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एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका में महिलाओं को अपने रंग और सेक्स के चलते दोहरे हाशिए में सिमटने की मार झेलनी पड़ती है| काले नारीवाद का उदय मुख्य रूप से सफेद नारीवाद के लिए चुनौती के रूप में उभरा है, जो या तो रंगभेद से पीड़ित महिलाओं की आवाज को हाशिए में डाल देता है या इसे अपने बड़े भाषण में कम कर देता है। आज अपने इस लेख के माध्यम से मैं कुछ ऐसी महिला-लेखिकाओं को आपसे परिचित करवाने जा रही हूँ, जिनके लेखों ने औपनिवेशिक विषयों और रंगभेद के रूप में हमारे लिए नारीवाद की अवधारणा को स्थापित किया है। हालांकि मुझे मालूम है कि नारीवाद के विस्तार को समेटने के लिए ये फ़ेहरिस्त काफी नहीं है, लेकिन फिर भी आपके साथ उन चुनिन्दा लेखिकाओं के बारे में साझा कर रही हूँ, जिन्होनें नारीवाद को समझने में नई दिशा दी है|

1. टॉनी मोरिसन

फ़ोटो साभार : Linternaute

नोबेल पुरस्कार विजेता मोरिसन एक अमेरिकी उपन्यासकार है| अफ़्रीकी-अमेरिकी समुदाय में जन्मी मोरिसन ने अपनी रचनाओं में उन अनुभवों को साझा किया, जिन्हें उन्होंने अमेरिका के माहौल में रंगभेद का शिकार होते महसूस किया था| मोरिसन ‘ब्लैक लिटरेचर’ को उजागर करने वाली लेखिकाओं में से एक प्रमुख है| उनके उपन्यास प्रयोगात्मक कथा शैलियों और मजबूत महिला पात्रों के ज़रिए उन्होंने पितृसत्तात्मक और जातिवादी समाज के देशकाल में अपने पात्रों को मज़बूती के साथ खड़े होता दिखाया है| मोरिसन की लिखी गयी ‘बीलव्ड’ एक ऐसी दास कथा है, जो सुंदर और डरावनी दोनों है, जो बेहद सजग लेखन के माध्यम से उभारे गये है|  वहीं सांग्स ऑफ़ सोलोमन एक ऐसी कथा है जिसका नायक एक पुरुष है| ये एक रैखिक कथा है और उलझे हुए रिश्तों की कहानी अपने परिवार और शरीफ बनने वाले इस समाज के साथ साझा करता है|

2. ऑड्रे लॉर्डे

फ़ोटो साभार : Kinna Reads

वह अपने आपको ‘काली, लेस्बियन, माँ,  योद्धा और कवि’ कहती हैं| साहित्यिक लेखन के क्षेत्र में लॉर्डे का शानदार करियर ‘सेक्सिस्म, नस्लवाद और होमोफोबिया’ के खिलाफ उनकी सशक्त लड़ाई को साझा करता है| अपनी रचनाओं में वे महिला-शरीर को सशक्त रूप देती है और उनके प्रशंसक उनके इसी अंदाज़ को बेहद पसंद करते है। निबन्धों और भाषणों के संकलन ‘सिस्टर आउटसाइडर’ और काव्य संकलन ‘द ब्लैक यूनीकॉर्न’ में भी उन्होंने रंग और सेक्स के बाइनरी सिस्टम को चुनौती दी है| ‘ज़मी’ उनकी बेहतरीन आत्मकथा है, जो एक ऐसी अंधी लड़की की कहानी है जिसका लालन-पालन हरलम में हुआ है| इसमें लेखिका ने एकांत, लेस्बियन होने के एहसास और विकलांगता को बेहद संवेदनशीलता से दर्शाया है|

