ख़बर

स्वास्थ्य

‘पीरियड का खून नहीं समाज की सोच गंदी है|’ – एक वैज्ञानिक विश्लेषण

पीरियड के दौरान निकलने वाला पदार्थ गंदा या अशुद्ध नहीं होता है| बल्कि ये महिला के शरीर में बनने वाला ऊर्वरक बीज होता है |

माहवारी से जुड़े दस मिथ्य, जो आज भी महिला सशक्तिकरण को दे रहे चुनौती

माहवारी से जुड़े बहुत से मिथ्य है जो हर महीने महिलाओं को प्रताड़ित करने जैसे हैं। अब समय आ गया है कि हम ऐसी अवधारणाओं को जड़ से उखाड़ फेंके।

सुरक्षित गर्भावस्था की चुनौतियाँ

मातृ मृत्यु दर के मुद्दे पर यह सकारात्मक बदलाव इतनी धीमी गति से क्यों हो रहे हैं और ख़ासकर जिन देशों में कोई सुधार नहीं हुआ है|

प्रसव के बाद भी ज़रूरी है महिला की देखभाल

विकासशील देशों में प्रसव के बाद की देखभाल जैसी सेवाएं न के बराबर मिल पाती है और आमतौर पर इसके बहुत घातक परिणाम होते हैं|

एचआईवी/एड्स से सुरक्षा और गर्भावस्था

एचआईवी/एड्स महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली अहम वजहों में से है और मातृ मृत्यु के मामलों में इसकी सही भूमिका जानना कठिन है|

सरकार से मिले कुपोषण के खिलाफ़ महिला कर्मचारियों की लड़ाई

बिहार के मीड डे मील के कर्मचारी अपनी मांगो को लेकर हड़ताल पर बैठे हुए थे, लेकिन फिलहाल यह हड़ताल उन्होनें स्थगित कर दी है| बिहार सरकार ने केवल 250 रूपये की ही बढ़ोतरी की है|

नारीवाद

इसे नारीवाद ही क्यों कहते हैं, समतावाद या मानववाद क्यों नहीं?

नारीवाद पर विश्वास करने वालों को अक्सर इस बहस का सामना करना पड़ता है कि जब ‘नारीवाद’ का मूलभाव समानता है तो इसे ‘मानवतावाद’ या फिर ‘समतावाद’ क्यों नहीं कहा जाता है|

9 नारीवादी लेखिकाओं के लेखन से समझें नारीवाद

इन नारीवादी लेखिकाओं ने अपने लेखन के माध्यम से अपने-अपने देशकाल को ध्यान में रखकर नारीवाद की एक वृहत परिभाषा को गढ़ा, जो हमें नारीवाद को समझने में बेहद मददगार साबित होती है|

नये जमाने की हिंदी कविता और नारीवाद

'हिंदी कविता में नारीवाद' के बारे में बात की जाए तो भी इस विषय से जुड़े सभी नामों पर एक साथ चर्चा कर पाना मुमकिन नहीं है। इस लेख में मौजूदा समय की कवयित्रियों की कुछ चुनिंदा कविताओं के बारे में बात की जा रही है।

सोशल मीडिया

4,505FansLike
385FollowersFollow
32FollowersFollow

आपके पसंदीदा लेख

पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

भारत में स्त्री संघर्ष और स्त्री अधिकार के आन्दोलन को इसी रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है|

इतिहास

फूलन देवी : बीहड़ की एक सशक्त मिसाल

फूलन देवी की कहानी को हर स्त्री को पढ़ना चाहिए क्योंकि हम फूलन तो नहीं बन सकते लेकिन उनसे प्रेरणा तो ले ही सकते है|

नारीवादी डॉ भीमराव अम्बेडकर : महिला अधिकारों के लिए मील का पत्थर साबित हुए प्रयास

महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई डॉ. भीमराव अंबेडकर ने वर्षो पहले ही शुरू कर दी थी| उन्होंने साल 1942 से महिला अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू की|

झलकारी बाई : शौर्य और वीरता की सशक्त मिसाल ‘दलित इतिहास के स्वर्णिम गलियारे से’

झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं में सुनी जा सकती है और भारत सरकार ने में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया है|

द्रविण आंदोलन : ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ सबसे प्रभावी आंदोलन में से एक

द्रविण आंदोलन ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक ऐतिहासिक आंदोलन था, जिसका उद्देश्य लोगों में राजनीतिक चेतना विकास और महिला अधिकारों की सुरक्षा करना था|

यौनिकता

बचपन से ही बोये जाते है लैंगिक असमानता के बीज

सामाजिक रूढ़िवादी सोच के आधार पर, छोटी बच्चियों को नाज़ुक बताकर, उन्हें बचपन से ही हल्के-फुल्के खेलों में आगे बढ़ाया जाता है।

‘पीरियड का खून नहीं समाज की सोच गंदी है|’ – एक वैज्ञानिक विश्लेषण

पीरियड के दौरान निकलने वाला पदार्थ गंदा या अशुद्ध नहीं होता है| बल्कि ये महिला के शरीर में बनने वाला ऊर्वरक बीज होता है |

कार्यस्थल पर यौन हिंसा करने वालों के नाम ‘एक पड़ताल’

कार्यस्थल पर यौन हिंसा के संदर्भ जब भी कोई चर्चा या लेख देखती हूँ तो कई बातें खुद से पूछती और जवाब देती रहती हूँ|

पहाड़ों की वो आज़ाद औरतें, जो अब नहीं है

पहाड़ों में जब शादी और परिवार की संस्थायें इतनी मज़बूत नहीं थी तो महिलायें एक परिवार में नहीं रहती थी और ये सामान्य था|

#FIIExplains