स्वास्थ्यमानसिक स्वास्थ्य ग्रामीण भारत में मेनोपॉज पर चुप्पी और स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी

ग्रामीण भारत में मेनोपॉज पर चुप्पी और स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी

गाँवों में सामाजिक रूढ़िवादिता, सीमित शिक्षा और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता के कारण मेनोपॉज जैसे मुद्दे अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। यह विषय जागरूकता की कमी, चुप्पी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के बीच दबा रहता है।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक है और स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में लगातार बदलाव हो रहे हैं। सरकार सस्ती और बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है। फिर भी, महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर आज भी बहुत कम बात होती है। ऐसा ही एक विषय है मेनोपॉज है। मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं है, बल्कि महिलाओं के जीवन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, जब किसी महिला को लगातार 12 महीने तक बिना किसी अन्य कारण के पीरियड्स नहीं होते, तो उसे मेनोपॉज माना जाता है। आमतौर पर यह लोगों को 45 से 50 साल की उम्र में होता है।

लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019–21) के अनुसार भारत में इसकी शुरुआत कई बार 39 साल की उम्र से ही हो जाती है। मेनोपॉज के दौरान महिलाओं को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे हॉट फ्लैशेस (अचानक गर्मी लगना), नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और थकान। इसके बावजूद, इस विषय पर जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाएं अभी भी कम हैं। ग्रामीण भारत में मेनोपॉज को अक्सर बुढ़ापे की शुरुआत और प्रजनन के अंत के रूप में देखा जाता है। यह केवल शारीरिक बदलाव नहीं है, बल्कि सामाजिक और मानसिक रूप से भी महिलाओं के लिए चुनौती बन जाता है। शहरों की तुलना में गाँवों में इस विषय पर जानकारी, समझ और स्वास्थ्य सेवाएं अभी भी काफी पीछे हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों के आधार पर, जिला स्तर पर किए गए एनालिसिस में पाया गया कि पूर्वोत्तर जिलों में महिलाओं को समय से पहले प्राकृतिक मेनोपॉज़ होता है, जबकि बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के जिलों में अधिकतर महिलाओं को सर्जिकल पद्धति के माध्यम से मेनोपॉज़ से गुजरना पड़ता है।

ग्रामीण महिलाएं और मेनोपॉज का अनुभव

गाँवों में सामाजिक रूढ़िवादिता, सीमित शिक्षा और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता के कारण मेनोपॉज जैसे मुद्दे अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। यह विषय जागरूकता की कमी, चुप्पी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के बीच दबा रहता है। ग्रामीण समाज में अक्सर महिलाओं की भूमिका को उनकी प्रजनन क्षमता से जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से मेनोपॉज को कई महिलाएं बुढ़ापे की शुरुआत मान लेती हैं। जानकारी की कमी के कारण यह एक सामान्य जैविक प्रक्रिया होने के बजाय “बुढ़ापे की दस्तक” के रूप में देखा जाने लगता है। आज भी गाँवों में महिलाएं मेनोपॉज के बारे में खुलकर बात नहीं करतीं।

इससे उन्हें इससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं की सही जानकारी नहीं मिल पाती। वे हॉट फ्लैशेस, नींद की कमी या जोड़ों के दर्द जैसी समस्याओं को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देती हैं या इसे उम्र बढ़ने का असर समझ लेती हैं। बिहार के आरा जिले में रहने वाली स्वर्णिम सिंह (बदला हुआ नाम), बताती हैं, “मेनोपॉज से कोई खास दिक्कत नहीं सुना है। थोड़ी-बहुत परेशानी तो होती ही रहती है, बुढ़ापा भी तो आ गया है।” ग्रामीण महिलाओं में मेनोपॉज से संबंधित अनुभव और धारणाओं पर की गई एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 70 फीसद महिलाएं हॉट फ्लैशेस और जोड़ों के दर्द का अनुभव करती हैं।

ग्रामीण महिलाओं में मेनोपॉज से संबंधित अनुभव और धारणाओं पर की गई एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 70 फीसद महिलाएं हॉट फ्लैशेस और जोड़ों के दर्द का अनुभव करती हैं।

भारत में मेनोपॉज से जुड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी

भारत में मेनोपॉज को लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं की अभी भी कमी है। अस्पतालों में स्त्री रोग विभाग तो होते हैं, लेकिन मेनोपॉज से जुड़ी समस्याओं के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर कम मिलते हैं। ज़्यादातर स्वास्थ्य सेवाएं गर्भावस्था और बच्चों के स्वास्थ्य पर केंद्रित रहती हैं, जिससे मेनोपॉज के बाद की देखभाल पीछे छूट जाती है। यह समस्या शहरों की तुलना में गाँवों में और भी ज्यादा गंभीर है। बिहार के आरा जिले में रहने वाली धर्मशिला देवी बताती हैं, “मेरा मेनोपॉज कुछ साल पहले हो गया था, लेकिन फिर से पीरियड्स शुरू हो गई। इसके लिए मुझे कई अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े, लेकिन सही इलाज नहीं मिला। डॉक्टर बस यही कहते रहे कि ठीक हो जाएगा।” मेनोपॉज के दौरान महिलाओं के शरीर में कई बदलाव होते हैं।

