इंटरसेक्शनलजेंडर भारत में छिपे स्टिलबर्थ: आंकड़ों से बाहर रह जाने वाले हजारों मामलों की अनदेखी 

भारत में छिपे स्टिलबर्थ: आंकड़ों से बाहर रह जाने वाले हजारों मामलों की अनदेखी 

स्टिलबर्थ तब माना जाता है, जब गर्भ में पल रहा भ्रूण 28 हफ़्ते या उससे ज़्यादा का हो। साथ ही अगर किसी वजह से यह पता न हो कि बच्चा कितने हफ़्ते का था, तो उसका वजन 1000 ग्राम या उससे ज़्यादा होने पर ही उसे स्टिलबर्थ की कैटेगरी में रखा जा सकता है। यानी गर्भावस्था के आखिरी महीने में पूरी तरह से विकसित हो चुके भ्रूण की मृत्यु को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन स्टिलबर्थ कहता है।

द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथ ईस्ट एशिया में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में स्टिलबर्थ (जन्म से पहले बच्चे की मौत) का सटीक आंकड़ा अभी भी पूरी तरह से उजागर नहीं हो पा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है डेटा कलेक्शन का सिस्टम, जिसमें सिर्फ 28 हफ़्ते या उससे ज़्यादा समय वाली प्रेग्नेंसी को ही गिना जाता है। जबकि इससे पहले ही बड़ी संख्या में प्रेग्नेंसी लॉस देखा गया है। इस तकनीकी कमी की वजह से 5 में से 2 स्टिलबर्थ कभी आंकड़ों में दर्ज़ ही नहीं हो पाते, जिसका नतीजा यह होता है कि एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ़ आंकड़ों से बाहर होता है बल्कि नीतियों का भी हिस्सा नहीं बन पाता।

 नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों पर आधारित इस रिसर्च में पाया गया, कि साल 2019 से 2021 के दौरान हुए कुल स्टिलबर्थ का करीब 40 फीसद 20 से 28 हफ्ते के बीच हुए थे। जब इतने बड़े पैमाने पर होने वाली घटनाएं रिकॉर्ड में दर्ज़ ही नहीं हो पाती तो उनके पीछे के पैटर्न, रिस्क, रोकथाम से जुड़ी नीतियों पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। यह सिर्फ़ हेल्थ सिस्टम की कमी नहीं दिखाता बल्कि यह भी बताता है कि महिलाओं की ज़िन्दगी के इतनी तकलीफ़देह अनुभव किस तरह से गायब कर दिए जाते हैं। गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में होने वाले नुकसान को नॉर्मल या कम ज़रूरी मान लिया जाता है। जबकि यह महिलाओं के शारीरिक और मानसिक सेहत पर गहरा असर डालता है। कभी-कभी तो महिला ज़िंदगी भर ट्रॉमा से बाहर नहीं निकल पाती।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों पर आधारित इस रिसर्च में पाया गया कि साल 2019 से 2021 के दौरान हुए कुल स्टिलबर्थ का करीब 40 फीसद 20 से 28 हफ्ते के बीच हुए थे। जब इतने बड़े पैमाने पर होने वाली घटनाएं रिकॉर्ड में दर्ज़ ही नहीं हो पाती तो उनके पीछे के पैटर्न, रिस्क, रोकथाम से जुड़ी नीतियों पर भी ध्यान नहीं दिया जाता।

तरीका बदला तो असली तस्वीर सामने आई

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, स्टिलबर्थ तब माना जाता है, जब गर्भ में पल रहा भ्रूण 28 हफ़्ते या उससे ज़्यादा का हो। साथ ही अगर किसी वजह से यह पता न हो कि बच्चा कितने हफ़्ते का था, तो उसका वजन 1000 ग्राम या उससे ज़्यादा होने पर ही उसे स्टिलबर्थ की कैटेगरी में रखा जा सकता है। यानी गर्भावस्था के आखिरी महीने में पूरी तरह से विकसित हो चुके भ्रूण की मृत्यु को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन स्टिलबर्थ कहता है। इस मानक के हिसाब से देखने पर बहुत सारे स्टिलबर्थ के मामले सामने नहीं आ पाते हैं, जिनका मां पर उतना ही असर होता है जितना 28 हफ़्ते या उससे ज़्यादा होने पर। डाउन टू अर्थ में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, थाईलैंड की महिदल विश्वविद्यालय में अनुज कुमार पांडे के नेतृत्व में किए गए एक स्टडी में पाया गया कि भारत में लगभग 40 फीसद स्टिलबर्थ गर्भावस्था के 28 हफ़्ते के पहले ही हो जाता है। 

