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तथाकथित विकास और सशक्तिकरण के दौर में ‘अब पहले जैसा नहीं रहा’ वाला जुमला हर समस्याओं के संदर्भ में बेहद आसानी से इस्तेमाल किया जाता है| फिर बात चाहे भ्रष्टाचार की हो या समाज में महिला-स्थिति की| हम बेहद आसानी से कहते है कि महिलाओं को अब तो समाज में बराबरी का दर्जा मिला हुआ है| वे किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं है| लेकिन इसबात में कितनी सच्चाई है इसका अंदाज़ा हम किसी रिपोर्ट या शोध की बजाय अपने घर में संपत्ति से लेकर शादी-ब्याह के मामले में महिलाओं के निर्णय और उनकी वरीयता से लगा सकते है|

बेशक आज नौकरीपेशा महिलाओं के आंकड़ों में बढ़त हुई है, लेकिन इस बढ़त के साथ-साथ उनके खिलाफ होने वाली हिंसा का स्तर भी लगातार बढ़ रहा है और ये हमारे महिला सशक्तिकरण के मानकों को भी सवालों के कठघरे में खड़ा करता है| जब हम अपने भारत देश जैसे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाली किसी भी हिंसा के संदर्भ में बात करते हैं तो हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि ‘एक पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के खिलाफ राजनीति उनके शरीर से शुरू होती है|’ इसी राजनीति का नतीजा होता है – महिलाओं के अस्तित्व को तन के भूगोल में समेटकर देखना|

महिलाओं के लिए सुरक्षित भविष्य के लिए मौजूदा समय में ऐसी शुरुआत बेहद ज़रूरी है|

महिला शरीर में सीमित समाज की संकीर्ण सोच आज महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने पर एक चुनौती के रूप में सामने आती है और कई बार इसका रूप बेहद वीभत्स होता है| पर वो कहते है न कि बदलाव प्रकृति का नियम है| इसी तर्ज पर, महिलाओं के खिलाफ होने वाली लैंगिक हिंसा के विरोध में महिलाओं ने अपनी आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है और इसबार शुरुआत मीडिया जगत की महिलाओं की तरफ से की गयी है|

हाल ही में, पत्रकारिता से जुड़ी बहुत सी महिलाओं ने अपने साथ कार्यक्षेत्र में हुए यौन दुर्व्यवहार के बारे में #MeToo अभियान के तहत सोशल मीडिया में खुलकर लिखना शुरू किया है| जाहिर है इस शुरुआत ने समाज का आईना कहे जाने वाले मीडिया जगत के साथ-साथ पूरे समाज में खलबली मचा दी है| क्योंकि जिन महिलाओं ने ये आगाज़ किया है वे खुद भी किसी न किसी जानेमाने मीडिया संस्थान से जुड़ी रही हैं या अभी भी उनका हिस्सा है और जिन पुरुषों पर उन्होंने आरोप लगाया है वे खुद भी मीडिया जगत के जानेमाने चेहरे हैं| दिन-प्रतिदिन एक बड़े आन्दोलन का रूप लेते इस अभियान को भारत में #MeToo की शुरुआत माना जा रहा है|

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क्या है #MeToo ?

बीते साल सोशल मीडिया में #MeToo के साथ एक नये अभियान की शुरुआत की गयी थी| इस अभियान के ज़रिए दुनियाभर की महिलाएं अपने साथ हुई यौन-उत्पीड़न की आपबीती सोशल मीडिया में साझा कर रही थी| इस आंदोलन की शुरुआत हॉलीवुड अभिनेत्री एलीसा मिलाने ने ट्विटर पर की|  उन्होंने हॉलीवुड फिल्म निर्माता हार्वे वीनस्टीन पर अपने यौन-शोषण का आरोप लगाया और उन्होंने एक ट्वीट के जरिए लोगों को मी टू के साथ अपने बुरे अनुभव साझा करने के लिए कहा। साथ में उन्होंने लिखा कि ‘अगर आपका भी यौन-शोषण हुआ है या आप पर यौन हमला हुआ है, तो जवाब में “हैशटैग मी टू” लिखें।’बेहद कम समय में इस अभियान को दुनियाभर में इस कदर समर्थन मिला कि करोड़ों की संख्या में महिलाओं ने सोशल मीडिया में इस हैशटैग के साथ अपनी साथ हुई यौन-उत्पीड़न की घटना के बारे में साझा करना शुरू कर दिया|

