स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य क्या भारत में एपिसियोटॉमी का हो रहा है अंधाधुंध इस्तेमाल?

क्या भारत में एपिसियोटॉमी का हो रहा है अंधाधुंध इस्तेमाल?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने साल 2018 में सिफारिश की थी कि सभी प्रसवों में से 10 प्रतिशत से कम मामलों में ही एपिसियोटॉमी की जानी चाहिए। अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी ने भी साल 2006 में इसी तरह की सलाह दी थी। इसके बावजूद, व्यवहार में इन सिफारिशों का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है।

एपिसियोटॉमी प्रसव के दौरान वजाइनल ओपनिंग (योनि द्वार) और एनस (गुदा) के बीच के ऊतक (टिश्यू) में लगाया जाने वाला एक चीरा है। इस हिस्से को पेरिनियम कहा जाता है। आज के समय में लगभग हर माँ इस शब्द से परिचित है। एपिसियोटॉमी की शुरुआत कुछ जटिल मामलों में डिलीवरी को आसान बनाने के लिए की गई थी। जब बच्चा बाहर आने में कठिनाई होती थी या प्रसव बहुत लंबा हो जाता था, तब डॉक्टर इस चीरे का सहारा लेते थे। लेकिन आज भारत में कई जगहों पर इसे सुविधा के लिए नियमित प्रक्रिया (रूटीन) बना दिया गया है।

सीज़ेरियन सेक्शन के बाद, प्रसूति विज्ञान में एपिसियोटॉमी दूसरी सबसे आम शल्य प्रक्रिया मानी जाती है। इसकी शुरुआत साल 1742 में मानी जाती है, जब दाई सर फील्डिंग ओल्ड ने ऐसे मामलों में इसका वर्णन किया, जिनमें योनि का द्वार संकरा होने के कारण प्रसव खतरनाक रूप से लंबा हो जाता था। बीसवीं शताब्दी में, जब प्रसव घरों से अस्पतालों में होने लगा, तब इसका उपयोग तेजी से बढ़ा। 1920 के दशक में अस्पतालों में इसे नियमित रूप से अपनाया गया।

मुझे डिलीवरी के दौरान कोई जटिलता नहीं थी। यह मेरा पहला बच्चा भी नहीं था। मैंने डॉक्टर से कहा था कि मुझे एपिसियोटॉमी न किया जाए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने एपिसियोटॉमी कर दी।”

उस समय के प्रसिद्ध प्रसूति विशेषज्ञ जोसेफ डीली ने भ्रूण के मस्तिष्क और माँ के श्रोणि तल की रक्षा के लिए इसकी सिफारिश की। डाइटहेल्म ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा कि एपिसियोटॉमी एक स्थापित प्रक्रिया है और इसे किसी बचाव की जरूरत नहीं है। धीरे-धीरे यह प्रक्रिया बिना ठोस वैज्ञानिक प्रमाण के ही प्रसूति देखभाल का एक सामान्य हिस्सा बन गई। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और स्वीडन जैसे विकसित देशों में एपिसियोटॉमी केवल खास परिस्थितियों में ही की जाती है। वहां इसे नियमित प्रक्रिया के रूप में नहीं अपनाया जाता।

लेकिन कई विकासशील देशों में आज भी एपिसियोटॉमी की दर काफी अधिक है। ग्लोबल नेटवर्क फॉर वीमेन एंड चिल्ड्रेन हेल्थ रिसर्च साइट्स (2003) के तहत भारत सहित 11 विकासशील देशों में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं में एपिसियोटॉमी की दर 90 प्रतिशत से अधिक थी। कुल मिलाकर यह दर लगभग 40 प्रतिशत थी। भारत में अस्पतालों में होने वाले प्रसव के दौरान एपिसियोटॉमी के उपयोग और उससे होने वाली तुरंत जटिलताओं के बारे में पर्याप्त और स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने साल 2018 में सिफारिश की थी कि सभी प्रसवों में से 10 प्रतिशत से कम मामलों में ही एपिसियोटॉमी की जानी चाहिए। अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी ने भी साल 2006 में इसी तरह की सलाह दी थी। इसके बावजूद, व्यवहार में इन सिफारिशों का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है।

भारत में एपिसियोटॉमी की स्थिति

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने साल 2018 में सिफारिश की थी कि सभी प्रसवों में से 10 प्रतिशत से कम मामलों में ही एपिसियोटॉमी की जानी चाहिए। अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी ने भी साल 2006 में इसी तरह की सलाह दी थी। इसके बावजूद, व्यवहार में इन सिफारिशों का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है। दुनियाभर में एपिसियोटॉमी की दरें अभी भी सुझाई गई सीमा से अधिक हैं। उदाहरण के लिए, फ्रांस में यह दर लगभग 20 प्रतिशत, ब्राजील में 54 प्रतिशत, कंबोडिया में 90 प्रतिशत और ताइवान में 100 प्रतिशत तक बताई गई है। भारत में औसतन एपिसियोटॉमी की दर लगभग 40 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि पहली बार गर्भवती महिलाओं में यह दर 90 प्रतिशत से अधिक है। सरकारी आंकड़ों से अलग, अगर जमीनी हकीकत की बात करें तो कई जगहों पर नई माताओं में एपिसियोटॉमी की दर 99 प्रतिशत तक बताई जाती है। कई अस्पतालों में पहली बार मां बनने वाली महिलाओं के साथ लगभग हर मामले में एपिसियोटॉमी की जाती है।

क्या कहता है शोध?

