देश के प्रतिष्ठित संस्थान बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से जागृति ने अपनी पढ़ाई पूरी की थी| आईएएस पापा की एकलौती बेटी थी वो| पढ़ाई-लिखाई के अलावा, घर के कामों से लेकर हर एक्स्ट्रा-कर्रिकुल्म में अच्छी थी जागृति| उसे कई अच्छी नौकरियों के ऑफर भी मिले थे| पर, वो आईएएस बनकर अपने पापा का सपना पूरा करना चाहती थी|

एकदिन उसके घर में कुछ रिश्तेदार आये हुए थे| उसदिन जागृति ने अपने पापा के मुंह से उसे लेकर ऐसी बातें सुनी कि उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी| उसके पापा उनलोगों से कह रहे थे कि, ‘मेरी लड़की तो सांवली है| हमें तो उसके लिए पचास-साठ लाख रुपए के साथ चप्पल भी घिसनी पड़ेगी|’ ये सब सुनते ही, जागृति को अपनी पढ़ाई-लिखाई और सभी उपलब्धियां मिट्टी लगने लगी| उसकी ये प्रतिक्रिया बिल्कुल ज़ायज भी थी, क्योंकि समाज में प्रतिष्ठित ओहदे वाले अपने पिता को उसने हमेशा से अपना आदर्श माना था| जागृति ने थिएटर से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक में काम किया था| लेकिन उसे कभी-भी अपने सांवले रंग की वजह से किसी भी तरीके की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा| पर दुर्भाग्यवश, जीवन में अपनी सांवली रंगत पर पहली टिप्पणी उसे अपने ही पिता से सुननी पड़ी थी|

विकास-पथ की अंधी-दौड़ में भागते अपने देश का यह वो कड़वा सच जहां जागृति जैसी कितनी लड़कियों को अपनी सांवली रंगत की वजह से तिरस्कृत होना पड़ता है| जर्मन नेशनल कमेटी, यूएन विमेन की उपाध्यक्ष डॉ. कंचना लांसेट कहती हैं-

‘मैंने कई बार मां बाप के या परिजनों के मुंह से सुना है, अभागी काली लड़की| उसके इतने अच्छे नाक नक्श हैं, बस गोरी होती| इसके बाद मिलियन डॉलर का ऑफर आता है, कौन एक काली लड़की से शादी करेगा| उसके लिए अच्छा लड़का ढूंढना मुश्किल हो जाएगा|’

समाज की इसी सोच ने लड़कियों को अपनी सांवली रंगत पर सोचने को मजबूर कर दिया है| वास्तव में रंगभेद का आईना हमें समाज के उस अक्स से रु-ब-रु करवाता है जहां सभी जगहों पर गोरी बहुओं की तलाश ज़ारी है| रविवार के दिन अखबार में आने वाले वैवाहिक अंक में हम इस तलाश को प्रत्यक्ष रूप से देख सकते है| यहां मोटे शब्दों में लिखा होता है – मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत लड़के के लिए गोरी-सुंदर लड़की चाहिए| चूँकि आज भी भारतीय समाज की पहचान एक पितृसत्तात्मक समाज के तौर पर होती है और यहां लड़कियों को घर संभालने का साधन मात्र समझा जाता है| ऐसे में इन विज्ञापनों को देखकर यह साफ़ जाहिर होता है कि अपने बेटे के लिए हम जिस लक्ष्मी का चुनाव कर रहे है, उसमें घर चलाने के गुण भले ही न हो पर, उसकी रंगत गोरी होनी चाहिए|

