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स्वास्थ्य

अग्नि परीक्षा के बहाने इसके मूल मुद्दे ‘वर्जिनिटी’ की बात !

पवित्रता की अग्नि परीक्षा आदिकाल से अब आधुनिक काल तक महिलाएँ देती आ रही हैं। लेकिन परीक्षा के तौर तरीके में अब कई बदलाव हो गया है।

कोरोना वायरस का सबसे बड़ा शिकार ‘देश के गरीब हैं’

महामारी का सबसे ज़्यादा प्रभाव वंचित तबके पर पड़ रहा है, जिसे फैलने से रोकने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थोपी गई है, जहां वे असमर्थ हैं।

क्या हमारा भारत कोरोना वायरस पर जीत हासिल करने के लिए तैयार है ?

अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं सिर्फ़ चंद शहरी प्राइवेट अस्पतालों में है, जहां ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले सैकड़ों लोगों के लिए मुमकिन नहीं है।

क्या है औरतों पर कोरोना वायरस का असर?

मुसीबत की इस घड़ी में ज़रूरत है एकजुट होकर हालात सुधारने की क्योंकि लिंग आधारित सामाजिक भेदभाव हमें और अँधेरे की तरफ ही ले जाएगा।

ऐसी है चीन में ‘कोरोना’ से लड़ती ‘नर्सों की हालत’

शायद यह महामारियां इंसानों को एक जगह खड़ा करके यह बताना चाहती हैं कि प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ हमें केवल पतन की ओर ही ले जा रही है।

केरल को कोरोना और निपाह के कहर से बचाने वाली के.के. शैलजा ‘टीचर अम्मा’

केरल को निपाह और कोरोना जैसी भयानक महामारी की चपेट में से निकालना आसान नहीं है। लेकिन टीचर अम्मा की कोशिशें इसे मुमकिन कर रही हैं।

नारीवाद

जेंडर के इन दो छोर में ‘मैं कहाँ जाऊँ?’

सुरक्षा के नामपर हमने सार्वजनिक स्थानों को जेंडर के आधार पर इस तरह बाँट दिया कि यही सुरक्षित स्थान अब लोगों के एक पूरे समूह के लिए असुरक्षित बन गए हैं।

महिला दिवस : एकदिन का ‘क़िस्सा’ नहीं बल्कि हर रोज़ का ‘हिस्सा’ हो

यूएन की तरफ़ से अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस पर इसबार की थीम में महिलाओं को उनके अधिकार के लिए जागरूक करना और लैंगिक समानता को केंद्र में रखा गया है।

पाँच ज़रूरी बात : पुरुषों को क्यों होना चाहिए ‘नारीवादी’? आइए जाने

नारीवाद की असली लड़ाई इस समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था से है जो न केवल महिलाओं के लिए हानिकारक है बल्कि पुरुषों का जीवन भी बर्बाद कर रही हैं।

सोशल मीडिया

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पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

भारत में स्त्री संघर्ष और स्त्री अधिकार के आन्दोलन को इसी रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है|

इतिहास

वैकोम सत्याग्रह : छुआछूत के ख़िलाफ़ एक ऐतिहासिक जंग

इस आंदोलन की एक खासियत थी इसमें शामिल महिलाएं। उस दौर में राजनैतिक जीवन में महिलाओं ने सक्रिय होना शुरू ही किया था।

अरक-विरोधी आंदोलन : एक आंदोलन जिसने बताया कि शराब से घर कैसे टूटते हैं!

अरक विरोधी आंदोलन इसबात का अच्छा उदाहरण है कि किस तरह शिक्षा औरतों को सशक्त बनाती है और कैसे पढ़ना-लिखना हमें अपने अधिकारों से वाक़िफ़ कराता है।

महाड़ सत्याग्रह के इतने सालों बाद भी ‘भेदभाव’ के ख़िलाफ़ ज़ारी है संघर्ष

आज ही के दिन साल 1927 में  भीमराव आंबेडकर की अगुवाई में दलितों को अधिकार दिलाने के लिए 'महाड़ सत्याग्रह' किया गया था।

भंवरी देवी : बाल विवाह के ख़िलाफ़ एक बुलंद आवाज़ जिसे पितृसत्ता ने दबाकर रखा

शोध के अनुसार भारत में सबसे ज़्यादा बाल विवाह होते हैं। इसी बाल विवाह के ख़िलाफ़ खड़ी हुई थी राजस्थान की एक सरकारी कर्मचारी 'भंवरी देवी।'

यौनिकता

अग्नि परीक्षा के बहाने इसके मूल मुद्दे ‘वर्जिनिटी’ की बात !

पवित्रता की अग्नि परीक्षा आदिकाल से अब आधुनिक काल तक महिलाएँ देती आ रही हैं। लेकिन परीक्षा के तौर तरीके में अब कई बदलाव हो गया है।

औरत कोई ‘चीज़’ नहीं इंसान है, जिसके लिए हमें ‘अपनी सोच’ पर काम करना होगा।

बाज़ार ने औरत को वस्तु की तरह चित्रित किया गया, जिसमें महिलाओं को 'इंसान' की बजाय एक 'वस्तु' की तरह दिखाया जाता है।

क्या है औरतों पर कोरोना वायरस का असर?

मुसीबत की इस घड़ी में ज़रूरत है एकजुट होकर हालात सुधारने की क्योंकि लिंग आधारित सामाजिक भेदभाव हमें और अँधेरे की तरफ ही ले जाएगा।

पितृसत्ता पर लैंगिक समानता का तमाचा जड़ती ‘दुआ-ए-रीम’ ज़रूर देखनी चाहिए!

सात मिनट और चंद सेकेंड की इस विडियो को जब हम देखते हैं तो इसकी शुरुआत में हम देश, काल, भाषा और धर्म से परे महिला को ‘एक स्थिति’ में पाते है।

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इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
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आजकल फैमिली ग्रुप में अपने बड़े-बूढ़े और रिश्तेदारों की तरफ से शेयर किये जाने वाले कुछ उन चुनिन्दा भद्दे व्हाट्सएप्प मेसेज के बारे बात करने जा रही हूँ, जो महिलाओं के प्रति व उनसे बनाये जाने वाले रिश्ते के प्रति की अपनी घिनौनी सोच को साझा करते हैं|
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लस्ट स्टोरी समाज के अलग-अलग तबके में आधी आबादी के उस आधे किस्से को बयाँ करती है जिसे हमेशा चरित्रवान और चरित्रहीन के दायरें में समेटा गया है|
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