3. नवल ई साद्वाई

फ़ोटो साभार : Alchetron

साद्वाई को अरबी दुनिया की सिमोन द बोउवार की उपाधि दी जाती है| मिस्र की रहने वाली साद्वाई एक नारीवादी लेखिका है| अपने लेखन के माध्यम से वह मध्य-पूर्व के धर्म के मूल्यों पर तार्किक कुठाराघात करती है, जो मौजूदा समय में आधुनिक साम्राज्यवाद से जुड़ा है और जिनकी जड़ें सिर्फ दमनकारी है| उन्होंने महिलाओं के साथ होने वाली ‘खतना’ जैसी कुप्रथा के खिलाफ भी अपनी आवाज बुलंद की है| उनके लिखे उपन्यास ‘द फाल ऑफ़ द इस्लाम’ का अनुवाद उनके पति शरीफ हेताता ने किया, जिसमें उन्होंने इमाम के उन पहलुओं को समाने रखा है जहाँ महिलाओं के साथ क्रूर व्यवहार होता है|

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4. फ्लोरा नवाप्पा

फ़ोटो साभार : ZODML

अफ्रीका को कई सफल महिला लेखकों के लिए एक साहित्यिक अग्रदूत माना जाता है,नप्पा भी उन्हीं में से एक प्रमुख नाम है| उन्होंने लघु कथाओं को उपन्यास के रूप में चुना। नवप्पा की कहानियाँ दुविधा के घिरी महिला नायकों की मजबूत भावना को पकड़ती हैं। वे अपने समुदाय के बाहर शादी करके या अपने वित्तीय कौशल के माध्यम से शादी को तथाकथित उच्च वर्ग का जामा पहनाने की परंपरा का पूर्ण रूप से खंडन करती है| इसके अलावा, उनकी कहानियां कुछ भूमिकाओं को एकदम अलग हटकर दर्शाती हैं, जैसे- उनकी कहानियों में पुरुष वेश्याएं हैं और उनके ग्राहक भी पुरुष है| वहीं दूसरी तरफ, महिलाएं शारीरिक संबंधों और पैसों की कमान अपने पास रखती हैं|

 5. चिमामंद आदिची

फ़ोटो साभार : MacArthur Foundation

नाईजीरिया की युवा लेखिका आदिची ने टेडएक्स ‘वी शूड आल बी फेमिनिस्टस’ से हम सभी को प्रेरित किया| आदिची की लिखी किताब द थिंग अराउंड योर नेक  12 कहानियों का संग्रह है जो पुरुषों और महिलाओं, माता-पिता और बच्चों, अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंधों का पता लगाती है। वहीं दूसरी तरफ, उपन्यास, हाफ ऑफ ए येलो सन ( जिसका नाम बिआफ्रा के अल्पसंख्यक राष्ट्र के ध्वज के नाम पर रखा गया है) नाइजीरियाई गृह युद्ध के  पहले और उसके दौरान तैयार किया गया है। इसमें उन्होंने युद्द के दौरान होने वाली सामाजिक और  राजनैतिक उथल-पुथल को बखूबी दर्शाया है|

6. महादेवी वर्मा

फ़ोटो साभार : नवभारत

महादेवी वर्मा हिंदी छायावाद के चार स्तंभों में से एक मानी जाती हैं| इनके अतिरिक्त वे तीन स्तंभ हैं – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’. सुमित्रानंदन पंत और जयशंकर प्रसाद| महादेवी एक प्रभावशाली सक्रिय महिला कार्यकर्ती थीं| पर विरोधी नारी अधिकारवादी नहीं थी| उन्होंने अपनी रचना ‘श्रृंखला की कड़ियों’ में भारतीय नारी की दयनीय दशा, उनके कारणों और उनके सहज नूतन सम्पन्न उपायों के लिए अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए हैं| इतना ही नहीं, उन्होंने उन विचारों पर स्वयं जी कर भी दिखाया है| महादेवी वर्मा को ‘आधुनिक मीरा’ भी कहा जाता है| उन्हें हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘साहित्य अकादमी फैलोशिप’ 1976 में प्रदान किया गया| साल 1982 में उन्हें ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्रदान किया गया| महादेवी एक जानी-मानी चित्रकार भी थीं| उन्होंने अपनी कृति ‘दीप शिखा’ के लिए बहुत से वर्णन चित्रित किए|

