हिंदी साहित्य में विधवाओं का चित्रण: सहानुभूति की पात्र से आज़ादी तक
हिंदी साहित्य में जब भी विधवा जीवन को लिखा गया है, तो सबसे पहले वह सहानुभूति के नजर से ही देखी गई है। बेटों की माँ होकर विधवा महिला समाज में अपनी साख बनाए रखने के लिए, अपने ही घर में अपने अस्तित्व को खो देती है। जैसे प्रेमचंद के उपन्यास प्रतिज्ञा में नायिका के पति की मृत्यु के बाद उसे घर से निकाल दिया जाता है।







