हिंदी में होगी अब जेंडर और नारीवाद की बात फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ

इंटरसेक्शनल

डिजिटल होती दुनिया में क्या सुरक्षित है महिलाओं और हाशिये पर जी रहे समुदायों का भविष्य

कोरोना महामारी में बच्चों की ऑनलाइन क्लास के कारण देश की ग्रामीण और हाशिये पर जी रहे परिवारों के बच्चे अलग-थलग पड़ गए। भारत में आय और लोगों की संसाधनों तक असमान पहुंच के कारण भी डिजिटल दुनिया का यह विशाल अंतर और गहराता नजर आ रहा है।

स्वास्थ्य

यूटीआई : महिलाओं को होनेवाली एक आम बीमारी, जिसपर चर्चा है ज़रूरी

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रत्येक पांच में से एक महिला को अपने जीवन में एक बार यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन होता ही है।

योनि स्त्राव : योनि से निकलने वाले सफेद पदार्थ पर क्यों चर्चा है ज़रूरी

योनि स्त्राव के लगातार होने से ये महिलाओं के लिए शारीरिक परेशानी बन जाती है, इससे बचने के लिए योनि की साफ-सफाई का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।

समाज

पढ़ें : सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन की प्रक्रिया पर क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्मी द्वारा महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के लिए तय मापदंड महिलाओं को अनुपातहीन तरीके से प्रभावित करता है।

संस्कृति

हिंदी फिल्मों के गानों की महिला-विरोधी भाषा पर एक नज़र

सिनेमा और साहित्य की भाषा में तकनीकी अंतर है। साहित्य की भाषा की रचनात्मकता से समझौता नहीं करती, वहीं फ़िल्मी गीतों की भाषा संगीत पर निर्भर होती है।

पगलैट : विधवा औरतों के हक़ की बात करती फिल्म कहीं न कहीं निराश करती है

“जब लड़की लोगों को अकल आती है न तो सब उन्हें पगलैट ही कहते हैं।” पगलैट’ की पूरी कहानी, फिल्म के इसी सबसे दमदार डायलॉग की कहानी है।

ट्रेंडिंग

इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  

नंगेली का साहस और विरोध आज भी गूंजता है!

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केरल के छेरतला में नंगेली अपने पति चिरुकंदन के साथ रहती थीं। साल 1800 में, जब राजसी शासन चलता था, तब कई तरह के कर वसूले जाते थे।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|

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पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

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मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

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इतिहास

नारीवाद

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