उच्च शिक्षा संस्थानों को अक्सर एक सेफ स्पेस के रूप में देखा जाता है, जहां विचारों की आजादी, पहचान की खोज और आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर मिलते हैं। लेकिन यह सच सभी के लिए समान नहीं है। कई छात्रों के लिए कैंपस का अनुभव कई बार आजादी से ज्यादा छुपाना, डर और संघर्ष से भरा होता है। अगर छात्र क्वीयर होने के साथ-साथ कथित निम्न वर्ग से भी हो, तो स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बन जाती है। भारत के एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के लिए हाल ही में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन सामाजिक कलंक और पूर्वाग्रह को दूर करने और यह सुनिश्चित करने के लिए अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। ताकि सभी लोग अपनी लैंगिक पहचान की परवाह किए बिना अपने अधिकारों को सुरक्षित महसूस कर सकें।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय का 6 सितंबर 2018 में धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर करना एक महत्वपूर्ण कदम था। अदालत ने यह भी कहा कि हर किसी को अपनी स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान का अधिकार है। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 ने इस विचार को औपचारिक मान्यता दी। हालांकि, 2026 में किए गए संशोधन ने इस अवधारणा को बदलते हुए स्व-पहचान की जगह चिकित्सा प्रमाण पत्र को महत्व दिया है। साल 2014 में विश्व बैंक के भारत में क्वीयर छात्रों के अनुभवों पर किए गए शोध से पता चलता है कि कैंपस को अक्सर सुरक्षित जगह माना जाता है,लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है। इस अध्ययन के अनुसार, लगभग 64 फीसदी क्वीयर विद्यार्थी अपने कैंपस में अपनी पहचान को सुरक्षित रूप से व्यक्त नहीं कर पाते हैं।
ग्रेजुएशन के दौरान वह अक्सर खुद को अलग-थलग महसूस करती थीं। पढ़ाई और एनसीसी में सक्रिय होने के बावजूद, जब दोस्त अपने रिलेशनशिप की बात करते, तो वह चुप रहती और अपने रिश्ते को करीबी दोस्ती कहकर टाल देती। कभी-कभी उस दोस्त का कैंपस आना सहपाठियों के बीच फुसफुसाहट और मज़ाक का कारण बन जाता।
क्वीयर युवाओं का मानसिक संघर्ष
दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा 27 वर्षीय राधा, जो अपने परिवार की पहली सदस्य थीं, जिन्होंने कॉलेज की पढ़ाई की वह बताती हैं, “ग्रेजुएशन के दौरान वह अक्सर खुद को अलग-थलग महसूस करती थीं। पढ़ाई और एनसीसी में सक्रिय होने के बावजूद, जब दोस्त अपने रिलेशनशिप की बात करते, तो वह चुप रहती और अपने रिश्ते को करीबी दोस्ती कहकर टाल देती। कभी-कभी उस दोस्त का कैंपस आना सहपाठियों के बीच फुसफुसाहट और मज़ाक का कारण बन जाता। कॉलेज के दूसरे साल में एक भरोसेमंद दोस्त, जो क्वीयर समुदाय से थी। उससे मिलने पर मैंने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी, लेकिन बाकी सब से अपना रिश्ता तीन साल तक छुपाकर रखा। कक्षा में समानता और अधिकारों पर चर्चा के बावजूद, होमोसेक्सुअलिटी पर माहौल असहज रहता और कोई खुलकर बात नहीं करता। उस समय कैंपस में ऐसा कोई सुरक्षित स्पेस या क्वीयर समूह नहीं था, जहां मैं अपनी पहचान साझा कर पाती।”