हमने दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली 100 नई माताओं और 100 ऐसी महिलाओं पर शोध किया, जिनकी आखिरी डिलीवरी साल 2020 से पहले हुई थी। इस अध्ययन में निजी और सरकारी, दोनों तरह के अस्पतालों में प्रसव कराने वाली महिलाएं शामिल थीं। शोध के परिणाम चौंकाने वाले थे। नई माताओं में एक को छोड़कर सभी ने बताया कि उनकी एपिसियोटॉमी बिना अनुमति के की गई। केवल एक महिला की इसलिए एपिसियोटॉमी नहीं किया गया, क्योंकि उसने बच्चे को घर पर जन्म दिया था। दिल्ली की रहने वाली शमा (बदला हुआ नाम) ने बताती हैं, “दिल्ली-एनसीआर के एक प्रसिद्ध अस्पताल में मेरी पहली डिलीवरी के दौरान मेरा बच्चा समय से पहले, लगभग पांच महीने में पैदा हो गया था। उस समय न तो डॉक्टर मौजूद थे और न ही नर्स। जब मैं दर्द में कराह रही थी, तब डॉक्टर और नर्स आए। बच्चे के जन्म के बाद भी उन्होंने मुझे एपिसियोटॉमी देने की तैयारी की। जब मैंने कहा कि बच्चा तो पहले ही जन्म ले चुका है, फिर इसकी क्या जरूरत है, तो डॉक्टर ने जवाब दिया कि यह लगाना जरूरी है।”

भारत में औसतन एपिसियोटॉमी की दर लगभग 40 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि पहली बार गर्भवती महिलाओं में यह दर 90 प्रतिशत से अधिक है। सरकारी आंकड़ों से अलग, अगर जमीनी हकीकत की बात करें तो कई जगहों पर नई माताओं में एपिसियोटॉमी की दर 99 प्रतिशत तक बताई जाती है।

वह आगे कहती हैं, “इसके बाद तीन साल के भीतर मेरे दो और बच्चे हुए, जिनमें दो साल का अंतर था। एक बच्चे का जन्म निजी अस्पताल में हुआ और दूसरे का सरकारी अस्पताल में। लेकिन दोनों ही बार मुझे एपिसियोटॉमी दी गई।” दूसरी ओर, जिन महिलाओं की डिलीवरी वर्ष 2017 से पहले हुई थी, उनमें लगभग 80 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें प्रसव के दौरान कोई अनावश्यक एपिसियोटॉमी नहीं की गई। केवल 20 प्रतिशत महिलाओं को ही डिलीवरी के समय एपिसियोटॉमी की गई थी। इस विषय पर रेहाना (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनके आठ बच्चे हैं और सभी का जन्म नॉर्मल डेलीवेरी से हुई। उनके सबसे छोटे बेटे का जन्म साल 2005 में हुआ था। वह बताती हैं कि उनके किसी भी प्रसव के दौरान उन्हें एपिसियोटॉमी नहीं दी गई। इसी तरह नेहा (बदला हुआ नाम) का पहला बच्चा साल 2011 में एक सरकारी अस्पताल में पैदा हुआ। इसके बाद उनके दो और बच्चे भी सरकारी अस्पतालों में ही पैदा हुए। इन तीनों डिलीवरी के दौरान उनकी एपिसियोटॉमी नहीं की गई।

आखिर क्यों की जाती है बिन वजह एपिसियोटॉमी  

लेकिन नेहा का चौथा और आखिरी बच्चा वर्ष 2022 में एक निजी अस्पताल में पैदा हुआ। इस बार डिलीवरी के समय मौजूद डॉक्टर ने एपिसियोटॉमी किया। नेहा कहती हैं, “मुझे डिलीवरी के दौरान कोई जटिलता नहीं थी। यह मेरा पहला बच्चा भी नहीं था। मैंने डॉक्टर से कहा था कि मुझे एपिसियोटॉमी न किया जाए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने एपिसियोटॉमी कर दी।” शोध में शामिल लगभग आधी महिलाओं ने बताया कि सरकारी अस्पतालों की छवि पहले से ही खराब मानी जाती है, लेकिन अब निजी अस्पतालों में भी डिलीवरी के दौरान व्यवहार संतोषजनक नहीं है। कई महिलाओं ने कहा कि जब वे डॉक्टर या नर्स से एपिसियोटॉमी न करने की गुजारिश करती हैं, तो उन्हें डांट दिया जाता है। उनके अनुसार, डॉक्टरों का सबसे आम जवाब होता है कि डॉक्टर आप हैं या हम?

