इंटरसेक्शनलजेंडर घर और काम के बीच भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य की अनदेखी

घर और काम के बीच भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य की अनदेखी

आज के दौर में सेहत के प्रति लापरवाही केवल व्यक्तिगत आदत नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है। इसका सबसे बड़ा और सीधा असर महिलाओं पर दिखाई देता है। महिलाओं की बढ़ती मृत्यु दर इस सच्चाई की ओर इशारा करती है कि वे अपने स्वास्थ्य को लगातार नजरअंदाज कर रही हैं।

किसी भी देश में महिलाओं का स्वास्थ्य सामाजिक कल्याण का सूचक होता है। यह समाज के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका न केवल वर्तमान आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ता है, जो खासतौर पर देश के विकास को प्रभावित करता है। गौरतलब है कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य को कम और उनके काम को ज्यादा अहमियत दी जाती है। इसके साथ ही जो महिला रुढ़िवादी नियमों के अनुसार काम करती है। उसे ही समाज में आदर्श महिला माना जाता है। 

आज के दौर में सेहत के प्रति लापरवाही केवल व्यक्तिगत आदत नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है। इसका सबसे बड़ा और सीधा असर महिलाओं पर दिखाई देता है। महिलाओं की बढ़ती मृत्यु दर इस सच्चाई की ओर इशारा करती है कि वे अपने स्वास्थ्य को लगातार नजरअंदाज कर रही हैं। द इकोनॉमिक टाइम्स में छपी, ‘द लैंसेट’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं पर्याप्त रूप से शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं। यह आंकड़ा केवल जीवनशैली की कमी नहीं, बल्कि उस सोच को उजागर करता है जिसमें महिला की सेहत हमेशा प्राथमिकताओं की सूची में सबसे नीचे रखी जाती है।

किसी भी देश में महिलाओं का स्वास्थ्य सामाजिक कल्याण का सूचक होता है। यह समाज के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका न केवल वर्तमान आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ता है, जो खासतौर पर देश के विकास को प्रभावित करता है।

इमरजेंसी का इंतज़ार करती महिलाएं और सेहत 

लड़कियों को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि छोटी समस्याओं पर रुकना ठीक नहीं है। पीरियड्स के दौरान होने वाले तेज़ दर्द को भी सामान्य बताकर स्वीकार करना सिखाया जाता है। हर महीने ऐसा होता है, इसमें क्या नई बात है, इन वाक्यों के साथ लड़कियां बड़ी होती हैं। धीरे-धीरे उनके मन में यह बात बैठ जाती है कि दर्द में भी काम रुकना नहीं चाहिए। साइंस डायरेक्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत में महिलाओं का स्वास्थ्य लगातार खराब स्थिति में है। विश्व में होने वाली मातृ -मृत्यु दर में से 27 फीसदी भारत में होती हैं, जो कि एक बड़ी संख्या है। इसके अलावा भारत में महिलाओं का स्वास्थ्य बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों की तुलना में भी बहुत खराब है। इसका एक कारण परिवार की अपेक्षाएं, जिम्मेदारियों का दबाव और अपनी तकलीफ़ को छोटा समझने और चुपचाप सहते रहने की आदत भी है। 

नतीजा यह होता है कि जब तक वे डॉक्टर तक पहुंचती हैं, तब तक समस्या अक्सर गंभीर रूप ले चुकी होती है। यह स्थिति बताती है कि महिलाओं का स्वास्थ्य संकट एक सामाजिक ढांचे की देन है, न कि केवल व्यक्तिगत लापरवाही। अध्ययन बताते हैं कि, शरीर के दिए गए शुरुआती संकेतों को समय रहते गंभीरता से न लेना ही। आज महिलाओं में कैंसर जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों का कारण बनकर सामने आ रहा है। नैशनल लाईब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों में कैंसर के मरीज़ अक्सर चिकित्सा सलाह लेने में देरी करते हैं। इससे बीमारी के परिणाम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। स्तन कैंसर के लगभग 80 फीसदी मरीज़ों ने बताया कि वे स्वास्थ्य केंद्रों में तब पहुंचे जब बीमारी लाइलाज हो चुकी थी। स्तन कैंसर का शीघ्र पता लगाने के लिए व्यापक उपायों के बावजूद  20 से 30 फीसदी महिलाएं स्तन कैंसर के लक्षणों के लिए मदद लेने से पहले कम से कम तीन महीने इंतजार करती हैं, जिन महिलाओं में तीन महीने से अधिक की देरी से इलाज होता है, उनमें अक्सर ट्यूमर का आकार बड़ा हो जाता है, जिस कारण जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है। 

साइंस डायरेक्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत में महिलाओं का स्वास्थ्य लगातार खराब स्थिति में है। विश्व में होने वाली मातृ -मृत्यु दर में से 27 फीसदी भारत में होती हैं, जो कि एक बड़ी संख्या है। इसके अलावा भारत में महिलाओं का स्वास्थ्य बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों की तुलना में भी बहुत खराब है।

