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बीसवीं सदी के शुरुआती दशक में विश्व एक नई करवट ले रहा था। हिंदुस्तान में भी हलचल थी। गुलामी का दामन उतार फेंकने को आमादा भारत अपने वजूद को हासिल करने की जिद पर अड़ा था। राजनीतिक और आर्थिक ही नहीं, सामाजिक बदलावों के लिए भी उथल-पुथल मची थी। साहित्य जगत भी नया रूप-रंग अंगीकार करने को उतावला हो रहा था। ऐसे ही झंझावतों वाले दौर में हिंदुस्तानी साहित्य में एक ऐसे सितारे का उदय हुआ, जिसने अपनी कहानियों से अपने समय और समाज को नंगा सच दिखाया। इस लेखक का नाम था- सआदत हसन मंटो।

मंटो अपना परिचय अपने अंदाज में कुछ यों देते हैं,

‘……मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना मेरा जन्म था। मैं पंजाब के एक अज्ञात गांव ‘समराला’ में पैदा हुआ। अगर किसी को मेरी जन्मतिथि में दिलचस्पी हो सकती है तो वह मेरी मां थी, जो अब जीवित नहीं है। दूसरी घटना साल 1931 में हुई, जब मैंने पंजाब यूनिवर्सिटी से दसवीं की परीक्षा लगातार तीन साल फेल होने के बाद पास की। तीसरी घटना वह थी, जब मैंने साल 1939 में शादी की, लेकिन यह घटना दुर्घटना नहीं थी और अब तक नहीं है। और भी बहुत-सी घटनाएं हुईं, लेकिन उनसे मुझे नहीं दूसरों को कष्ट पहुंचा। जैसे मेरा कलम उठाना एक बहुत बड़ी घटना थी, जिससे ‘शिष्ट’ लेखकों को भी दुख हुआ और ‘शिष्ट’ पाठकों को भी।’

मंटो उर्दू के एकमात्र ऐसे कहानी-लेखक हैं, जिनकी रचनाएं जितनी पसंद की जाती हैं, उतनी ही नापसंद भी। और इसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है कि उन्हें गालियां देने वाले लोग ही सबसे अधिक उसे पढ़ते हैं। ‘ताबड़तोड़ गालियां खाने’ और ‘काली सलवार’, ‘बू’, ‘धुआं’, ठंडा गोश्त’, व ‘खोल दो’ जैसी रचनाओं के कारण बार-बार अदालतों के कटघरे में घसीटे जाने पर भी वे बराबर उस वातावरण और उन पात्रों के संबंध में कहानियां लिखते रहे, जिन्हें ‘सभ्य’ लोग घृणा की नजर से देखते हैं और अपने समाज में कोई स्थान देने को तैयार नहीं हैं। दरअसल, उनकी कहानियां समाज का पोस्टमार्टम करती हैं। इसलिए पाठक उन्हें पढ़ते हुए विचलित हो जाते हैं।

यह सही है कि जीवन के बारे में मंटो का दृष्टिकोण कुछ अस्पष्ट और एक सीमा तक निराशावादी है। वे अपने युग के बहुत बड़े निंदक थे, लेकिन मानव मनोविज्ञान को समझने और फिर उसके आलोक में झूठ का पर्दाफाश करने की जो क्षमता मंटो को थी, वह निसंदेह किसी अन्य उर्दू लेखक में नहीं है। बेबाक सच लिखने वाले मंटो ने कई ऐसे मुद्दों को छुआ, जिन्हें उस समय के समाज में बंद दरवाज़ों के पीछे दबा कर-छुपा कर रखा जाता था।

सच सामने लाने के साथ, कहानी कहने की अपनी बेमिसाल अदा और उर्दू जबान पर बेजोड़ पकड़ ने सआदत हसन मंटो को कहानी का बेताज बादशाह बना दिया। मात्र 43 सालों की जिंदगी में उन्होंने 200 से अधिक कहानियां, एक उपन्यास, तीन निबंध-संग्रह, अनेक नाटक और रेडियो व फिल्म पटकथाएं लिखीं।

मंटो की कहानियों में अक्सर अश्लीलता के इल्ज़ाम लगते थे, जिसके जवाब में वे कहते- ‘अगर आपको मेरी कहानियां अश्लील या गंदी लगती हैं, तो जिस समाज में आप रह रहे हैं, वह अश्लील और गंदा है। मेरी कहानियां तो केवल सच दर्शाती हैं।