#MeToo से भारतीय महिलाएं तोड़ रही हैं यौन-उत्पीड़न पर अपनी चुप्पी

यों तो जब इस अभियान की शुरुआत हॉलीवुड से हुई तो बॉलीवुड से जुड़े कई कलाकारों और भारतीय महिलाओं ने इसमें हिस्सा लिया| लेकिन ये अभियान उस तह तक नहीं जा सका| इसके करीब एक साल बाद जब कुछ दिन पहले बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने बॉलीवुड अभिनेता नाना पाटेकर पर फिल्म की शूटिंग के दौरान यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए| तनुश्री के इसी अनुभव एकबार फिर भारत में #MeToo को नये रूप में हवा दी| इसके बाद कई अन्य महिलाओं ने भी सिलसिलेवार तरीके से अपने साथ हुई यौन शोषण की घटनाओं का ज़िक्र करना शुरू कर दिया|

एक पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के खिलाफ राजनीति उनके शरीर से शुरू होती है|

अब एक के बाद एक महिलाएं अपने साथ कार्यस्थल में हुए यौन दुर्व्यवहार पर मुखर होकर सामने आ रही हैं| वे सोशल मीडिया के ज़रिए न केवल अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार का जिक्र कर रही हैं बल्कि बेबाकी से आरोपित पुरुषों के नाम भी उजागर कर रही हैं| मीडिया से जुड़ी बहुत सी महिलाओं ने इस मामले पर ट्वीट किए हैं और अपने साथ यौन दुर्व्यवहार करने वाले पुरुषों की चैट के स्क्रीनशॉट्स भी सोशल मीडिया पर शेयर किए हैं| मीडिया जगत में इस पूरे सिलसिले की शुरुआत कॉमेडियन उत्सव चक्रवर्ती पर एक महिला के द्वारा लगाए गए आरोपों से हुई| इस महिला ने ट्वीट कर उत्सव पर आरोप लगाए कि उत्सव ने उन्हें अपनी न्यूड तस्वीरें भेजने की बात कही थी| साथ ही अपने जननांग की तस्वीर भी उन्हें भेजने को कहा था|

कोई भी नज़ारा अच्छा है या बुरा ये सीधेतौर पर हमारे देखने के नजरिए पर निर्भर करता है| इस अभियान पर यह बात एकदम सटीक लगती है| वैसे तो इस अभियान का कुछ लोग समर्थन कर रहे हैं तो कुछ विरोध| कुछ ने कहा कि ये सिर्फ ‘पब्लिसिटी’ पाने का तरीका है| अगर हम मान भी लें कि ये सब पब्लिसिटी पाने के लिए किया गया है तो क्या इस अभियान का हिस्सा बनने वाली हर महिला पब्लिसिटी के लिए अपनी आपबीती साझा कर रही है…? ऐसा सोचना भी गलत है| क्योंकि इसबात को हम आप अच्छी तरह से जानते है कि हमारे समाज में जब कभी भी महिला अपने विचार अभियक्त करती है तब उसे आलोचना और विरोध का शिकार होना पड़ता है और ऐसे में अगर महिला अपने साथ हुई यौन-उत्पीड़न की घटना के बारे में अपने अनुभव साझा कर रही है तो ऐसे में विरोध होना लाज़मी है| ‘क्योंकि हमारे यहाँ तो इसे घर की इज्जत बाज़ार में उछालना कहा जाता है न…?’

अब विरोध हो या समर्थन लेकिन इस अभियान के ज़रिए ये बात साफ़ हो गयी है कि हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाली यौन-हिंसा एक गंभीर समस्या है, जिससे हर दूसरी महिला जूझ रही है और जिसके लिए ज़रूरी है कि ‘महिला अपनी बात सोशल मीडिया में साझा करके इज्जत उछाल रही है’ इस नजरिए को बदलकर ‘इज्जत उछालने का किस्सा दुबारा न कहा जाये कुछ ऐसा काम किया जाये’ वाला होना चाहिए| महिलाओं के लिए सुरक्षित भविष्य के लिए मौजूदा समय में ऐसी शुरुआत बेहद ज़रूरी है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिए और ये कोशिश करनी चाहिए कि इन आरोपों की सही जांच हो और दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा सुनिश्चित हो|

और पढ़ें : #MeToo: यौन-उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की आपबीती 


तस्वीर साभार : thequint 

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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1 COMMENT

  1. महिलाओं के अस्तित्व को तन के भूगोल में समेटकर देखना , this line is core of most of women’s issues. Well done!

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