इंटरसेक्शनलजेंडर पीसीओएस: किशोरियों और महिलाओं में इसका बढ़ता संकट और अनदेखी जद्दोजहद 

पीसीओएस: किशोरियों और महिलाओं में इसका बढ़ता संकट और अनदेखी जद्दोजहद 

अंडाशय में कई गांठों की उपस्थिति को पीसीओएस कहा जाता है, जो महिलाओं के पीरियड्स को बाधित करती है, गर्भधारण में बाधा डालती है और अबॉर्शन का कारण बनती है।

पिछले दिनों जब मैंने अपना अल्ट्रासाउंड कराया, तो उसमें मेरी ओवरी के आसपास कुछ सिस्ट (गांठ) की समस्या सामने आई। जब मैंने इस बारे में अपने डॉक्टर से सलाह ली तो उन्होंने बताया कि यह पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिज़ीज़ (पीसीओडी) का एक प्रकार है। चूंकि मैं पिछले 13 सालों से पीसीओडी का सामना कर रही हूं, तो मेरे लिए मेरे अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में गांठ का आना बहुत अधिक आश्चर्यजनक नहीं था। हालांकि पीसीओएस का इलाज पूरी तरह से संभव नहीं है। मुझे यह समस्या है, इसके बारे में मुझे करीब 20 साल की उम्र में पता चला। लगातार सुस्ती, अनियमित पीरियड्स, पीरियड्स के दौरान भयंकर दर्द और उल्टियां, मूड स्विंग्स, फोकस न कर पाना, वज़न का लगातार बढ़ना यह मेरी लाइफ का हिस्सा बने हुए हैं। एक बात जो उस समय मुझे समझ नहीं आई, वो यह कि मुझे इतनी कम उम्र में यह क्यों हुआ और इसका इलाज क्या है ?

 जब मुझे पहली बार इसका पता चला तो मेरी गायनेकोलॉजिस्ट ने कहा कि 3 महीने लगातार दवा खानी होगी फिर यह ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सका, कई बार मैंने यह तीन महीने का कोर्स किया लेकिन कभी भी इसको ठीक नहीं कर पाई। भारत में माँ बनने की उम्र वाली महिलाओं में पीसीओएस एक बहुत आम हार्मोनल समस्या है। व्यापकता संबंधी अध्ययनों से पता चलता है कि प्रत्येक 5 में से 1 युवा भारतीय महिला इस समस्या से का सामना कर रही है। कुछ क्षेत्रों, जैसे कि संघर्षग्रस्त कश्मीर, में इसकी व्यापकता अधिक है यानी 29 फीसदी से 35 फीसदी तक है, जो कि इस क्षेत्र में व्यापक इंफर्टिलिटी की समस्या का कारण बन रही है। 

जब मुझे पहली बार इसका पता चला तो मेरी गायनेकोलॉजिस्ट ने कहा कि 3 महीने लगातार दवा खानी होगी फिर यह ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सका, कई बार मैंने यह तीन महीने का कोर्स किया लेकिन कभी भी इसको ठीक नहीं कर पाई।

क्या है पीसीओएस? और महिलाओं की सेहत पर इसका बढ़ता असर

स्प्रिंगर नेचर में छपी साल 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फंक्शनल सिस्ट अंडाशय में बनने वाली गांठ होती है, ये तब बनती है जब अंडाशय अंडाणु को मुक्त नहीं करता और इसके बजाय तरल पदार्थ और अंडाणु से भरी गांठ बना लेता है। अंडाशय में कई गांठों की उपस्थिति को पीसीओएस कहा जाता है, जो महिलाओं के पीरियड्स को बाधित करती है, गर्भधारण में बाधा डालती है और अबॉर्शन का कारण बनती है।पीसीओएस को हार्मोनल असंतुलन सिंड्रोम के रूप में भी परिभाषित किया जाता है। इंडियन जर्नल ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी रिसर्च में पाया गया है कि पीसीओएस के लक्षण दिखने की औसत उम्र 30 साल के आसपास होती है, जो 25 से 32 साल के बीच होती है। इसका मुख्य कारण अंडाशय की अति उत्तेजना है, जो आमतौर पर मध्यम आयु में होता है और सक्रिय प्रजनन चक्र के दौरान अधिक होता है।

लेकिन आज के समय में यह कम उम्र की किशोरियों में भी पाया जाता है। जनसंख्या और मानदंडों के आधार पर, विश्व स्तर पर 8 से 13 फीसदी लोग पीसीओएस का सामना कर रहे हैं। वहीं भारत में इसके मामले अलग-अलग जगह और हालात के अनुसार 3.7 फीसदी से 22.5 फीसदी तक पाए जाते हैं। इस विषय पर पर्याप्त और गहरी रिसर्च न होने के कारण ये आंकड़े अलग-अलग हैं। विभिन्न अध्ययनों के आधार पर, भारत में लगभग 9.13 फीसदी से 36 फीसदी किशोरियों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) पाया जाता है, कुछ अध्ययनों के मुताबिक पीसीओएस के मामले करीब 16 फीसदी से 22 फीसदी तक हैं। यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, और अनुमान है कि भारत में हर 5 में से 1 महिला इससे प्रभावित है।

