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ख़बर

स्वास्थ्य

गर्भनिरोध के लिए घरेलू हिंसा का सामना करती महिलाएं

गर्भनिरोधों और परिवार नियोजन के लिए जब महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार होने लगे तो नतीजा जनसंख्या विस्फोट ही होगा।

कोरोना महामारी के दौरान कहीं पीछे छूट न जाए महिला स्वास्थ्य के मुद्दे

हमारी सामाजिक संरचना ही ऐसी है जिसमें महिलाओं को अपनी शारीरिक समस्या पर सबके सामने बात करने की इजाज़त नहीं होती है।

स्वास्थ्य और अधिकार की जानकारी से बढ़ेगा किशोरियों का आत्मविश्वास

किशोरियों का अपने अधिकारों और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक न होना, सीधेतौर पर उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करता है।

सुशांत सिंह राजपूत केस मानसिक स्वास्थ्य के बारे में हमारी कमजोर समझ का उदाहरण है

सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु का कारण अब तक पता नहीं चला है। पर इस केस ने देश में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी समस्या को उजागर किया है।

कोरोना महामारी के दौरान पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं में क्यों हो रही बढ़ोतरी ?

पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं में कोरोना महामारी के कारण लागू हुए लॉकडाउन के दौरान डॉक्टरों के मुताबिक लगभग 20 से 25 फ़ीसद बढ़ोतरी हुई है।

लॉकडाउन में हाशिये पर पहुंचा गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य

कोरोना वायरस के कारण लागू किए गए लॉकडाउन ने देश की कई गर्भवती महिलाओं को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित कर दिया है।

नारीवाद

थर्ड वेव ऑफ फेमिनिज़म : नारीवादी आंदोलन की तीसरी लहर का इतिहास

नारीवादी आंदोलन की तीसरी लहर नारीवादी आंदोलन की वह यात्रा है, जो 1990 के अमेरिका में शुरू हुई और 2010 तक चौथे चरण की शुरुआत तक खत्म हुई।

कोरोना महामारी में परिवार की समस्या और लड़की की जल्दी शादी | नारीवादी चश्मा

आर्थिक तंगी झेल रहा ग्रामीण तबका कोरोना महामारी में लड़कियों की जल्दी शादी करने को सभी समस्या का हल समझ रहा है।

कोरोना राहत कार्य में हावी पितृसत्ता का ‘नारीवादी विश्लेषण’| नारीवादी चश्मा

जब हम कोरोना राहतकार्य में किए गये प्रयासों का नारीवादी नज़रिए से विश्लेषण करते है तो इनमें अक्सर पितृसत्तात्मक विचारधारा को हावी पाते है।

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ट्रेंडिंग

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|
पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं|

पितृसत्ता से कितनी आजाद हैं महिलाएं?

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हमारे समाज में कई तरह की असमानताएं हैं। स्त्री और पुरुष के बीच असमानता भी उन में से एक है। आम तौर पर पितृसत्ता का प्रयोग इसी असमानता को बनाए रखने के लिए होता है। नारीवादी अध्ययन का एक नया क्षेत्र है। इसलिए नारीवादी विमर्श का पहला काम यही है कि महिलाओं को अधीन करने वाली जटिलताओं और दांवपेच को पहचाना जाए और उसे एक उचित नाम दिया जाए। बीसवीं सदी के आठवें दशक के मध्य से नारीवादी विशेषज्ञों ने ‘पितृसत्ता’ शब्द का प्रयोग किया।

इतिहास

थर्ड वेव ऑफ फेमिनिज़म : नारीवादी आंदोलन की तीसरी लहर का इतिहास

नारीवादी आंदोलन की तीसरी लहर नारीवादी आंदोलन की वह यात्रा है, जो 1990 के अमेरिका में शुरू हुई और 2010 तक चौथे चरण की शुरुआत तक खत्म हुई।

फ़ातिमा शेख़ : भारत की वह शिक्षिका और समाज सुधारक, जिन्हें भुला दिया गया

फ़ातिमा शेख़ ने शिक्षा को निचले स्तर तक ले जाने का बीड़ा उठाया था। उन्होंने दलितों और अल्पसंख्यकों के घर जाकर उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

रूप कंवर : भारत की वह आखिरी महिला जिसकी मौत सती प्रथा के कारण हुई

रूप कंवर की हत्या का मामला यही दिखाता है कि कानून में चाहे कितने भी बदलाव आएं, समाज और लोगों की मानसिकता को बदलना ज़्यादा मुश्किल है।

परवीना एंगर : कश्मीर के ‘गायब’ हुए लोगों की लड़ाई लड़ने वाली आयरन लेडी

परवीना एंगर ने साल 1994 कश्मीर के मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील परवेज़ इमरोज़ और अन्य लोगों के साथ मिलकर एपीडीपी की शुरुआत की।

यौनिकता

किसी रिश्ते से अलग होना महिलाओं का अधिकार है

महिला और पुरुष दोनों को बराबर अधिकार है कि वे खुद तय करें कि उनको जीवन में किसके साथ रहना है या नहीं रहना है।

ट्राँस पुरुष और मानसिक स्वास्थ्य की बात समय की ज़रूरत है

आज ज़रूरी है कि हम ट्राँसपुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करें, इसे समझें और बिना किसी भेदभाव या निर्णय के सहयोगी बने।

बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर : एक बीमारी जिसमें अपने शरीर से ही नफ़रत होने लगती है।

बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर एक मानसिक बीमारी है जिससे ग्रस्त व्यक्ति को अपने चेहरे और शरीर से इस प्रकार नफ़रत हो जाती है।

खुला ख़त : उन लोगों के नाम, जिनके लिए सुंदरता का मतलब गोरा होना है।

क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी इस सड़ी और बदबूदार रंगभेदी सोच ने किस तरह महिला हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा दिया है?

आपके पसंदीदा लेख

पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

भारत में स्त्री संघर्ष और स्त्री अधिकार के आन्दोलन को इसी रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है|