आखिर भारतीय सिनेमा ट्रांस समुदाय का चित्रण एक ‘ट्रोप’ की तरह करना कब बंद करेगा?
ट्रांस लोगों की कहानियां ज्यादातर वे लोग लिखते और निभाते हैं जो खुद ट्रांस समुदाय से नहीं होते हैं। जब असली अनुभव कहानी में शामिल ही नहीं होते, तो किरदार सतही और बनावटी लगते हैं। नतीजतन सिनेमा ट्रांस पहचान को जटिल मानवीय अनुभव के रूप में नहीं बल्कि पहले से तय किये हुए पैटर्न जैसे कॉमिक, खलनायक, पारंपरिक काम, सड़कों पर भीख मांगते हुए और विक्टिम के रूप में स्क्रीन पर दिखाए जाते हैं।