निहाल विहार दिल्ली की रहने वाली 26 वर्षीय माही (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “किशोरावस्था में जब उन्हें लड़कों की बजाय लड़कियों के प्रति आकर्षण महसूस हुआ, तो वे गहरे असमंजस में पड़ गईं कि ऐसा क्यों हो रहा है। जब वह एक रिश्ते में आईं, तो उन पर मानसिक दबाव बढ़ गया, क्योंकि सब उन्हें सिर्फ दोस्त समझते थे और वे चाहकर भी सच नहीं बता पाती थीं।” इसी प्रकार राधा का भी कहना है कि वह भी ऐसे ही अनुभवों से गुजरी है।”घर में शादी की बात होती, तो मैं कहतीं मुझे शादी नहीं करनी, मैं अकेले रहूंगी। इस दोहरे जीवन ने मुझे अंदर से थका दिया अकेलापन, डर और असहजता मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गए। घर वाले अक्सर कहते, कोई लड़का पसंद हो तो बता देना, हम शादी करवा देंगे। लेकिन वह लड़का अपने धर्म का और अपनी जाति का होना चाहिए। कोई गलत कदम उठाने की जरूरत नहीं है, लेकिन मैं कैसे बताऊं कि उन्हें लड़की पसंद है और उसी के साथ पूरी जिंदगी बिताना चाहती हूं।” लैंगिक पहचान और जन्म के समय की भूमिका के बीच सेक्स ओरिएंटेशन की कमी, सामाजिक स्वीकृति का अभाव, भेदभाव, परिवार, दोस्तों और साथियों के शारीरिक, मौखिक और यौन शोषण, बदलते कानून का डर और अकेलापन क्वीयर युवाओं में खराब शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य परिणामों का कारण बनती है।
“किशोरावस्था में जब उन्हें लड़कों की बजाय लड़कियों के प्रति आकर्षण महसूस हुआ, तो वे गहरे असमंजस में पड़ गईं कि ऐसा क्यों हो रहा है। जब वह एक रिश्ते में आईं, तो उन पर मानसिक दबाव बढ़ गया, क्योंकि सब उन्हें सिर्फ दोस्त समझते थे और वे चाहकर भी सच नहीं बता पाती थीं।
सामाजिक मिथक और क्वीयर विद्यार्थियों की असुरक्षित दुनिया
भारतीय समाज में आज भी क्वीयर होना अप्राकृतिक माना जाता है और क्वीयर होना एक बीमारी समझा जाता है। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में आज भी लोगों को लगता है कि क्वीयर लोगों को इलाज से ठीक किया जा सकता है। यह भी माना जाता है कि होमोसेक्सुअल व्यक्ति किसी भी लड़के के साथ और होमोसेक्सुअल लड़की किसी भी लड़की के साथ सहज हो जाती है। बायसेक्सुअल लोगों के बारे में यह धारणा है कि उनके कई पार्टनर होते हैं। साथ ही, क्वीयर समुदाय के लोगों को रिश्तों को लेकर गैर-गंभीर भी समझा जाता है। ऐसे कई मिथक आज भी समाज में प्रचलित हैं।यूनाइटेड नेशनके साल 2024 में प्रकाशित लेख के मुताबिक, साल 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के कुछ हिस्सों को पुरुषों के बीच निजी सहमति से यौन संबंध को अपराध घोषित करने के लिए लागू करने को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार दिया था।
इसके बाद साल 2021 में मद्रास उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य को एलजीबीटीक्यूआई+ समुदाय के व्यक्तियों को कई कल्याणकारी सेवाएं प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। इन सब बातों के बावजूद विश्व बैंक का शोध यह बताता है कि करीब 60 फीसदी से अधिक विद्यार्थियों ने किसी न किसी रूप में भेदभाव का सामना किया, जिसमें मौखिक दुर्व्यवहार, सामाजिक बहिष्कार, साइबर बुलिंग और यहां तक कि शारीरिक और यौन हिंसा भी शामिल है।इसके अलावा, लगभग 77 फीसदी विद्यार्थियों ने आने वाले सालों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता आर्थिक आत्मनिर्भरता को दी । ताकि वे परिवार और समाज के दबाव से आजाद होकर अपनी पहचान के साथ जी सकें । शोध यह भी दिखाता है कि क्वीयर विद्यार्थियों के लिए खुद से, दोस्तों से और परिवार से ‘स्वीकार्यता’ (एक्सेप्टेंस) का होना सबसे जरूरी लक्ष्य है। लेकिन इस स्वीकार्यता तक पहुंचने की प्रक्रिया में उन्हें अक्सर अपनी पहचान छुपानी पड़ती है, सामाजिक दबाव झेलना पड़ता है और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