मेरी पहली डिलीवरी के दौरान मेरा बच्चा समय से पहले, लगभग पांच महीने में पैदा हो गया था। जब मैं दर्द में कराह रही थी, तब डॉक्टर और नर्स आए। बच्चे के जन्म के बाद भी उन्होंने मुझे एपिसियोटॉमी देने की तैयारी की। जब मैंने कहा कि बच्चा तो पहले ही जन्म ले चुका है, फिर इसकी क्या जरूरत है, तो डॉक्टर ने जवाब दिया कि यह लगाना जरूरी है।”

एपिसियोटॉमी के जोखिम

एपिसियोटॉमी के बाद ठीक होने की प्रक्रिया में अक्सर दर्द और असुविधा होती है। कई बार किया गया एपिसियोटॉमी प्राकृतिक रूप से होने वाले एपिसियोटॉमी से बड़ा या गहरा होता है। ऐसे में घाव भरने में ज्यादा समय लग सकता है। इसके बाद संक्रमण (इन्फेक्शन) का खतरा भी बना रहता है। कई महिलाओं को प्रसव के बाद महीनों तक यौन संबंध बनाते समय दर्द महसूस होता है। मिडलाइन एपिसियोटॉमी में गंभीर अंदरूनी एपिसियोटॉमी लगने का खतरा बढ़ जाता है। ये चीरे गुदा तक फैल सकते हैं और मलाशय को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में मल को रोक पाना मुश्किल हो सकता है। इस समस्या को फीकल इनकॉन्टिनेंस कहा जाता है।

ईशा (बदला हुआ नाम) की पहली डिलीवरी वर्ष 2018 में एक सरकारी अस्पताल में हुई थी। प्रसव के दौरान उन्हें एपिसियोटॉमी दी गई। लेकिन उन्हें यह ठीक से नहीं बताया गया कि टांकों की देखभाल कैसे करनी है। उनका बेटा कमजोर पैदा हुआ था, इसलिए उसे स्तनपान कराने में दिक्कत होती थी। बार-बार उठने-बैठने और बच्चे को दूध पिलाने की कोशिश में उनके टांके खुल गए। उन्हें असहनीय दर्द हुआ और बाद में योनि संक्रमण भी हो गया। इन सब से उबरने में उन्हें लगभग तीन महीने लगे। इस दौरान वे प्रसवोत्तर अवसाद (पोस्टपार्टम डिप्रेशन) का भी सामना किया।

मुझे डिलीवरी के दौरान कोई जटिलता नहीं थी। यह मेरा पहला बच्चा भी नहीं था। मैंने डॉक्टर से कहा था कि मुझे एपिसियोटॉमी न किया जाए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने एपिसियोटॉमी कर दी।”

प्रशिक्षण और व्यवहार में गलत धारणाएं

भारत में एपिसियोटॉमी की लगातार ऊंची दर का एक कारण पारंपरिक प्रशिक्षण को माना जाता है। कई जगहों पर प्रसव के दूसरे चरण को ‘तेज’ करने पर जोर दिया जाता है। साथ ही, यह गलत धारणा भी है कि सर्जरी से दिया गया एपिसियोटॉमी प्राकृतिक चीरे से बेहतर होता है। शोध बताते हैं कि कई प्रसूति विशेषज्ञों को मेडिओलेटरल एपिसियोटॉमी के लिए सुझाए गए 60 डिग्री के सही कोण की जानकारी नहीं होती। वे अक्सर एपिसियोटॉमी बीच की रेखा के बहुत पास लगा देते हैं, जिससे गुदा की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।

कई मामलों में महिलाओं से बिना स्पष्ट जानकारी और सहमति के एपिसियोटॉमी कर दी जाती है, जो सम्मानजनक प्रसूति देखभाल के सिद्धांतों के खिलाफ है। हालांकि कुछ खास आपात स्थितियों, जैसे भ्रूण संकट या उपकरण से डिलीवरी (इंस्ट्रूमेंटल डिलीवरी), में एपिसियोटॉमी जरूरी हो सकती है, लेकिन इसका नियमित उपयोग वैज्ञानिक रूप से सही नहीं माना जाता। भारत में महिलाओं की अनावश्यक पीड़ा कम करने और उनके लंबे समय के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि साक्ष्य-आधारित और सीमित चिकित्सा पद्धति अपनाई जाए। केवल पुरानी धारणाओं के आधार पर इलाज करना मरीज के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो सकता है।

About the author(s)

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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