दोहरी जिम्मेदारियों का बोझ

मां, पत्नी, बहू और बहन की भूमिकाओं में महिलाएं आने वाली पीढ़ी को भी यही सिखाती हैं कि घर संभालना उनका कर्तव्य है। परेशानी में भी मुस्कुराना, अपनी ज़रूरतों को दबाना और दूसरों को प्राथमिकता देना, यह अच्छे संस्कार माने जाते हैं। कम उम्र से मिली यह सीख समय के साथ दर्द, थकान, कमजोरी और मानसिक तनाव में बदल जाती है। लेकिन महिलाएं इसे भी अपनी ज़िम्मेदारी मानकर स्वीकार कर लेती हैं और खुद को पीछे रख देती हैं। बदलते समय के साथ महिलाओं से अपेक्षाएं और बढ़ गई हैं। अब उनसे यह भी उम्मीद की जाती है कि वे घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी समान रूप से निभाएं। द हिंदू में प्रकाशित साल 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाएं औसतन 7 घंटे घरेलू काम करती हैं, जबकि पुरुष तीन घंटे से भी कम समय घर के काम में लगाते हैं। इसके साथ नौकरी, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और सामाजिक दायित्व, हर जिम्मेदारी महिलाओं के हिस्से आ जाती है। ऐसे में उनके पास अपने स्वास्थ्य के लिए समय निकालना सबसे कठिन हो जाता है।

साल 2024 में डेलॉयट की जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी जांच को टालने या न करने की संभावना 35 फीसदी अधिक है। डेलोइट के यूएस कंसल्टिंग लाइफ साइंसेज एंड हेल्थकेयर लीडर और चीफ हेल्थ इक्विटी ऑफिसर, डॉ. कुल्लेनी गेब्रेयेस का कहना है कि, महिलाओं का इलाज को टालने का एक बड़ा कारण यह है कि वे इसका खर्चा नहीं उठा कर सकतीं हैं। लागत के कारण महिलाओं की स्वास्थ्य सेवा न लेने की संभावना पुरुषों की तुलना में 31 फीसदी अधिक है। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक,  पुरुषों और महिलाओं के स्वास्थ्य खर्च में बड़ा अंतर है। हर सामाजिक और आर्थिक वर्ग में महिलाएं, पुरुषों की तुलना में अपनी सेहत पर कम पैसा खर्च करती हैं। जबकि महिलाओं में बीमारियों की दर पुरुषों से अधिक पाई जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह लगातार आत्म-त्याग की सोच महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है। आर्थिक निर्भरता के कारण वे इलाज टाल देती हैं या बीच में ही छोड़ देती हैं, जिससे एनीमिया, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं गंभीर रूप ले लेती हैं।

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक,  पुरुषों और महिलाओं के स्वास्थ्य खर्च में बड़ा अंतर है। हर सामाजिक और आर्थिक वर्ग में महिलाएं, पुरुषों की तुलना में अपनी सेहत पर कम पैसा खर्च करती हैं। जबकि महिलाओं में बीमारियों की दर पुरुषों से अधिक पाई जाती है।

स्वास्थ्य को अधिकार मानने की ज़रूरत

पीरियड्स, गर्भधारण, प्रसव, हार्मोनल बदलाव और मेनोपॉज से महिलाओं का जीवन लगातार शारीरिक बदलावों और दर्द के दौर से गुजरता है। धीरे-धीरे दर्द सहना महिलाओं की पहचान का हिस्सा बन जाता है। शहरी और ग्रामीण महिलाओं के बीच स्वास्थ्य जागरूकता का अंतर आज भी साफ दिखाई देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाओं को यह जानकारी ही नहीं है कि नियमित स्वास्थ्य जांच क्यों ज़रूरी है। शरीर के लक्षण क्या संकेत देते हैं, मानसिक स्वास्थ्य भी इलाज का हिस्सा है, और प्रजनन स्वास्थ्य केवल गर्भावस्था तक सीमित नहीं। इन सभी बातों की जानकारी के अभाव में ग्रामीण महिलाएं गंभीर बीमारियों का सामना कर रही हैं। महिलाओं का अपने स्वास्थ्य को लगातार पीछे रखना, किसी एक महिला की व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की विफलता है जिसने त्याग, सहनशीलता और चुपचाप दर्द सहने को महिला का स्वभाव घोषित कर दिया। जब एक महिला बीमार होती है, तो उसका असर केवल उस पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार, बच्चों की परवरिश और समाज की संरचना पर पड़ता है।

आज एनीमिया, पीसीओडी, थायरॉइड, मानसिक अवसाद और हृदय रोगों का महिलाओं में तेजी से बढ़ना इस बात का संकेत है कि उनसे अपेक्षित त्याग और सहनशीलता अब उनके शरीर और मन दोनों को तोड़ रही है। स्वास्थ्य को टालने की यह आदत भविष्य में और गंभीर संकट खड़ा कर सकती है, जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। अब समय आ गया है कि महिला के स्वास्थ्य को आपात स्थिति का विषय नहीं, बल्कि नियमित, ज़रूरी और प्राथमिक अधिकार के रूप में देखा जाए। परिवार, समाज और नीति-निर्माताओं इन सभी को यह स्वीकार करना होगा कि महिला को खुद को प्राथमिकता देने की अनुमति नहीं, बल्कि पूरा अधिकार चाहिए। क्योंकि सशक्त समाज की नींव त्याग पर नहीं, बल्कि स्वस्थ, जागरूक और आत्मनिर्भर महिलाओं पर टिकी होती है। महिला स्वस्थ होगी, तभी परिवार मजबूत होगा और तभी समाज वास्तव में आगे बढ़ सकेगा। महिला स्वास्थ्य को व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखे बिना यह संकट खत्म नहीं होगा।

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