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एक पितृसत्तात्मक समाज में नारीवाद की अवधारणा को सरोकार से जोड़ना कितना मुश्किल है इसबात का अंदाजा आप सोशल मीडिया से लेकर अपने घर-समाज में इसके सिद्धांतों की बात करने से लगा सकते है| समाज के किसी भी तबके से जुड़े किसी मुद्दे पर अगर आप नारीवाद दृष्टिकोण से अपने विचार रखते हैं तो सामने से आपको तुरंत प्रतिक्रिया में ये सुनने को मिल जायेगा कि ‘ज्यादा नारीवादी बनने की ज़रूरत नहीं है|’ या फिर कई बार जब आप समानता की बात करते हैं तो आपके कुछ मित्र ये कह देते हैं कि समानता पर मैं विश्वास करता हूँ लेकिन मैं ‘नारीवादी’ नहीं बल्कि ‘मानववादी (मानवता पर विश्वास करने वाला) हूँ|

नारीवाद पर विश्वास करने वालों को अक्सर इस बहस का सामना करना पड़ता है कि जब ‘नारीवाद’ का मूलभाव समानता है तो इसे ‘मानवतावाद’ या फिर ‘समतावाद’ क्यों नहीं कहा जाता है| जबकि मानवतावाद की ही तरह नारीवाद भी न केवल महिलाओं बल्कि समाज के हाशिये पर बसने वाले हर तबके की बात करता है| आज मैं अपने इस लेख इसी बात की चर्चा करूँगीं कि आखिर नारीवाद को ‘नारीवाद’ ही क्यों कहा जाता है? मानवतावाद क्यों नहीं?

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अपनी चर्चा की शुरुआत मैं एक सरल उदाहरण से करती हूँ| अगर आप गूगल पर ‘नारी’ शब्द को सर्च करेंगें तो विकिपीडिया में आपको इसकी परिभाषा की पहली लाइन मिलेगी कि – ‘नारी मानव की स्त्री को कहते हैं, जो नर का स्त्रीलिंग है।‘ गौरतलब है कि हम अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं उसमें भी ‘महिला’ शब्द का मतलब संज्ञा की बजाय विशेषण से है| इसतरह पुरुष-वर्चस्व वाली भाषा महिला शब्द को बेहद सीमित दायरे में सिकोड़ने का काम करती है|

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‘नारीवाद’ समतावाद क्यों नहीं?

समतावाद एक विवादित अवधारणा है। समतावाद का सिद्धांत सभी मनुष्यों के समान मूल्य और नैतिक स्थिति की संकल्पना पर बल देता है। समतावाद का दर्शन ऐसी व्यवस्था का समर्थन करता है जिसमें सम्पन्न और समर्थ व्यक्तियों के साथ-साथ निर्बल, निर्धन और वंचित व्यक्तियों को भी आत्मविकास के लिए उपयुक्त अवसर और अनुकूल परिस्थितियाँ मिल सकें। समतावाद समाज के सब सदस्यों को एक ही शृंखला की कड़ियाँ मानता है जिसमें मज़बूत कड़ियाँ कमज़ोर कड़ियों की हालात से अप्रभावित नहीं रह सकतीं। समतावाद स्वतंत्रता और समानता में सामंजस्य स्थापित करना चाहता है। इसे एक विवादित संकल्पना इसलिए कहा गया है कि समानता के कई स्वरूप हो सकते हैं और लोगों के साथ समान व्यवहार करने के भी अनेक तरीके हो सकते हैं।

समतावाद पहली बार फ़्रांसिसी सरकार के नारे में ‘स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे’ के संदर्भ में सामने आया| अगस्त 1789 में फ़्रांस में ‘डिक्लेरेशन ऑफ़ द राइट्स ऑफ़ मैन एंड ऑफ़ द सिटीजन’ यानी कि फ़्रांसिसी कानून की रूपरेखा तैयार की गयी जिसमें केवल पुरुषों के समान अधिकार की बात कही गयी न की महिला-अधिकारों की| इतना ही नहीं, दौ सौ साल से भी अधिक समय पहले इस कानून की गरिमा आज भी फ़्रांसिसी कानून में ज्यादा ऊंची है|

नारीवाद पर विश्वास करने वालों को अक्सर इस बहस का सामना करना पड़ता है कि जब ‘नारीवाद’ का मूलभाव समानता है तो इसे ‘मानवतावाद’ या फिर ‘समतावाद’ क्यों नहीं कहा जाता है|

इसी तरीके से हम जुलाई, 1776 में यूनाइटेड स्टेटस डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडिपेंडेंस में देख सकते हैं कि प्राकृतिक अधिकारों के तहत पुरुषों के लिए समानता का दावा, लेकिन महिलाओं के नहीं। इसतरह अलग-अलग देशों में वैधानिक तौर पर ‘समतावाद’ को सिर्फ पुरुषों तक सीमित कर दिया गया- जिसका लुफ्त सिर्फ और सिर्फ पुरुष उठाते हैं| ये ‘समानता’ के नामपर सिर्फ पुरुषों तक इसकी पहुंच को स्वीकार कर इसमें महिलाओं की भागीदारी को पूरी तरह नकार देता है| वहीं नारीवाद, न केवल सभी लिंगों के बीच समानता की बात करता है बल्कि ये उन महिलाओं को भी स्वीकारने की बात करता है, जिन्हें समतावाद जैसे सिद्धांतों में एक सिरे से खारिज किया जा चुका है|

‘नारीवाद’ मानवतावाद क्यों नहीं? 