भारत में लगभग 9.13 फीसदी से 36 फीसदी किशोरियों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) पाया जाता है, कुछ अध्ययनों के मुताबिक पीसीओएस के मामले करीब 16 फीसदी से 22 फीसदी तक हैं। यह समस्या तेजी से बढ़ रही है, और अनुमान है कि भारत में हर 5 में से 1 महिला इससे प्रभावित है।

किशोरियों में बढ़ता पीसीओएस

सुबह उठते ही आईने में दिख रही अपनी छवि में थकी हुई आखें, जिद्दी मुहांसों से भरी त्वचा और तकिए पर बिखरे बाल, यह एक पीसीओएस का सामना कर रही किशोरी की रोज़ाना की सुबह की कहानी है। साथ ही इन किशोरियों का जंक फूड न खाने के बावजूद वजन तेजी से बढ़ना, पिरियड्स या तो आते ही नहीं या असहनीय दर्द के साथ दस्तक देते हैं। शिक्षक ज़्यादा पढ़ाई करने के लिए कहते हैं, दोस्त अचानक बढ़े वजन का मज़ाक उड़ाते हैं और माता-पिता को लगता है कि उनकी बच्ची बस तनाव में हैं। लेकिन वह बच्ची खुद जानती है कि अंदर ही अंदर कुछ गड़बड़ है। शरीर भावनात्मक, शारीरिक और हार्मोनल रूप से विद्रोह कर रहा है।

यह पीसीओडी और पीसीओएस की उलझनों से जूझ रही हजारों किशोरियों की खामोश पुकार है। हार्मोनल असंतुलन के कारण होने वाली ये स्थितियां न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं, बल्कि आत्मविश्वास, भावनात्मक कल्याण और भविष्य की प्रजनन क्षमता पर भी गहरा असर डालती हैं। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि पीसीओएस अब केवल वयस्क महिलाओं तक ही सीमित नहीं है। भारत में, अब 13 साल की छोटी लड़कियों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। चूंकि इस विषय पर भी तक कोई विस्तारपूर्वक किया गए अध्ययन पूर्ण रूप से देश में उपलब्ध नहीं है। हालांकि इसके आंकड़ें भी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हैं।

हार्मोनल असंतुलन के कारण होने वाली ये स्थितियां न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं, बल्कि आत्मविश्वास, भावनात्मक कल्याण और भविष्य की प्रजनन क्षमता पर भी गहरा असर डालती हैं। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि पीसीओएस अब केवल वयस्क महिलाओं तक ही सीमित नहीं है। भारत में, अब 13 साल की छोटी लड़कियों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं।

जागरूकता की कमी

देश में आज भी पीरियड्स को टैबू माना जाता है। उस पर बात करने में लोग सहज महसूस नहीं करते हैं। ऐसे में पीसीओएस जैसी बीमारी पर बात करना अपने आप में एक मुश्किल काम है।इंडियन जर्नल ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी रिसर्च के मुताबिक, 52.6 फीसदी लोग इसे जीवनशैली से संबंधित बीमारी मानते हैं, 15.8 फीसदी लोगों का मानना ​​है कि यह दवाओं और अच्छी जीवनशैली से नियंत्रित होती है। जबकि 10.5 फीसदी का मानना ​​है कि यह एक आनुवंशिक बीमारी है, जो परिवारों में चलती है और 4.9 फीसदी लोगों का मानना ​​है कि यह पर्यावरणीय कारकों से नियंत्रित होती है, जबकि 16.1 फीसदी को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। अधिकतर लोग इसे नार्मल ही मानते हैं और इसका इलाज नहीं करवाते हैं। 

इसलिए, पीसीओएस की परिवर्तनशील प्रकृति और संभावित लक्षणों की व्यापक श्रेणी के कारण, हर किसी को इस बीमारी और इसके उपचार की पूरी समझ होना ज़रूरी है। मोटापा, इन्फर्टिलिटी, गर्भावस्था संबंधी समस्याएं, टाइप 2 मधुमेह, गर्भाशय कैंसर, हृदय रोग और कई अन्य विकार इससे जुड़े हुए हैं। अध्ययनों के अनुसार, पीसीओएस का सामना करने वाली महिलाओं में हाइपरलिपिडेमिया, उच्च रक्तचाप, सबक्लिनिकल एथेरोस्क्लेरोसिस और एंडोथेलियल डिसफंक्शन होने की संभावना अधिक होती है। ये सभी स्थितियां इन व्यक्तियों में मोटापे के जोखिम को बढ़ाती हैं। 