यह स्टडी साल 2005 से 2006, 2015 से 2016 और साल 2019 से 2021 के तीन राउंड नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों पर आधारित थी, जिसमें 5,42,359 महिलाओं की प्रेग्नेंसी हिस्ट्री को शामिल किया गया था। आंकड़ों की असली तस्वीर सामने लाने के लिए रिसर्चर्स ने अलग-अलग हफ़्तों के आधार पर स्टिलबर्थ रेट की एनालिसिस की, जिससे यह पता चल सके कि परिभाषा बदलने से तस्वीर कितनी बदलती है।स्टडी में पाया गया कि मौजूदा 28 हफ़्ते वाले मानक के अनुसार भारत में स्टिलबर्थ रेट हर 1000 जन्मे बच्चों पर 12.8 है, यानी 1000 जन्मे बच्चों में से 12.8 बच्चे मृत पैदा होते हैं। लेकिन जैसे ही प्रेग्नेंसी की इस सीमा को 24 हफ़्ते पर लाया गया, यह रेट बढ़ कर 1000 जन्मे बच्चों पर 16.2 हो गई। जबकि इसे 20 हफ़्ते तक करने पर 1000 जन्मे बच्चों पर स्टिलबर्थ रेट बढ़कर 22 पर पहुंच गया। अकेले साल 2019 से 21 के दौरान लगभग 42 फीसद स्टिलबर्थ 20 से 28 हफ़्ते के बीच में हुए जो आंकड़े आमतौर पर सिस्टम में शामिल ही नहीं हो पाते। 

मौजूदा 28 हफ़्ते वाले मानक के अनुसार भारत में स्टिलबर्थ रेट हर 1000 जन्मे बच्चों पर 12.8 है, यानी 1000 जन्मे बच्चों में से 12.8 बच्चे मृत पैदा होते हैं। लेकिन जैसे ही प्रेग्नेंसी की इस सीमा को 24 हफ़्ते पर लाया गया, यह रेट बढ़ कर 1000 जन्मे बच्चों पर 16.2 हो गई।

सुधार के बावजूद समस्या बनी हुई है 

हालांकि 28 हफ़्ते के बाद होने वाले स्टिलबर्थ के आंकड़े को देखा जाए तो पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में इसमें कमी पाई जा रही है। साल 2015 से 2016 में जहां स्टिलबर्थ रेट 1000 में 19.4 था। वहीं साल 2019 से 2021 के दौरान यह घटकर 11.7 तक आ गया। लेकिन इसके बावजूद शुरुआती महीनों में प्रेग्नेंसी लॉस अब भी बड़ी संख्या में हो रहे हैं, जो आंकड़ों में दर्ज़ ही नहीं हो पाए। कई मामलों में शुरुआती नुकसान की वजह पोषण की कमी, इन्फेक्शन, हार्मोनल प्रॉब्लम या ठीक समय पर देखभाल नहीं मिल पाना होती है। अब क्योंकि यह केसेज दर्ज़ नहीं हो पाते हैं, जिसकी वजह से इसकी जानकारी कम मिल पाती है। 

इसलिए इन समस्याओं को दूर करने के लिए कोई सटीक नीति या रोडमैप भी नहीं बन पाते। इसके अलावा देश के अलग राज्यों में अलग-अलग जिलों के आंकड़ों में भी फ़र्क देखा गया है। 28 हफ़्ते के मानक के अनुसार करीब 12.2 फीसद जिलों में हर 1000 जन्मे बच्चों पर स्टिलबर्थ रेट 20 तक पाई गई। जबकि आधे से ज़्यादा राज्यों में यह संख्या घटकर इकाई तक पहुंच गई है। यानी कुछ जगहों पर सुधार हुआ है, लेकिन कई जगहों पर स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। ऐसे में सटीक आंकड़े न होने की वजह से जहां जैसी ज़रूरत है, वैसा समाधान नहीं मिल पा रहा है।

वहीं साल 2019 से 2021 के दौरान यह घटकर 11.7 तक आ गया। लेकिन इसके बावजूद शुरुआती महीनों में प्रेग्नेंसी लॉस अब भी बड़ी संख्या में हो रहे हैं, जो आंकड़ों में दर्ज़ ही नहीं हो पाए। कई मामलों में शुरुआती नुकसान की वजह पोषण की कमी, इन्फेक्शन, हार्मोनल प्रॉब्लम या ठीक समय पर देखभाल नहीं मिल पाना होती है।

आधिकारिक आंकड़े कम क्यों दिखते हैं?

