मानवाधिकार का ज़रूरी विषय है विकलांगता

0
258
मानवाधिकार का ज़रूरी विषय है विकलांगता
मानवाधिकार का ज़रूरी विषय है विकलांगता

डॉ सत्येन्द्र सिंह 

साल 1886 का हिन्दुस्तान के इतिहास में विशेष महत्व है। क्योंकि इसी साल में आनन्दी बाई जोशी और कादंबिनी गांगुली पहली भारतीय महिला बनी  जिन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई की। 

डॉआनन्दी बाई ने वुमन मेडिकल कॉलेज ऑफ पेंसिल्वेनिया से और डॉ कादंबिनी गांगुली ने  कलकत्ता  मेडिकल कॉलेज से स्नातक की उपाधि ली थी| अमेरिकी नारीवादी लेखक और सुधारक कैरोलिन हेलीडेल के अनुसार आनन्दी बाई 18 साल की उम्र में न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुई और वह पहली अपरिवर्तित उच्च जाति की हिन्दू महिला थी। इतिहास में इनदोनों महिलाओं का नाम दर्ज है| उल्लेखनीय है कि सर जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबलाबोस ने आनन्दी बाई और कादंबिनी से पहले चिकित्सा शिक्षा में आवेदन की कोशिश की थी,लेकिन उनका दाखिला इसलिए नहीं हुआ क्योंकि वह एक महिला थी और उस समय  महिलाओं के लिए शिक्षित होना मुश्किल था| ऐसे में चिकित्सा क्षेत्र में काम करना तो नामुमकिन था।

माहौल बदला साल 1948 में जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकारों  की सार्वभौम घोषणा को  स्वीकृत और घोषित किया। इसके अनुच्छेद 1 में यह कहा गया कि सभी पुरुषोंको गौरव और अधिकारो के मामले में जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त है। इसके बाद,  भारत की हंसा मेहता ने इस घोषणा में महिलाओं के अधिकारों को शामिल करने के लिए लड़ाई लड़ी औरअनुच्छेद 1 में सुधारकर यह लिखा गया कि सभी मनुष्यों (अकेले पुरुष नहीं) को गौरव और अधिकारों के मामले में जन्मजात स्वतंत्रता और समानता मिली है।

विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर सम्मेलन

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा एक संधि नहीं है| इसलिए यह सीधेतौर पर देशों के लिए कानूनी  दायित्व नहीं बनाती है। हालांकि यह मौलिक मूल्यों की अभिव्यक्ति है जो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सभी सदस्यों द्वारा साझा की जाती हैं।घटनाक्रम बदले और साल 2007 में जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर सम्मेलन (सीआरपीडी) को किसी भी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में इतिहास में हस्ताक्षरकर्ताओं की रिकॉर्ड संख्या के साथ पहली मानव अधिकार संधिके रूप में अनुमोदित किया। सीआरपीडी वैश्विक स्तर पर विकलांग व्यक्तियों की दुर्दशा को संबोधित करने के लिए नौ अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधिओं में से एक है और यह अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर कानूनी रूप से बाध्यकारी उपकरण भी है। यही कारण था कि यूएनसीआरपीडी कोकेंद्र में रखकर भारत ने विकलांगता अधिकार अधिनियम 2016 और मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 बनायें गये।

हम वादा करते हैं कि हम अपनी आवाज़ उठाएँगे, हम कार्रवाई करेंगे, चाहे मेरे अधिकारो का हनन हो या आपके।

मानवाधिकार का ज़रूरी विषय है विकलांगता

विकलांगता एक मानवाधिकार विषय है। यही कारण है की यूएनसीआरपीडी विकलांगता के सामाजिक मॉडल (अक्षमता भौतिक बाधाएंऔर नकारात्मक दृष्टिकोण की देन होती हैं) की बात करता है ना की मेडिकल मॉडल की(अक्षमता व्यक्ति में निहित हैं)। यह प्रत्येक व्यक्ति को अतुल्य मानता है और किसी को भी महत्वहीन नहीं मानता।यह एकाधिक भेदभाव और पहचान की परतों को भी स्वीकारता है चाहे वह नारीवाद या विकलांगता संस्कृति की अभिव्यक्ति हो। पहली बार एक पूरा अनुछेद विकलांग महिलाओं और लड़कियों और उनके साथ बार-बार होने वाले  भेदभाव को मानवाधिकार अंतरंगता खंड के लिए बाध्यकारी मानता है|

अनुच्छेद 6 – विकलांग महिलाओं

1.  राज्य दल यह मानते हैं कि विकलांग महिलाएं और लड़कियां   कई भेदभाव के अधीन हैं और इस संबंध में सभी मानवाधिकारों और  मौलिक स्वतंत्रताओं के पूर्णऔर समान आनंद सुनिश्चित करने के लिए उपाय करेंगे।

2.  राज्य दलों को मौजूदा अधिकारों में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता के अभ्यास और आनंद की गारंटी देने के उद्देश्य से महिलाओं के पूर्ण विकास, उन्नति और सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने के लिए सभी उचित उपाय किए जाएंगे।

और पढ़ें : मानव अधिकारों के रूप में ‘यौन अधिकार’