मानवता एक परिप्रेक्ष्य है जो मानव स्वतंत्रता और प्रगति की कुछ धारणा को प्रमाणित करता है। इसे किसी के साथी इंसानों और / या मानवीय शिक्षा से पारित मूल्यों के प्रति उदारता के रूप में देखा जा सकता है। यह मानव मूल्यों और चिंताओं पर ध्यान केंद्रित करने वाला अध्ययन, दर्शन या अभ्यास का एक दृष्टिकोण है।

मानवताद इसबात पर विश्वास करता है कि इंसानी दिमाग बेहद अद्भुत है इसलिये और लोगों को धर्म, अलौकिक मान्यताओं या अपने जीवन को संचालित करने के लिए एक अदृश्य इकाई पर भरोसा नहीं करना चाहिए। महिलाओं के बराबर अधिकारों के लिए लड़ने के साथ मानवतावाद का कोई लेना-देना नहीं है। जबतक कि पुरुष एक “साथी इंसान” के रूप में महिला को सही तरीके से स्वीकार नहीं कर लेते हैं, तब तक पुरुष “अपने साथी इंसानों के प्रति उदारता” को इंगित नहीं करना चाहते हैं|

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इसतरह मानवतावाद एक विचारधारा के रूप में अभिनव और प्रगतिशील आदर्शों का जश्न मनाता है जो तर्क, नैतिकता और सामाजिक-आर्थिक न्याय से मेल खाते हैं – निर्णय लेने के लिए धर्म, धार्मिक मतभेद और अलौकिक को प्रतिस्थापित करने के लिए विज्ञान पर बुलाते हैं। इसलिए, मानवताद सभी मानवीय समानता और अधिकारों के लिए खड़े होने से पूरी तरह से अलग है – विशेष रूप से महिला समानता के अधिकार। यही कारण है कि इसे नारीवाद कहा जाता है, न कि मानवतावाद।

क्यों यह नारीवाद है?

क्या आप वास्तव में, बिना किसी अपराध के पूरी दुनिया में सदियों से मौजूदा लिंग असमानताओं को अनदेखा कर सकते हैं – महिलाओं के प्रति बेवजह और ख़ासरूप से निर्देशित हो? एक समान समाज में रहना ज़रूरी है, लेकिन उस समान समाज में – अज्ञात और अस्तित्वहीन महिला होगी – अगर वह बात नहीं करती है। एक ऐसे आंदोलन के बिना जो पूरी तरह से मंच के समान मंच पर महिलाओं की स्थिति को लाने पर ध्यान केंद्रित करता है, उसके लिए कभी भी समानता नहीं होगी।

नारीवाद सिर्फ सभी लिंगों के बीच समानता की तलाश नहीं कर रहा है बल्कि ये उन महिलाओं को वापस देने का प्रयास करता है जिन्हें अलग-अलग देशों की वैधानिक व्यवस्था ने अस्वीकार कर दिया हैं।

गौरतलब है कि नारीवाद सिर्फ सभी लिंगों के बीच समानता की तलाश नहीं कर रहा है बल्कि ये उन महिलाओं को वापस देने का प्रयास करता है जिन्हें अलग-अलग देशों की वैधानिक व्यवस्था ने अस्वीकार कर दिया हैं। मूलरूप से नारीवाद समाज में महिलाओं की स्थिति को आगे बढ़ाने पर केंद्रित था, जिससे इसे महिला मुद्दों पर केंद्र में रखा गया। इस तरह अलग-अलग घटनाओं के बाद “फेमिनिज्म” शब्द 1 9 00 के शुरुआती दौर के मताधिकार आंदोलन से लिया गया था, जब ऐतिहासिक रूप से महिलाएं (ब्रिटिश भारत समेत दुनियाभर में) वोट देने के अपने अधिकार के लिए प्रचार कर रही थीं।

जी हां, आज हम मानते हैं कि दमन और आदर्शों के मामले में एक आकार फिट नहीं है और ऐसे लोग हैं जो नस्लीय मुद्दों, जाति, यौन अभिविन्यास, भेदभाव, विकलांगता से लेकर उत्पीड़न की विभिन्न डिग्री से पीड़ित हैं दूसरी बातों के अलावा। ऐसे में जो लोग नारीवाद की बजाए समतावादी, मानववादी और अन्य शर्तों को कहलाने की बात करते हैं  वे वास्तविकता को देख रहे हैं कि हम, महिलाएं वास्तव में बराबर नहीं हैं। लेकिन वे महिला- अधिकार, समानता और नेतृत्व की बात कभी नहीं करते हैं| वहीं दूसरी तरफ, नारीवाद की अवधारणा के तहत महिलाओं की लड़ाई पर सवाल खड़े करे उनके दमन की कोई कसर नहीं छोड़ते हैं|

Read in English: Why Call It Feminism, As Opposed To Humanism Or Egalitarianism?


इस लेख का मूल रूप अंग्रेजी में देबोलीना ने लिखा है|

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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