हिंदी में होगी अब जेंडर और नारीवाद की बात फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ

इंटरसेक्शनल

लड़कियों को शिक्षा के अधिकार से दूर करता लैंगिक भेदभाव

अगर लड़का पढ़ना चाहता है तो भी ठीक और नहीं पढ़ना चाहता है तो भी। गांव में लड़कियों को आज भी शिक्षा के लिए लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और कई बार ये भेदभाव मानसिक और शारीरिक हिंसा तक पहुंच जाता है।

स्वास्थ्य

शौच और शर्म की संस्कृति में महिलाओं की चुनौतियाँ

आज भी महिलाओं के पसीने की बदबू को बुरा समझा जाता है और पसीना ही क्यों, महिलाओं की शौच की बदबू भी उन्हें शर्मिंदा महसूस करवाती है।

कोविड-19 टीकाकरण को लेकर फैले भ्रम के बीच पिछड़ती महिलाएं

टीके के कारण बच्चा न पैदा करने जैसा डर महिलाओं में फैलाना पित्तृसत्ता का ही रूप है। महामारी के समय में महिला के स्वास्थ्य को दरकिनार कर उसको केवल बच्चे पैदा करने तक ही सीमित रख पुरुष प्रधान सोच उसे कोरोना के टीके से वंचित रख रही है।

समाज

सच कहूँ तो, नीना गुप्ता की किताब सेंसशन का नहीं चर्चा का विषय बने| नारीवादी चश्मा

सच कहूँ तो? के ज़रिए नीना गुप्ता ने न केवल अपनी कहानी को साझा किया, बल्कि उन तमाम विषयों को भी उजागर कर चर्चा में ला दिया है।

संस्कृति

सच कहूँ तो, नीना गुप्ता की किताब सेंसशन का नहीं चर्चा का विषय बने| नारीवादी चश्मा

सच कहूँ तो? के ज़रिए नीना गुप्ता ने न केवल अपनी कहानी को साझा किया, बल्कि उन तमाम विषयों को भी उजागर कर चर्चा में ला दिया है।

गोरे एक्टर्स को सांवला दिखाकर कैसे रंगभेद बेच रहा है बॉलीवुड

रंगभेद की परिभाषा उस भेदभाव की तरफ इशारा करती है जहां सिर्फ एक त्वचा के रंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। इस परिभाषा की भारत में स्थित रंगभेद से तुलना न करें तो बेहतर है। भारत में, ब्राह्मणवाद कई प्रथाओं को आकार देता है, रंगभेद उनमें एक हैं। ब्राह्मणवाद के लिए गोरी-निखरी त्वचा पवित्रता और शक्ति का प्रदर्शन है। पवित्र होना सवर्ण होने की खासियत है।

ट्रेंडिंग

पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं|
इतिहास के आईने में महिला आंदोलन

इतिहास के आईने में महिला आंदोलन

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आजादी के बाद अस्सी का दशक भारत में स्त्री आंदोलन का दशक माना जाता है जब महिलाएं एक तरफ स्त्री के मसले पर लड़ रही थीं और दूसरी ओर राष्ट्रीय आंदोलन जारी थे।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|

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पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

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मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

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इंटेरसेक्शनल नारीवाद (Intersectional Feminism) क्या है?। फेमिनिज़म इन इंडिया
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इतिहास

नारीवाद

बेल हुक्स की नज़रों से समझें नारीवाद राजनीतिक क्यों है ?

बेल हुक्स ने जेंडर को नस्ल, वर्ग, सेक्स के साथ जोड़कर देखने की बात की, यह बिंदु समावेशी नारीवाद का स्तंभ है। चूंकि ये विमर्श पश्चिमी देशों के संदर्भ में हैं यहां जाति की बात रह जाती है। भारतीय संदर्भ में जाति को जोड़कर नारीवाद को समझना समावेशी नारीवाद का प्रमुख भाग है।

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