7. उर्वशी बुटालिया

फ़ोटो साभार : Aljazeera

नारीवादी लेखिका और प्रकाशक उर्वशी बुटालिया भारतीय पाठकों के लिए कोई अजनबी नहीं है। उनका सबसे मशहूर काम ‘द साइड ऑफ साइलेंस’ विभाजन के दौरान महिलाओं और बचे हुए लोगों की अनदेखी कहानियों को उजागर करता है, जिन्हें पलायन के दौरान दोहरी मार का सामना करना पड़ता है| निर्भया कांड के बाद 2013 में इन्होंने महिला हिंसा और सुरक्षा को लेकर विभिन्न मंचों से सख्त तेवर दिखाए। सरकारी नीतियों की आलोचना की और महिलाओं के लिए नए क्राइसिस सेंटर समेत हेल्पलाइनों की स्थापना पर खास जोर दिया।

8. महाश्वेता देवी

फ़ोटो साभार : समाचार जगत

महाश्वेता देवी भारत के उन कुछ लेखकों में हैं जिन्हें एक्टिविस्ट भी कहा जा सकता है| जिनके सामने एक बेहतर समाज-निर्माण का लक्ष्य होता है| जो दमन के सभी हथियारों के खिलाफ अपने लेखन को आगे बढ़ाते रहते हैं| यही कारण है कि तथाकथित राष्ट्रवादी ऐसे संघर्षशील लेखकों को राष्ट्रद्रोही सिद्ध करने में ही अपनी सारी राष्ट्रवादिता दिखाते हैं| महाश्वेता की कहानी ‘द्रौपदी’ को लेकर भी इसी तरह का आरोप लगाया गया| वास्तव में यह तथाकथित राष्ट्रवादियों की तरफ से एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी जो सिर्फ एक लेखिका पर नहीं बल्कि पश्चिम-बंगाल, झारखंड और उड़ीसा की एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता के प्रति थी| यह प्रतिक्रिया उस बुद्धिजीवी के प्रति थी जिसका देश सिर्फ हिन्दू राष्ट्रवाद की परिकल्पना में नहीं अंटता है|

9. ताराबाई शिंदे

फ़ोटो साभार : ताराबाई

ताराबाई शिंदे की रचना ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ में स्त्रियों की गुलाम मानसिकता से मुक्ति दिलाने की प्रेरणा प्रदान करती है| ज़ोरदार सामाजिक क्रांति का संदेश इसमें है| नारीवादी सोच का यह पहला विस्फोट है| स्त्री-पुरुष समानता पर बल देते हुए ताराबाई ने अपने लेखन के ज़रिए यह चेतावनी दी कि स्त्री को आप दरकिनार नहीं रख सकते| उन्होंने लिंग भेद के आधार पर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में फ़र्क करने और दोहरे मापदंड बरतने के खिलाफ़ आवाज़ उठाई| वह बार-बार पूछती हैं कि ‘पुरुष अपने आप को स्त्रियों से इतना भिन्न क्यों समझता है? स्त्री की तुलना में वह खुद को इतना महान और बुद्धिमान क्यों मानता हैं? अगर वे इतने ही महान और हीरो थे तो अंग्रेजों के गुलाम कैसे बन गए? उनके बीच ऐसी क्या भिन्नता है कि पत्नी के मरने से पति पर कोई आफत नहीं आती वह जब चाहें दूसरा विवाह कर ले, पर पति के मरने से विधवा स्त्री को ऐसे-ऐसे दुःख दिए जाते हैं मानो उसी ने अपने पति को मारा हो? ये दोहरे मापदंड क्यों जबकि स्त्री-पुरुष की यौन इच्छाओं में कोई भेद नहीं| ऐसी विधवा होने से अच्छा तो सती होना है|’

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