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हम आधुनिक हैं। पढ़े-लिखे हैं, किसी भी मुद्दे पर बात करने में हमें हिचक नहीं होती है ” यह बड़ा ही आम विचार है, जो मौजूदा समय में हमारे, आपके या यूं कहें कि जमाने के साथ कदम-से-कदम मिला कर चलने वाले हर शख्स के जेहन में रहता है, लेकिन जब बात हो अपनी जिंदगी की, रिश्तों की या फिर कड़वे अनुभवों की, तो अक्सर हमारी आवाज़ को खामोशी के साये ढक लेते हैं। यह बड़ी ही आम बात है; जितनी हमारे और आपके लिए, उतनी ही किसी कलाकार या लेखक के लिए भी, जिनका तो काम ही अपने जज्बातों को एक रूप देना होता है, लेकिन जब बात महिलाओं के संदर्भ में हो, तो इस खामोशी का अंधेरा और गहरा होता दिखाई पड़ता है। जिसकी वजह है-समाज में महिला-चरित्र के संकीर्ण मानक।

कहते हैं जहां बंदिशें होंगी, आजादी के नारे भी वहीं लगते हैं इसी तर्ज पर। भारतीय साहित्य में भी कई ऐसी लेखिका रहीं हैं, जिन्होंने देश-दुनिया की परवाह किए बगैर अपने जज्बातों, विचारों और अनुभवों को बेबाकी से रखा। इन्हीं में से एक लेखिका अपनी समूची जिंदगी का सार (जो इतना आसान काम नहीं) बताते हुए लिखती हैं – ‘मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी और क्या उपन्यास, मैं जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की तरह हैं। मेरी दुनिया की हकीकत ने मेरे मन के सपने से इश्क किया और उनके वर्जित मेल से यह सब रचनाएं पैदा हुर्इं। जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की किस्मत, इसकी किस्मत है और इसे सारी उम्र अपने साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगतने हैं।

मन का सपना क्या था, इसकी व्याख्या में जाने की जरूरत नहीं। यह कम्बख्त बहुत हसीन होगा, निजी जिंदगी से लेकर कुल आलम की बेहतरी तक की बातें करता होगा, तब भी हकीकत अपनी औकात को भूल कर उससे इश्क कर बैठी और उससे जो रचनाएं पैदा हुईं, हमेशा कुछ कागजों में लावारिस भटकती रहीं।’ ये शब्द है ‘अमृता प्रीतम’ के, जिसे उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में लिखा।

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जी हां, वही अमृता प्रीतम, जिन्हें पंजाबी की पहली लेखिका माना जाता है और जिनकी लोकप्रियता कभी किसी सीमा की मोहताज नहीं रही। जो कई बार अपने रिश्तों की वजह से चर्चा में भी रही।

अमृता प्रीतम का जन्म 1919 में गुजरांवाला (पंजाब) में हुआ था। बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा भी वहीं पर हुई। उन्होंने पंजाबी लेखन से शुरुआत की। किशोरावस्था से ही कविता, कहानी और निबंध लिखना शुरू किया। अमृता जी 11 साल की थीं, तभी इनकी मां का निधन हो गया। इसलिए घर की जिम्मेदारी भी इनके कंधों पर आ गई। यह उन विरले साहित्यकारों में से हैं, जिनका पहला संकलन 16 साल की आयु में प्रकाशित हुआ।

जब बालिकावधू बनीं अमृता

फिर आया 1947 का विभाजन का दौर। उन्होंने बंटवारे का दर्द सहा और इसे बहुत करीब से महसूस किया। इनकी कई कहानियों में आप इस दर्द को महसूस कर सकते हैं। विभाजन के समय इनका परिवार दिल्ली आ बसा। अब उन्होंने पंजाबी के साथ-साथ हिंदी में भी लिखना शुरू कर दिया। उनका विवाह 16 साल की उम्र में ही एक संपादक से हुआ, ये रिश्ता बचपन में ही मां-बाप ने तय कर दिया था। यह वैवाहिक जीवन भी 1960 में, तलाक के साथ टूट गया।

नारीवादी वो लेखिका

तलाक के बाद से अमृता ने वैवाहिक-जीवन के कड़वे अनुभवों को अपनी कहानियों और कविताओं के ज़रिए बयां करना शुरू किया। इससे उनकी रचनाएं धीरे-धीरे नारीवाद की ओर रुख करने लगीं। अमृता प्रीतम के लेखन में नारीवाद और मानवतावाद दो मुख्य विषय रहे है, जिसके जरिए उन्होंने समाज को यथार्थ से रू-ब-रू करवाने का सार्थक प्रयास किया।

बेबाक अमृता

हिंदी-पंजाबी लेखन में स्पष्टवादिता और विभाजन के दर्द को एक नए मुकाम पर ले जाने वाली अमृता प्रीतम ने समकालीन महिला साहित्यकारों के बीच अलग जगह बनाई। अमृता जी ने ऐसे समय में लेखनी में स्पष्टवादिता दिखाई, जब महिलाओं के लिए समाज के हर क्षेत्र में खुलापन एक तरह से वर्जित था। एक बार जब दूरदर्शन वालों ने उनके साहिर और इमरोज़ से रिश्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, दुनिया में रिश्ता एक ही होता है-तड़प का, विरह की हिचकी का, और शहनाई का, जो विरह की हिचकी में भी सुनाई देती है – यही रिश्ता साहिर से भी था, इमरोज़ से भी है……।

अमृता जी की बेबाकी ने उन्हें अन्य महिला-लेखिकाओं से अलग पहचान दिलाई। जिस जमाने में महिलाओं में बेबाकी कम थी, उस समय उन्¬होंने स्पष्टवादिता दिखाई। यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था।

अमृता की महिलाएं

पितृसत्तात्मक समाज में, परिवार के पुरुष सदस्यों पर महिलाओं की आर्थिक-निर्भरता होती है, जिसकी वजह से वे अपने वजूद को पुरुषों के तले सीमित मानती थीं। अमृता प्रीतम ने समाज की नब्ज को कुशलता से पकड़ा और अपनी रचनाओं के जरिए उस जमी-जमाई सत्ता पर सेंध मारते हुए महिलाओं के मुद्दों को सामने रखा। जिन्हें हम उनकी किताब- पिंजर, तीसरी औरत और तेरहवें सूरज जैसी रचनाओं में साफ देख सकते है।

सामाजिक वर्जनाओं के विरूद्ध

अमृता में सामाजिक वर्जनाओं के विरूद्ध जो भावना थी, वह बचपन से ही उपजने लगी थीं। जैसा वे स्वयं लिखती हैं – सबसे पहला विद्रोह मैने नानी के राज में किया था। देखा करती थी कि रसोई की एक परछत्ती पर तीन गिलास, अन्य बर्तनों से हटाए हुए, सदा एक कोने में पड़े रहते थे। ये गिलास सिर्फ तब परछत्ती से उतारे जाते थे, जब पिताजी के मुसलिम दोस्त आते थे और उन्हें चाय या लस्सी पिलानी होती थी और उसके बाद मांज-धोकर फिर वहीं रख दिए जाते थे।

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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