकर 29 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। इसका मूल कारण यह है कि 72 प्रतिशत महिलाएं अवैतनिक कामों में लगी हैं। महिलाएं पुरुषों के मुकाबले तीन गुना अधिक देखभाल काम करती हैं जिसे अर्थव्यवस्था में गिना ही नहीं जाता। यदि इस अदृश्य श्रम को मान्यता मिले और महिलाएं समान रूप से कार्यबल में शामिल हों तो भारतीय अर्थव्यवस्था में 770 बिलियन डॉलर की ऐतिहासिक वृद्धि संभव है। इसके अलावा, बेरिक, सेगुइनो और रॉजर्स (2009) के शोध के अनुसार, साल 1975 से 1995 के बीच कुछ अर्थव्यवस्थाओं में लिंग आधारित वेतन अंतर और आर्थिक विकास में एक सकारात्मक संबंध पाया गया था क्योंकि महिलाओं को कम वेतन देने से मुनाफा बढ़ता था। यह साबित करता है कि बाज़ार का ढांचा ही शोषण पर टिका है।

क्वीर समुदाय और बाध्यकारी बेरोज़गारी

प्रच्छन्न बेरोज़गारी की चर्चा जब जेंडर के दायरे में की जाती है, तो प्रायः महिलाओं तक सीमित रह जाती है। किंतु क्वीर और ट्रांस समुदाय का अनुभव इस समस्या को एक और गहरी तथा हिंसक परत प्रदान करता है। यहां प्रच्छन्न बेरोज़गारी केवल अदृश्य श्रम की नहीं, बल्कि बाध्यकारी चुप्पी और सामाजिक बहिष्कार की कहानी है। औपचारिक कार्यस्थलों में व्यापक भेदभाव के कारण, शिक्षा और योग्यता होने के बावजूद कई क्वीर लोगों को नौकरी नहीं मिलती। मजबूरन, कई क्वीर व्यक्ति जो अभी भी अपने परिवारों के साथ रहते हैं, पारिवारिक व्यवसायों या खेती में ‘शरण’ लेने को विवश होते हैं। वे दुकान पर बैठते हैं या घरेलू उद्यमों में हाथ बंटाते हैं, पर यह काम उनकी रुचि या प्रतिभा के अनुसार नहीं होता। वे वहां इसलिए हैं क्योंकि बाहर की दुनिया उन्हें स्वीकार नहीं करती। उनका श्रम परिवार के लिए उपयोगी हो सकता है, पर उनके स्वयं के विकास के लिए वह एक बंधन बन जाता है।

कौस्तुभ राजपूत के शोध के अनुसार, इस सामाजिक बहिष्कार के कारण देश को अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.7 प्रतिशत तक का नुकसान उठाना पड़ता है। 60 प्रतिशत लोगों ने स्कूल में उत्पीड़न का सामना किया, जिससे उनकी पढ़ाई और कौशल विकास बाधित हुआ। भेदभाव के कारण 71 प्रतिशत लोग विदेश जाकर बसने का प्रयास कर रहे हैं, जो देश के लिए एक बड़ी प्रतिभा की हानि है। जब समाज किसी के लिए रोज़गार के दरवाजे बंद कर देता है और वह व्यक्ति मजबूरी में बधाई मांगने या यौन कार्य जैसे विकल्पों को चुनता है, तो यह भी एक प्रकार की प्रच्छन्न बेरोज़गारी और अल्प रोज़गार ही है।

असल में हिडन अनेमपलॉयमेंट या प्रच्छन्न बेरोज़गारी महज एक आर्थिक विसंगति नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में गहरे पैठ जमाए बैठे पितृसत्तात्मक ढांचे, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सीधा परिणाम है।