विकलांगता अधिकार अधिनियम का पहला प्रभाव  

साल 2016 के नये विकलांगता क़ानून में समावेश हुआ,जिसके तहत अदृश्या विकलांगताओं जैसे – हीमोफिलिया, थैलेसेमिया और सिकल सेल डिसीज़ को शामिल किया गया| साथ ही उच्च शिक्षा में 5फीसद आरक्षण का भी प्रावधान किया गया। इस क़ानून के क्रियान्वित होने के बाद भी सुरुचि राठौर, (जिन्हें थैलेसेमिया की बेंचमार्क विकलांगता है|) को सर्वोच्च न्यायालय में अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़नी पड़ी और जिसके बादउन्हें एमबीबीएस कोर्स में भर्ती करने के आदेश दिए गये। यह पहला वास्तविक प्रभावथा विकलांगता अधिकार अधिनियम का।

अल्प दृष्टि और बधिरता (श्रवणबाधित एवं उँचा सुनने वाले) साल 1995 के विकलांगता क़ानून से एक निर्दिष्ट विकलांगता है| लेकिन आज तक किसी भीबधिर या अल्प दृष्टि व्यक्ति को विकलांगता श्रेणी में चिकित्सीय शिक्षा का अधिकार नहीं दिया गया। एक बार फिर अधिकारों के लिए विकलांगो को उच्च और उच्चतम न्यायालयोंमें लड़ाई लड़नी पड़ी, जो लड़ाई अबला बोस ने दो शताब्दी पहले महिलाओं के चिकित्साक्षेत्र में आने के लिए शुरू की उसी लड़ाई को टीना शर्मा ने अंजाम दिया, जब वो पहली बधिर छात्रा बनी जिन्हें विकलांगता श्रेणी में एमबीबीएस कोर्स में दाखिला मिला। आज टेक्नालजी से सब कुछ संभव है और वास्तविक समय कैप्शनिंग, स्मार्ट फोन/ टैबलेट, रिमोट दुभाषिया के माध्यम से वीडियो रिले सेवाओं और डिजिटल स्टेथोस्कोप से बधिर व्यक्तिभी आसानी से चिकित्सक बन सकते हैं। दो अधिनियम (1995 और 2016)होने के बाद भी 23 साल का सफ़र लगा अधिकारों की पूर्ति होने में।

क़ानून सिर्फ़ एक कागज भर का टुकड़ा है अगर उसे कार्यान्वित ना किया जाए।

साल 1995 से 2017तक कुछ अजीब कारणों से भारत की मेडिकल काउंसिल ने कभी भी ऊपरी अंगविकलांग लोगों को मेडिकल शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति नहीं दी। इस साल नएविकलांगता कानून के बाद इस विचार को चुनौती दी गई थी। संपूर्ण भारतवर्ष से 75विकलांग डॉक्टरों ने ‘डॉक्टर्स विद डिसाबिलिटीस”के बैनर तहत और विकलांग अभ्यर्थीयों ने विभिन्न उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपने हक के लिए गुहार लगाई।

और पढ़ें : इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

वडोदरा की मुस्कान शेख को (जिनकाएक हाथ नहीं है| यानी 75फीसद  विकलांगता|) को सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस साल एमबीबीएस सीट प्रदान की गयी।

वहीं गुजरात की हिना मेवाशिया (50% ऊपरी अंगविकलांगता) ने मुस्कान के एमबीबीएस प्रवेश के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और एकबार फिर ऐतिहासिक निर्णय लिया गया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साल 2019के शैक्षिक सत्र में उनकी सीट आरक्षित की क्योंकि उनका पूरा एक साल मेडिकल काउन्सिल ऑफ इंडिया की असंवेदनशीलता से खराब हुआ। हिना को दुबारा से नीट परीक्षा नहीं देनी पड़ेगी।

क़ानून सिर्फ़ एक कागज भर का टुकड़ा है अगर उसे कार्यान्वित ना किया जाए। लेकिन उससे भी बड़ी बात ये है कि हमें अपने अधिकारों का ज्ञान हो तभी हम अपने और दूसरों के अधिकारों की बात कर सकेंगे और समझ सकेंगे। आज विश्‍व मानवाधिकार दिवस है। अपने इस लेख में मैंने कई महिलाओं और विकलांग महिलाओं के अपने अधिकारों के लिए लड़ी गयी लड़ाई के उदाहरण दिए। ये मानवाधिकार सिर्फ़ शिक्षा के ही नहीं  बल्कि ये पूरक हैं नागरिक, राजनीतिक,आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के।जब भी किसी के मानवाधिकारों का हनन होता है तो हर किसी के अधिकार कमजोर होते हैं,इसलिए हमें आवाज़ उठानी चाहिए। चलिए हम वादा करते हैं कि हम अपनी आवाज़ उठाएँगे, हम कार्रवाई करेंगे, चाहे मेरे अधिकारो का हनन हो या आपके।


यह लेख डॉ सत्येन्द्र सिंह ने लिखा है, वे पेशे से डॉक्टर हैं और चिकित्सा जगत के प्रतिष्ठित पदों पर कार्य कर चुके हैं|

तस्वीर साभार : eventbrite.ie

Leave a Reply