Monday, July 6, 2020
Intersectional Feminism—Desi Style!

ख़बर

क्या ऑनलाइन परीक्षाएं होनी चाहिए?

वैश्विक महामारी में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि हर छात्र की ज़िंदगी स्वाभाविक रूप में है और वे सामान्य दिनों की तरह पढ़कर पास हो जाएंगे।

स्वास्थ्य

ऐनोरेक्सीया : एक मानसिक बीमारी जो आपको अंदर से खोखला करती है।

ऐनोरेक्सीया होने की संभावना औरतों को मर्दों से दस गुना ज़्यादा है। आमतौर पर यह 15 से 19 साल की लड़कियों में ज़्यादा देखा जाता है।

‘एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन’ क्योंकि यौन संक्रामक रोग कोई शर्मनाक चीज़ नहीं है !

एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन साल 1988 में दिल्ली में शुरू हुआ था। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एड्स से जुड़े कलंक को हटाने के लिए इसे शुरू किया।

‘फेयर एंड लवली’ सालों तक रेसिज़्म बेचने के बाद नाम बदलने से क्या होगा?

फेयरनेस क्रीम कंपनियों ने लैंगिक असमानता का भरपूर फायदा उठाया। महिलाओं के लिए ‘फेयर एंड लवली’ और पुरुषों के लिए में ‘फेयर एंड हैंडसम’ बनाकर।

डॉ मीतू खुराना : देश की पहली महिला जिसने ‘बेटी’ को जन्म देने के लिए लड़ी क़ानूनी लड़ाई

डॉ मीतू खुराना कोई हाई प्रोफ़ाइल इंसान नहीं थी। वह माँ थी। जुड़वा बच्चियों की माँ। वह माँ जिन्होंने PNDT एक्ट के तहत पहला मामला दर्ज कराया।

आइए पीरियड्स पर चर्चा करें और मिथ्य तोड़े !

पीरियड्स पर बात करने के लिए खुद ही हिचक को तोड़ना होगा और पीरियड्स को लेकर जागरूकता फैलाने वाली मुहिमों से जुड़ना होगा।

पुरुषों को आंसू छिपाने की बजाय खुलकर बोलना सीखना होगा

हमारे समाज की विडंबना है कि हमें पुरुषों को रोते देखना बेहद अज़ीब लगता है क्योंकि हमारी सामाजिक संरचना में पुरुष रोते नहीं हैं।

नारीवाद

तुलसी गौडा : पद्मश्री से सम्मानित कर्नाटक की ‘वन विश्वकोष’

तुलसी गौड़ा अपने क्षेत्र के हर जंगल को अपने हाथ की लकीरों से अच्छा पहचानती हैं, इसलिए उन्हें जंगलों का ‘एन्साइक्लोपीडिया' कहा जाता है।

विदूषी किशोरीताई आमोणकर : एक बेबाक, बेख़ौफ़ और बेहतरीन गायिका

किशोरीताई को एक बात बहुत खटकती थी कि जहां पुरुष गायकों को 'पंडित' या 'उस्ताद' से संबोधित किया जाता था, गायिकाओं के लिए ऐसी कोई उपाधि नहीं थी।

बेहतर भविष्य के लिए लड़नेवाली 5 भारतीय महिला पर्यावरणविद

यहां हम बात करेंगे पांच ऐसी महिला पर्यावरण विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की, पर्यावरण संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में जिनका काम अमूल्य रहा है।

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ट्रेंडिंग

पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं|
पितृसत्ता पर लैंगिक समानता का तमाचा जड़ती 'दुआ-ए-रीम' ज़रूर देखनी चाहिए!

पितृसत्ता पर लैंगिक समानता का तमाचा जड़ती ‘दुआ-ए-रीम’ ज़रूर देखनी चाहिए!

सात मिनट और चंद सेकेंड की इस विडियो को जब हम देखते हैं तो इसकी शुरुआत में हम देश, काल, भाषा और धर्म से परे महिला को ‘एक स्थिति’ में पाते है।
उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

इतिहास

तुलसी गौडा : पद्मश्री से सम्मानित कर्नाटक की ‘वन विश्वकोष’

तुलसी गौड़ा अपने क्षेत्र के हर जंगल को अपने हाथ की लकीरों से अच्छा पहचानती हैं, इसलिए उन्हें जंगलों का ‘एन्साइक्लोपीडिया' कहा जाता है।

डॉ मीतू खुराना : देश की पहली महिला जिसने ‘बेटी’ को जन्म देने के लिए लड़ी क़ानूनी लड़ाई

डॉ मीतू खुराना कोई हाई प्रोफ़ाइल इंसान नहीं थी। वह माँ थी। जुड़वा बच्चियों की माँ। वह माँ जिन्होंने PNDT एक्ट के तहत पहला मामला दर्ज कराया।

विदूषी किशोरीताई आमोणकर : एक बेबाक, बेख़ौफ़ और बेहतरीन गायिका

किशोरीताई को एक बात बहुत खटकती थी कि जहां पुरुष गायकों को 'पंडित' या 'उस्ताद' से संबोधित किया जाता था, गायिकाओं के लिए ऐसी कोई उपाधि नहीं थी।

रज़िया सुल्तान : भारत की पहली महिला मुस्लिम शासिका

रज़िया सुल्तान की कहानी, एक स्त्री के लिए पर्दे और झरोखों की दुनिया से निकलकर अपनी खुद की पहचान बनाने की दास्तां है।

यौनिकता

‘एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन’ क्योंकि यौन संक्रामक रोग कोई शर्मनाक चीज़ नहीं है !

एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन साल 1988 में दिल्ली में शुरू हुआ था। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एड्स से जुड़े कलंक को हटाने के लिए इसे शुरू किया।

‘फेयर एंड लवली’ सालों तक रेसिज़्म बेचने के बाद नाम बदलने से क्या होगा?

फेयरनेस क्रीम कंपनियों ने लैंगिक असमानता का भरपूर फायदा उठाया। महिलाओं के लिए ‘फेयर एंड लवली’ और पुरुषों के लिए में ‘फेयर एंड हैंडसम’ बनाकर।

‘प्राईड’ और राजनीति एक दूसरे से अलग नहीं है

प्राईड राजनैतिक है। और होना भी चाहिए। शोषणकारी व्यवस्था पर जीत तभी हासिल हो सकती है जब समाज का हर तबका सशक्त हो।

पीरियड पर बात से ‘लैंगिक संवेदनशीलता’ की बात बनने लगती है।

पीरियड जैसे संवेदनशील मुद्दे को हम महिला का मुद्दा समझकर नज़रंदाज़ करते है तो ये लैंगिक समानता और संवेदनशीलता के लिए रोड़ा बनते जाता है।

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पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

भारत में स्त्री संघर्ष और स्त्री अधिकार के आन्दोलन को इसी रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है|