पुरुषों के लिए प्रोवाइडर होने का बोझ

नारीवादी विश्लेषण यह भी देखता है कि पितृसत्ता पुरुषों पर भी एक अमानवीय बोझ डालती है। समाज ने पुरुषों के लिए केवल एक ही परिभाषा गढ़ रखी है घर का भरण पोषण करने वाला। बेरोज़गार कहलाने की शर्म किसी भी पुरुष के लिए भी असहनीय होती है। खाली बैठने के ताने से बचने के लिए, लाखों युवा पुरुष उन पारिवारिक खेतों या पुश्तैनी दुकानों में काम करने का दिखावा करते हैं, जहां उनकी वास्तव में कोई आवश्यकता नहीं होती। वे जानते हैं कि वहां उनकी उत्पादकता शून्य है, लेकिन समाज की नजरों में खुद को व्यस्त दिखाने के लिए वे इस निरर्थक श्रम में फंस जाते हैं। यह स्थिति पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा आघात करती है, क्योंकि उन पर जल्द से जल्द परिवार का पेट पालने का दबाव होता है और वे अपनी पसंद का करियर नहीं चुन पाते।

भारतीय संदर्भ में श्रम की चर्चा जाति के बिना अधूरी है। स्क्रॉल डॉट इन पर उपलब्ध एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 60 प्रतिशत दलित परिवारों के पास अपनी कोई कृषि भूमि नहीं है और 70 प्रतिशत केवल खेतिहर मजदूर बनकर रह गए हैं। भूमि सुधार कानूनों की विफलता के कारण महाराष्ट्र के मराठवाड़ा सहित कई राज्यों में हजारों दलित परिवार दशकों से सरकारी चरागाह भूमि पर खेती कर अपना पेट पाल रहे हैं। विडंबना यह है कि प्रशासन अब वनीकरण और पौधारोपण के नाम पर इन भूमिहीन किसानों से वह जमीन भी छीन रहा है, जबकि कई जगहों पर दलितों को आवंटित पट्टों पर आज भी दबंगों का ही कब्ज़ा बना हुआ है। दलित और बहुजन समुदायों के पास अमूमन अपनी कृषि भूमि नहीं होती, इसलिए उन्हें दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता है। वहां श्रमिकों की संख्या आवश्यकता से अधिक होने पर भी वे काम में लगे रहते हैं, जो प्रच्छन्न बेरोज़गारी को जन्म देता है।

इसके उलट, कथित ऊंची जातियों में महिलाओं को प्रतिष्ठा के नाम पर घर की चारदीवारी में कैद कर दिया जाता है। वे घर के भीतर देखभाल और प्रबंधन का काम करती हैं, लेकिन इसे आर्थिक गतिविधि नहीं माना जाता। यहां जातिगत अहंकार महिलाओं की प्रतिभा को कुचलकर उन्हें प्रच्छन्न बेरोज़गारी का शिकार बना देता है। प्रच्छन्न बेरोज़गारी केवल आर्थिक असंतुलन नहीं है, बल्कि यह श्रम की गरिमा और मानवाधिकार का प्रश्न है। जब कोई व्यक्ति दिन भर काम करता है फिर भी उसे कामकाजी नहीं माना जाता, तो यह उसके अस्तित्व का अवमूल्यन है। इस स्थिति को बदलने के लिए हमें श्रम की परिभाषा व्यापक बनानी होगी। महिलाओं के घरेलू और देखभाल कार्यों को ‘काम’ के रूप में मान्यता देनी होगी। क्वीर समुदाय के लिए कार्यस्थल पर भेदभाव विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करना होगा ताकि उन्हें पारिवारिक संरचनाओं में छिपना न पड़े। साथ ही, कौशल विकास की नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो जेंडर के आधार पर भेदभाव न करें। जब तक समाज श्रम को सम्मान और गरिमा के साथ नहीं देखेगा और हम अपने आस पास के काम को सही नज़रिए से देखना शुरू नहीं करेंगे, तब तक प्रच्छन्न बेरोज़गारी हमारे सामाजिक ढांचे में छिपी रहेगी।

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