कॉलेज में कई बार मेरी कक्षा के विद्यार्थियों ने मुझे गलत तरीके से छुआ। यहां तक कि मेरे प्रोफेसर ने यह देखा भी, लेकिन मुझे अनदेखा कर दिया। जब मैंने अपने रिश्ते के बारे में दोस्तों को बताया, तो मुझसे असंवेदनशील सवाल पूछे जैसे तुम सेक्स कैसे करते हो?, तुम्हारी शारीरिक इच्छाएं कैसे पूरी होती हैं? और कभी लड़कों के साथ करके देखो, तुम ठीक हो जाओगे।
कोलकाता विश्वविद्यालय की 23 वर्षीय एक छात्रा, जो महिला शरीर में पैदा हुई हैं, लेकिन उन्होंने कभी खुद को लड़की महसूस नहीं किया। इसलिए वे लड़कों की तरह रहती हैं और कॉलेज में उनकी दोस्ती भी लड़कों से ही होती है। वह बताती हैं, “कॉलेज में कई बार मेरी कक्षा के विद्यार्थियों ने मुझे गलत तरीके से छुआ। यहां तक कि मेरे प्रोफेसर ने यह देखा भी, लेकिन मुझे अनदेखा कर दिया। जब मैंने अपने रिश्ते के बारे में दोस्तों को बताया, तो मुझसे असंवेदनशील सवाल पूछे जैसे तुम सेक्स कैसे करते हो?, तुम्हारी शारीरिक इच्छाएं कैसे पूरी होती हैं? और कभी लड़कों के साथ करके देखो, तुम ठीक हो जाओगे। इन अनुभवों के कारण अब मैं अपने रिश्तों के बारे में किसी से बात नहीं करतीं।”यह स्थिति सिर्फ दिल्ली विश्वविद्यालय या कोलकाता विश्वविद्यालय की नहीं है, बल्कि देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में इसी तरह की चुनौतियां देखने को मिलती हैं, जो यह दिखाती हैं कि उच्च शिक्षा संस्थान अब भी पूरी तरह समावेशी नहीं बन पाए हैं।
क्वीयर विद्यार्थियों की छुपी हुई जद्दोजहद
उच्च शिक्षा संस्थान सभी के लिए समान रूप से सुरक्षित नहीं हैं, खासकर क्वीयर विद्यार्थियों के लिए, जिन्हें परिवार, समाज और कैंपस तीनों स्तरों पर स्वीकार्यता की कमी का सामना करना पड़ता है। शोध भी यह दर्शाता है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी अपनी पहचान खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते और भेदभाव झेलते हैं, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास पर गहरा असर पड़ता है। ऐसे देश में, जहां शिक्षा, रोजगार और शादी की स्थितियां कठोर सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंडों से नियंत्रित होती हैं।परिवार के सहयोग की कमी क्वीयर व्यक्तियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती है। अलगाव, समाज में घुलमिल जाने का दबाव, और शादी और बच्चे पैदा करने की अपेक्षाएं उन्हें अवसाद, आत्महत्या से मौत के विचार और अन्य समस्याओं की ओर धकेल सकती हैं।
कई लोग इस दबाव से बचने के लिए दूसरे शहरों में बसने का विकल्प चुनते हैं। हालांकि जिन परिवारों में उनकी पहचान को स्वीकार भी किया जाता है, वहां भी उनके पहनावे और अपने साथी के साथ व्यवहार पर पाबंदियां लगाई जाती हैं। यही पैटर्न कैंपस में भी दिखाई देता है, जहां विद्यार्थी अक्सर अपनी पहचान छुपाने और सामान्य दिखने के दबाव में रहते हैं। ऐसे में, जब परिवार और कैंपस दोनों जगह सीमित स्वीकार्यता मिलती है, तो ऑनलाइन समुदाय और सोशल मीडिया उनके लिए वैकल्पिक सहारा बनकर उभरते हैं।ऐसे में यह साफ़ दिखता है कि शिक्षा के ये केंद्र भी क्वीयर विद्यार्थियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित और स्वीकार्य जगह नहीं बन पाए हैं।

