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‘जिसे निरंतर सदियों से बांधी गई बेड़ियों और गुलामी का एहसास होता रहा है, उसे किसी भी देश के आज़ाद होने से क्या फ़र्क पड़ सकता है?’

हमारे सभ्य समाज का इतिहास गवाह है कि किसी भी राजनीतिक सत्ता-परिवर्तन से औरत की समाज-प्रदत्त नियति कभी नहीं बदली है| तमाम सामाजिक संस्थाओं में औरत की कोई जाति नहीं, कोई देश नहीं और कोई घर भी नहीं होता है| ऐसे में जब किसी भी कीमत पर वह स्वतंत्र होकर (जो लम्बे समय तक ‘बाजारू’ होने का पर्याय माना जाता रहा है और आज भी मुख्यधारा का यही नजरिया है) कोई घर बनाती है तो मरते दम तक उसे नहीं छोड़ती है|

बेगम जान 2017

निर्माता: विशेष भट्ट

निर्देशक: श्रीजीत मुखर्जी

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सितारे– विद्या बालन, गौहर खान, पल्लवी शारदा, आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर, नसीरूद्दीन शाह

बेगम जान राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी की बांग्ला फिल्म ‘राजकहिनी‘ का हिंदी रीमेक है। आज़ादी से पहले की यह एक ऐसी कहानी है जो आज तक अनकही थी|

‘बेगम जान’ सिर्फ एक कोठे के चलने और टूटने की कहानी नहीं है, बल्कि औरत के प्रति मुख्यधारा के समाज की मानसिकता की मुकम्मल परिभाषा है| ‘बेगम जान’ देश के नीति-नियामक गोरे और काले प्रभुओं की तथाकथित सामाजिक जिम्मेदारी की क्रूरता की एक बानगी है|

किसी भी लोकतंत्र की इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि उसे आफ्स्पा और सेडीशन के भरोसे चलाया जा रहा है| जब सारे फैसले दिल्ली में ही रह के किये जायेंगे तो निश्चित तौर पर इसी तरह के हथियारों से देश चलाया जायेगा|

आज़ादी-विभाजन और सत्ता की विडंबना बयां करती बेगम जान

पूरी फिल्म में देश की आज़ादी-विभाजन की विडम्बना और सत्ता के इसी तरह के चरित्र की व्यंजना है| फिल्म शुरू होते ही 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में होने वाले सामूहिक बलात्कार और थंगजाम मनोरमा के बलात्कार के बाद कंगला फोर्ट के सामने नग्न प्रदर्शन करने वाली स्त्रियों की याद दिलाती है| देश की राजधानी में लोकतंत्र के प्रतीक बहुत ऊंचाई तक लहराते हुए तिरंगे के समानांतर औरत का नग्न होना उस पूरी व्यवस्था पर तमाचे जैसा है, जो अपनी बजबजाती हुई गंदगी पर नैतिकता, मर्यादा और इज्जत का परदा डाले रहती है|

यह पुरुषवादी समाज अपनी लार टपकाती कामुकता को संतुष्ट करने के लिए औरत के जिस्म की ऐसी परिभाषा गढ़ता आया है जिसे ‘बेगम जान’ ने खून-हड्डी-माँस में बदलकर उसका प्रत्याख्यान रचा है|

हर स्तर पर मौजूद पुरुषवाद को बेनकाब करती ‘बेगम जान’

यह फिल्म न सिर्फ एंथ्रोपोलोजिकल, लिंगुअल, सोशल, पॉलिटिकल हर स्तर पर मौजूद पुरुषवाद को बेनकाब करती है| बल्कि यह अपने इतिहास बोध को भी अपने भीतर समेटेती है| हिंदी सिनेमा में लम्बे गैप के बाद ऐसी फ़िल्में आती हैं, जिनमें साहित्य का प्रभाव भी व्यंजित होता है| यह फिल्म स्वाभाविक तौर पर हमें उस पूरे परिवेश से जोड़ देती है जहाँ से मंटो की कहानियों के चरित्र आते हैं|

बेगम जान के कोठे जलना जैसे स्त्री के अस्तित्व का ख़ाक हो जाना

बेगम जान के कोठे का जलना पद्मावत के अंत सा विषाद पैदा करता है| यह अंत सिर्फ एक कोठे का जलना भर नहीं रह जाता, बल्कि इस पूरी समाज व्यवस्था में स्त्री की किसी भी तरह की आज़ादी उसकी किसी भी तरह की निर्मिति, किसी भी तरह की रचनात्मकता का जलना है|

फिल्म में दृश्यों का संयोजन कई जगह बेहतरीन है| जैसे – बूढ़े राजा की कामलिप्सा का शिकार बनी एक बच्ची वाले दृश्य के समानांतर सीमा-रेखा पर तारों की बाड़ लगाने का पूरा दृश्य| लकड़ी काटने के लिए चलने वाली आरी हो या ठोकी जा रही कील, लगता है उस बच्ची की देह के टुकड़े हो रहे हैं और दर्शकों के दिलो-दिमाग के| वास्तव में पुरुष स्त्री-देह को सम्पूर्णता में देखता ही कब है| उसे भी तो उस देह में मांस के कुछ टुकड़े ही दिखाई देते हैं|

स्त्री के मायनों की एक तलाश ‘बेगम जान’

स्त्री को कभी-भी किसी संस्थागत रूप से अलग एक मुकम्मल स्त्री के तौर पर देखकर ही ‘बेगम जान’ से खुद को जोड़ा जा सकता है| दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना ने स्त्री के जो रूप गढ़े हैं और जिसमें स्त्री को जकड़े रहना ही उसे एक आदर्श और नैतिक समाज व्यवस्था लगती है, उसमें ‘बेगम जान’ की स्त्रियाँ अराजकता पैदा करती हुई सी दिखाई देती हैं| वास्तव में वो अपने स्त्री होने के मायने की तलाश रही हैं और दुर्भाग्यवश सदियों से हमारी पूरी व्यवस्था स्त्री के इन्हीं मायनों से घबराता और मुंह चुराता रहा है|

आलोक धन्वा के शब्दों में कहें तो

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में |

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Deepshikha lives in Aligarh and has completed her PhD in Hindi from Jawaharlal Nehru University, New Delhi. Currently, she is working as Assistant Professor at Department of Hindi, Aligarh Muslim University.

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