पीसीओएस का सामना करने वाली महिलाओं में हाइपरलिपिडेमिया, उच्च रक्तचाप, सबक्लिनिकल एथेरोस्क्लेरोसिस और एंडोथेलियल डिसफंक्शन होने की संभावना अधिक होती है। ये सभी स्थितियां इन व्यक्तियों में मोटापे के जोखिम को बढ़ाती हैं। 

चिकित्सकों का पीसीओएस मामले में एक राय न होना 

साल 2021 में पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़में पीसीओएस का सामना करने वाले रोगियों के उपचार के तरीकों का आकलन करने के लिए एक अध्ययन किया गया। इसमें पता चला कि उपचार शुरू करने के बाद भी, लगभग 45 फीसदी रोगियों को पीसीओएस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। केवल 9.1 फीसदी रोगियों को ही अपने डॉक्टरों से कुछ जानकारी मिली, और लगभग 85.5 फीसदी रोगियों को जानकारी जुटाने के लिए कई डॉक्टरों के पास जाना पड़ा। कुछ रोगियों लगभग 37 फीसदी ने अपनी स्थिति के बारे में जानने के लिए इंटरनेट को सूचना के प्राथमिक स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया।

दुर्भाग्य से, डॉक्टरों में ज्ञान की कमी और आम सहमति का अभाव भारत को पीछे धकेल रहा है। भारत में कई स्वास्थ्यकर्मी महिलाओं को वजन कम करने के लिए आहार और व्यायाम करने की सलाह देते हैं; हालांकि, उनमें से अधिकांश इस बात से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं कि पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं के लिए पारंपरिक तरीकों से वजन कम करना बेहद मुश्किल होता है। जब महिलाएं वजन कम करने में असफल हो जाती हैं और आहार या व्यायाम के बारे में मार्गदर्शन के लिए उनसे संपर्क करती हैं, तो उन्हें कोई जानकारी नहीं मिलती।

उपचार शुरू करने के बाद भी, लगभग 45 फीसदी रोगियों को पीसीओएस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। केवल 9.1 फीसदी रोगियों को ही अपने डॉक्टरों से कुछ जानकारी मिली, और लगभग 85.5 फीसदी रोगियों को जानकारी जुटाने के लिए कई डॉक्टरों के पास जाना पड़ा।

विशेषज्ञों की राय और बचाव के लिए कदम 

किशोरावस्था में पीसीओएस का निदान एक चुनौती है, क्योंकि पीसीओएस के लक्षण किशोरावस्था के सामान्य परिवर्तनों से मिलते-जुलते हैं। आधुनिक जीवनशैली के कारण किशोरों में पीसीओएस की घटनाएं बढ़ रही हैं। समय पर पहचान जरूरी है, ताकि जीवनशैली में बदलाव करके आगे होने वाली सेहत और प्रजनन से जुड़ी समस्याओं को रोका जा सके। इसके लिए स्कूल और समुदाय स्तर के किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रमों में जागरूकता और जांच को शामिल करना चाहिए। स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में किशोर समूहों में पिरियड्स संबंधी समस्याओं पर खुली चर्चा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ताकि किशोरियां अपनी परेशानी को समझ सकें और उस पर बात कर सकें। अगर मैं खुद अपनी इस की बीमारी की समीक्षा करूं, तो यह कह सकती हूं कि मुझे पीसीओएस बहुत कम उम्र में हुआ था। चूंकि हम इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं रखते थे और हमारी माता भी इस विषय पर हमसे बात-चीत करने में सहज नहीं थी तो इसका निदान करने में हमें समय लगा। 

मुझे पहली बार पीरियड्स 12 साल की उम्र में हुए थे। कुछ महीने नॉर्मल पीरियड्स होने के बाद ये अनियमित होने लगे। बीच के कुछ महीने पीरियड्स रेगुलर रहते थे। जिस कारण न तो हमारी माता और न ही हम इस बारे में ज़्यादा समझ पाए। शिक्षा और सूचना की कमी के कारण, भारत में पीसीओएस का सामना अनगिनत महिलाएं अपने लक्षणों से जूझ रही हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि उनमें से कई खराब स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त हैं। पीसीओएस केवल एक चिकित्सकीय स्थिति नहीं, बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक अनुभव भी है, जिसे समझने और स्वीकार करने की ज़रूरत है। जब तक हम इसे केवल वजन कम करने या प्रजनन क्षमता के मुद्दे तक सीमित रखेंगे, तब तक हम इसके असली प्रभाव को नजरअंदाज करते रहेंगे। ज़रूरी है कि स्कूल स्तर पर पीरियड्स और हार्मोनल स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत हो, डॉक्टरों के बीच स्पष्ट दिशा-निर्देश हों और महिलाओं को दोष देने के बजाय उन्हें सही जानकारी और समर्थन दिया जाए।

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