भारत में अभी तक जो भी डेटा सिस्टम हैं वह लगातार कम स्टिलबर्थ रेट दिखाते हैं। आंकड़ों की उलझन को समझने के लिए ज़रूरी है, उस डेटा सिस्टम को समझना जो भारत में काम कर रहे हैं। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस ), सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) और हेल्थ मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम (एचएमआईएस ) वे तीन सिस्टम हैं, जो भारत में जन्म, मृत्यु और स्टिलबर्थ जैसे आंकड़े इकट्ठा करते हैं। इनके काम करने का तरीका अलग है जिस वजह से उनके आंकड़ों में भी फ़र्क नज़र आता है।एसआरएस सैंपल पर आधारित और सिस्टम है, जो कुछ चुने हुए इलाकों के सैंपल के आधार पर जन्म, मृत्यु और स्टिलबर्थ का अनुमान लगाता है। यह देश के हर मामले को दर्ज़ नहीं करता है, यही इसी सबसे बड़ी कमी है। सीआरएस एक ऐसा पोर्टल है जिस पर देशभर में हो रहे हर जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। लेकिन दूर दराज के इलाकों, गांवों और हाशिए पर मौजूद समुदायों में जागरूकता और पहुंच की कमी की वजह से सभी आंकड़े दर्ज़ नहीं हो पाते हैं। 

इसी तरह हेल्थ मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम ख़ासतौर पर सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में होने वाले जन्म, मृत्यु, स्टिलबर्थ से जुड़े डेटा को दिखाता है। यहां समस्या यह है कि अस्पताल के बाहर होने वाली डिलीवरी और मृत्यु के आंकड़े छूट जाते हैं। क्योंकि आज भी देश में एक बड़ी आबादी घर पर ही अकुशल दाइयों से डिलीवरी कराने पर मजबूर होती है। 28 हफ़्ते वाला मानक तो वजह है ही जो आंकड़े कम दिखते हैं। साथ ही जागरूकता, संसाधन और उपलब्धता की कमी से किसी भी तरह की बीमारी होने पर सब लोग अस्पताल नहीं जा पाते हैं, जिससे आंकड़े ठीक से दर्ज़ नहीं हो पाते। जब हम इन आंकड़ों को देखते हैं तो यह समझना ज़रूरी है कि यह सिर्फ़ नंबर नहीं है, बल्कि अलग-अलग सिस्टम की सीमाओं को भी दिखाते हैं और यही वजह है कि आधिकारिक आंकड़े अक्सर ज़मीनी हक़ीक़त से कम दिखाई देते हैं। इसके साथ ही इससे जुड़ा हुआ सोशल स्टिग्मा भी एक बड़ी वजह है। बहुत से परिवार इस तरह की घटनाओं को दर्ज़ कराने से बचते हैं। जिससे कई महिलाओं के लिए यह अनुभव निजी दर्द बनकर रह जाता है जिस पर खुलकर बात करने की जगह नहीं बनती।

इसके साथ ही इससे जुड़ा हुआ सोशल स्टिग्मा भी एक बड़ी वजह है। बहुत से परिवार इस तरह की घटनाओं को दर्ज़ कराने से बचते हैं। जिससे कई महिलाओं के लिए यह अनुभव निजी दर्द बनकर रह जाता है जिस पर खुलकर बात करने की जगह नहीं बनती।

किस पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है?

साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्टिलबर्थ की समस्या हर महिला के लिए एक जैसी नहीं है बल्कि कुछ ख़ास समूह की महिलाओं में ज़्यादा पाया गया है। सामाजिक-आर्थिक स्थिति की बात करें तो औसत से कम आमदनी वाले समूह की कम पढ़ी-लिखी महिलाओं में स्टिलबर्थ का रिस्क ज़्यादा होता है। इसके अलावा 155 सेंटीमीटर या इससे कम लंबाई वाली महिलाओं में भी इस तरह की समस्याएं दूसरों की तुलना में ज़्यादा देखी गई। ख़ास तौर पर अनुसूचित जाति समुदाय की महिलाएं और वे महिलाएं जो अस्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल करती हैं उनमें स्टिलबर्थ रेट ज़्यादा पाया गया। इससे यह पता चलता है कि जो महिलाएं पहले से ही सामाजिक और आर्थिक तौर पर हाशिए पर मौजूद हैं उनके साथ में समस्या और भी ज़्यादा बढ़ जाती है।

यहां हमें यह समझना होगा कि पितृसत्तात्मक संरचना वाले हमारे समाज में संसाधनों के मामले में महिलाओं को प्राथमिकता में सबसे नीचे रखा जाता है। ऐसे में कमज़ोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों में कई बार महिलाएं पैसों की कमी की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं तक नहीं पहुंच पातीं तो कभी स्वास्थ्य केंद्रों से दूरी इनके लिए मजबूरी बन जाती है। इसके अलावा आज भी महिलाओं की सेहत या उससे जुड़ी समस्याओं ख़ास तौर पर पीरियड, प्रेग्नेंसी और मैटरनिटी को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। इस वजह से बहुत बार महिलाएं अपनी समस्याएं बताने से भी हिचकती हैं। इन सब का नतीजा यह होता है कि उन्हें समय पर सही पोषण, देखभाल और इलाज़ नहीं मिल पाता है, जो स्टिलबर्थ की बड़ी वजह है।

स्टिलबर्थ की समस्या हर महिला के लिए एक जैसी नहीं है बल्कि कुछ ख़ास समूह की महिलाओं में ज़्यादा पाया गया है। सामाजिक-आर्थिक स्थिति की बात करें तो औसत से कम आमदनी वाले समूह की कम पढ़ी-लिखी महिलाओं में स्टिलबर्थ का रिस्क ज़्यादा होता है।

कैसे हो सकता है ज़रूरी बदलाव?

लैंसेट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में होने वाले कुल स्टिलबर्थ का लगभग 17 फीसद भारत में होता है, जो कि बेहद चिंताजनक है। हालांकि इंडिया न्यूबॉर्न एक्शन प्लान (आईएनएपी ) के तहत साल 2030 तक स्टिलबर्थ रेट कम करके इकाई अंक यानी 1000 जन्म पर 10 से कम करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन यह भी 28 हफ़्ते के बाद वाले मामलों पर लागू होता है। स्टडी साफ दिखाती है कि अगर हम सिर्फ़ 28 हफ़्ते के बाद के मामलों पर ध्यान देंगे तो बड़ी संख्या में होने वाले शुरुआती स्टिलबर्थ को कम नहीं कर पाएंगे। इसे ठीक करने के लिए ज़रूरी है कि प्रेग्नेंसी की सही अवधि का इस्तेमाल आकलन में किया जाए। इसके अलावा अलग-अलग डेटा सिस्टम यानी एसआरएस, सीआरएस और एचएमआईएस को बेहतर तरीके से एक दूसरे से जोड़ा जाए जिससे कोई भी केस छूटने न पाए।

साथ ही जोख़िम वाले इलाकों और समुदायों की पहचान करना और वहां ख़ास तौर पर टारगेटेड स्ट्रेटजी बनाना भी बहुत ज़रूरी है। महिलाओं के पोषण, देखभाल और उपचार को सुनिश्चित करना होगा, ख़ास तौर पर गर्भवती महिलाओं में, क्योंकि उन्हें ख़ास देखभाल की ज़रूरत होती है।यह स्टडी हमें दिखाती है कि जो दर्ज़ नहीं होता, वह दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता है, उस पर काम भी नहीं होता। भारत को अगर सच में स्टिलबर्थ रेट को कम करना है तो उसे 28 हफ़्ते वाले मानक को छोड़ना पड़ेगा और उससे पहले होने वाली प्रेग्नेंसी लॉस को भी गंभीरता से लेना होगा। यह सिर्फ़ आंकड़ों का सवाल नहीं है। यह महिलाओं के अनुभव, उनके शरीर और दर्द को मान्यता देने का सवाल है। जब तक हर नुकसान को दर्ज़ नहीं किया जाएगा, तब तक उसका समाधान भी नहीं हो पाएगा। क्योंकि आंकड़ा केवल एक नंबर ही नहीं होता बल्कि वह किसी व्यक्ति की ज़िंदगी का सवाल भी होता है।

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content