भारतीय-साहित्य में नारीवाद की शुरुआत करने वाले लेखकों में मंटो भी शामिल हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के जरिए महिलाओं और उनसे जुड़े तमाम पहलुओं को बेबाकी से सामने रखा, जो हमेशा से हमारे सभ्य-समाज की बुनियाद में छिपी घिनौनी सच्चाई रही है।

मंटो की कहानियों का विश्लेषण करने के बाद, जब हम बात करते हैं उनकी रचनाओं में महिलाओं की, तो उनसे जुड़े मुद्दों को समझने के लिए हम उनकी महिला पात्रों को तीन प्रमुख वर्गों में बांट सकते हैं- लड़की, गृहणी और वेश्या।
मंटो की लिखी कहानी ‘शरीफन’, ‘ठंडा गोश्त’ और ‘खोल दो’ वस्तुत: बंटवारे व हिंदू-मुसलिम फसादों में महिलाओं की उस स्थिति को दर्शाती है, जब सभ्य समाज की कथित इंसानियत, हैवानियत और वहशीपन में तब्दील होने लगती है। लेखक ने ‘शरीफन’ और ‘सकीना’ नाम की पात्रों के जरिए उस तस्वीर को सामने रखा, जहां समाज के लिए ये दो लड़कियां नहीं, बल्कि मांस का वो लोथड़ा है, जिनसे शरीफजादे अपने हवस को ठंडा करते हैं।

वहीं दूसरी ओर, कहानी ‘धुआं’ के जरिए मंटो ने एक ऐसी सशक्त लड़की की दास्तां बयां की, जो अपने आपको किसी भी मामले में अपने भाई से कम नहीं मानती। ‘औलाद’ मंटो की एक ऐसी कहानी है, जिसमें उन्होंने समाज की बनाई स्त्री का बखूबी चित्रण किया है। यह मुसलिम विवाहिता की ऐसी कहानी है, जो बच्चे की चाहत में पागल हो जाती है और इस चाहत का खाका भी खुद उसकी मां ने खींचा होता है। इस कहानी के जरिए मंटो ने अपने बेबाक अंदाज में महिलाओं के मन में समाज की जमाई उन तमाम परतों को उजागर किया, जो हमारे महिला को महिला साबित करने के लिए ज़रूरी होती है। अगर वे इनके किसी भी एक पहलू पर खरी नहीं उतरतीं, तो यह सभ्य समाज उनके अस्तित्व को अस्वीकार कर देता है।

मंटो की महिला केंद्रित कहानियों में तीसरा प्रमुख वर्ग है- वेश्या। उन्होंने अपनी कहानियों में वेश्याओं की संवेदनाओं को जिस कदर उकेरा है, वैसा उनसे पहले किसी भी लेखक ने नहीं किया। कहानी ‘काली सलवार’ की सुलताना, वेश्याओं की तमाम हसरतों को हमारे सामने रखती है, जिससे यह साबित होता है कि उसका अस्तित्व सिर्फ लोगों की जिस्मानी जरूरतों को पूरा करना वाली एक वस्तु की तरह ही नहीं है, बल्कि उसके भी अरमान एक आम लड़की की तरह होते हैं।

मंटो ने अपनी कहानियों में महिलाओं को इंसान के तौर पर स्वीकार किया। उन्होंने महिला-संबंधित सभी सामाजिक पहलुओं को हमारे सामने रखा, जिसे सदियों से समाज ने सभ्यता और इज्जत की र्इंटों में चुनवा रखा था। शायद उनकी यही हिमाकत समाज को नागवार गुजरी और उसने मंटो की कहानियों के महिला पात्रों को अश्लील करार दिया।

मंटो की इन सभी कहानियों को जब पाठक पढ़ता है, तो वह वही तिलमिलाहट महसूस करता है, जिसे लिखने से पहले और लिखते वक्त लेखक को बैचेन किया। मंटो की कहानी में अनुभव की सच्चाई के साथ-साथ जुल्म का अहसास भी है। स्त्री पात्रों का मार्मिक चित्रण पाठकों को अंदर तक हिला कर रख देता है। समाज की गंदगी और उसका घिनौना बर्ताव पाठक के सामने साकार हो उठता है, जिसे वह कभी नहीं भुला पाता। मंटो की कहानियों में स्त्री पात्र अश्लील नहीं हैं, अश्लीलता और निर्ममता तो समाज की दिखती है।

मंटो ने उस दौर के समाज पर जो व्यंग्य और कटाक्ष किया है, वह अगर आज भी चुभता है, तो जाहिर है कि वह मानसिक विकृति अब भी खत्म नहीं हुई, जिसके खिलाफ अंतिम सांस तक वे लड़ते रहे।

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