यह दुखद है कि सांवले रंग की लड़की के जन्म पर किसी गोरे रंग की बच्ची से ज्यादा दुख और अफ़सोस जताया जाता है| समाज में यह धारणा बहुत गहराई से जज्ब है कि गहरे रंग की त्वचा सुंदर नहीं होती| विवाह के समय ज्यादा दहेज देकर लड़की के सांवले रंग के ‘अवगुण’ की भरपाई करने की कोशिश की जाती है| यह रंगभेदी समाज नहीं तो क्या है| मुद्दा तो यह है कि भारत में रंगभेद एक बड़े रूप में मौजूद है| एक तरह से कहा जा सकता है कि भारत में जहां लोगों की नजर गोरी चमड़ी पर पड़ती है, वहीं वह गोंद की तरह चिपक जाती है| लड़का सांवला हो तो चलता है लेकिन लड़की गोरी ही होनी चाहिए| ऐसी धारणाओं के चलते आज भी हमारे देश में लाखों लड़कियाँ रंगभेद के कारण हीन भावना से जूझ रही है| शादी के बाज़ार में रिजेक्ट हो रही इन लड़कियों ने रंगत को लेकर समाज की सोच बदलने की आस न जाने कब की छोड़ दी है| नतीजतन उन्हें न चाहते हुए भी बाजार में उपलब्ध रंगत गोरा करने वाले तमाम उत्पादों का सहारा लेना पड़ रहा है|

गौरतलब है कि भारत में रंगभेद की इस रंगत से फ़िल्मी-जगत के रंगीन पर्दे भी अछूते नहीं रहे है| चाहे फिल्मों के गाने हो या फिर फिल्मों में अभिनेत्री का चयन हर जगह सिर्फ गोरे रंग की ही लीपापोती दिखाई पड़ती है| लेकिन ऐसा नहीं कि गोरे रंग के काले साये की चपेट में सिर्फ फ़िल्मी जगत ही है, बल्कि आज का इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी पूरी तरह इस साये में अपनी रोटी सेंकता नज़र आता है| बस फ़र्क सिर्फ इसके प्रस्तुतिकरण में होता है| किसी हीरो/हिरोइन या समाज की किसी नामचीन हस्ती के रंगभेद से संबंधित कोई बयान देते ही, उनके बयान पर न्यूज़ चैनलों में बहस का आयोजन कर दिया जाता है|

ये बहसें चैनलों की आम बहसों की ही तरह होती है, जिनमें समाज के अलग-अलग वर्गों के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों को बुलाकर बाजारू चौपाल सजा दी जाती है| सभी वक्ता-मेहमान, रंगों के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ़ लंबे-चौड़े भाषण देते है और चंद मिनट में ये बहसें झगड़े का रूप ले लेती है| ऐसे में गोरी रंगत के बावजूद सफेदी वाले मेकअप पोते एंकर बार-बार अपना गला फाड़-फाड़कर मेहमानों के चिल्लपों की बनती गुत्थी को गुथने से रोकने की नाकाम कोशिश करते है| वहीं दूसरी तरफ, इन बाजारू बहसी-चौपालों वाले कार्यक्रमों के प्रायोजक होते है – सालों से लोगों को गोरा करने की मुहीम में लगे – फेयरनेस क्रीम, साबुन, व टॉनिक| इस तरह दोहरे-चरित्र वाला आज का यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी रंगभेद की इस कुप्रथा को पनाह दे रहा है|

शिक्षा का क्षेत्र हो या रोजगार की तलाश, परिवार व आस-पड़ोस में सम्मान हो या फिर शुभ विवाह; हर जगह ‘गुड लुकिंग’ की डिमांड है और इस गुड लुकिंग के लिए ज़रूरी है- सिर्फ गोरी रंगत| विकासशील सभ्य समाज में रंगभेद की समस्या बेहद शर्मसार करने वाली है| इंसान का अपनी बनावट और रंगत पर कोई वश नहीं होता है| यह जानते हुए भी समाज के लोगों और खासतौर पर खुद को बुद्धिजीवी व आधुनिक समझने वाले लोगों का इस तरह रंगभेद को बढ़ावा देना चिंताजनक है| भारतीय समाज में गोरी रंगत के इस काले साये ने तेज़ी से सफलता के मानक को योग्यता व गुणों से परे उन्हें अधिक सिकोड़ते हुए इंसान की रंगत तक संकुचित कर दिया है|

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2 COMMENTS

  1. While I appreciate an article regarding Feminism in India being written in an Indian language, I can’t read hindi.
    If possible, I’d love to read a translation.

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