हड्डियां कमजोर होने लगती हैं, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ता है। साथ ही, हार्मोनल बदलाव के कारण दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2019 के अनुसार, सब-सेंटरों में 23 फीसद, पीएचसी में 28 फीसद और सीएचसी में 37 फीसद की कमी थी। इसके साथ ही, सीएचसी में सर्जनों की 85.6 फीसद, पीएचसी में डॉक्टरों की 75 फीसद और पीएचसी  में लैब टेक्नीशियनों की 50.8 फीसद की कमी थी। रिपोर्ट के अनुसार, 26.3 फीसद सब-सेंटर बिना बिजली के चल रहे थे और 19 फीसद बिना नियमित पानी की सप्लाई के चल रहे थे। चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ सालों में ज़्यादातर पब्लिक हेल्थ कैडर में कमी का प्रतिशत बढ़ गया है। ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे हड्डियों की जांच के लिए डेक्सा स्कैन जैसी सुविधाओं का न होना एक अहम चुनौती है।

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2019 के अनुसार, सब-सेंटरों में 23 फीसद, पीएचसी में 28 फीसद और सीएचसी में 37 फीसद की कमी थी। इसके साथ ही, सीएचसी में सर्जनों की 85.6 फीसद, पीएचसी में डॉक्टरों की 75 फीसद और पीएचसी  में लैब टेक्नीशियनों की 50.8 फीसद की कमी थी।

जल्द होता मेनोपॉज़ और महिलाएं  

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों के आधार पर, जिला स्तर पर किए गए एनालिसिस में पाया गया कि पूर्वोत्तर जिलों में महिलाओं को समय से पहले प्राकृतिक मेनोपॉज़ होता है, जबकि बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के जिलों में अधिकतर महिलाओं को सर्जिकल पद्धति के माध्यम से मेनोपॉज़ से गुजरना पड़ता है। अध्ययन में यह बात सामने आई कि प्रजनन उम्र के बाद की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य नीतियों पर फिर से सोचने की ज़रूरत है। ख़ासकर उन क्षेत्रों में जहां समय से पहले मेनोपॉज़ ज़्यादा देखा जा रहा है। मेनोपॉज़ जीवन का एक प्राकृतिक चरण है, लेकिन समाज में इसे बीमारी या कमजोरी की तरह देखा जाता है। इसके साथ ही, ग्रामीण समाज में मेनोपॉज को लेकर जो चुप्पी, झिझक और पुरानी सोच है, उसे बदलना भी उतना ही जरूरी है।

इसके लिए जागरूकता बढ़ाने और खुले संवाद की जरूरत है, ताकि महिलाएं इस विषय पर बात कर सकें और सही जानकारी पा सकें। हालांकि आज भारत में भी मेनोपॉज़ के दौरान देखभाल तेजी से बढ़ता व्यवसाय है। ग्रैंड व्यू रिसर्च के अनुसार, देश में मेनोपॉज़ बाज़ार का साल 2030 तक रेवेन्यू लगभग 1,632.2 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन, ग्रामीण भारत में मेनोपॉज से जुड़ी समस्याओं को समझने और संभालने के लिए एक बेहतर और साझा प्रयास की जरूरत है। इसमें स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ पोषण, जागरूकता और सामाजिक समर्थन भी शामिल होना चाहिए।

हाल के समय में महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों ने जिला स्तर पर मेनोपॉज क्लिनिक शुरू करने जैसे कदम उठाए हैं, जो एक सकारात्मक पहल है। भारत स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में आगे बढ़ रहा है, लेकिन मेनोपॉज से जुड़ी ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की अभी भी बहुत जरूरत है। जरूरी है कि गांवों की महिलाओं को समय पर सही इलाज और सलाह मिल सके, ताकि वे इस दौर को बिना डर और परेशानी के संभाल सकें। जब महिलाएं मेनोपॉज के लक्षणों को समझेंगी, तभी वे बिना संकोच के इलाज और मदद ले पाएंगी। असल में मेनोपॉज को बीमारी नहीं, बल्कि एक सामान्य और प्राकृतिक अवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक ग्रामीण भारत की बड़ी आबादी इस बदलाव का सामना चुपचाप करती रहेंगी।

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