इंटरसेक्शनलयौनिकता एड्स से सुरक्षा के लिए पुरुषों का खतना और उनके यौन साथियों का क्या?

एड्स से सुरक्षा के लिए पुरुषों का खतना और उनके यौन साथियों का क्या?

खतना कराने के बाद अधिक से अधिक लोग सुरक्षित सेक्स के व्यवहार को अपनाएँ तो खतना करने के लिए किये गये सभी ऑपरेशन सफल साबित होंगें| क्योंकि केवल खतना कर देना काफी नहीं| इस प्रक्रिया और पुरुष के दिमाग के बीच भी तालमेल होना चाहिए|

जब इस व्यक्ति को बताया गया कि खतना कराने के बाद भी परामर्शदाता उसे कंडोम के इस्तेमाल की सलाह देंगें तो उसने कहा ‘अगर मुझे कंडोम इस्तेमाल करना ही है तो फिर खतना कराने से क्या फायदा?’

जुलाई 2008 में खतना करवाने वाले पुरुषों में से एक पुरुष ने ये बयान संयुक्त राष्ट्र की समाचार एजेंसी इरिन में दिया था| एचआईवी की रोकथाम के लिए पुरुषों के खतना कराए जाने से एचआईवी मुक्त पुरुषों को तो आंशिक सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन इससे उनके यौन साथियों, (पुरुष या स्त्री) को कोई सुरक्षा नहीं मिल पाती जब तक ये पुरुष व महिला कंडोम का इस्तेमाल न करें| पुरुषों में खतना करना एचआईवी की रोकथाम करने का एकमात्र ऐसा उपाय है जिसमें दोनों यौन साथियों को कुछ हद तक भी सुरक्षा नहीं मिलती| यही हमारे लिए समस्या का विषय है|

पुरुषों के खतना करवाने से मिलती है कुछ हद तक की सुरक्षा

पुरुषों में खतना किये जाने से जनसंख्या स्तर पर एचआईवी प्रसार तभी कम होगा जब बहुत अधिक अनुपात में पुरुषों का खतना हो जाएगा| ऐसा अनुमान लगाया गया था कि अधिक सफल कार्यक्रमों में भी इसके पूर्ण प्रभाव मिलने में करीब दस साल तक का समय लगेगा| सामुदायिक स्वास्थ्य के संदर्भ में एक दृष्टिकोण यह है कि यौन जोखिम उठाने और असुरक्षित सेक्स किये जाने की हालत में कुछ भी सुरक्षा न होने की अपेक्षा खतना कराए गये पुरुषों को 50-60 फीसद सुरक्षा मिल पाना कहीं बेहतर है| एचआईवी के अधिक प्रसार वाले देशों में बहुत सी महिलाएं और पुरुष खतना कराए जाने की प्रक्रिया का स्वागत करते हैं क्योंकि वे असुरक्षित सेक्स करना छोड़ना नहीं चाहते और इसके आनंद से वंचित रहना चाहते हैं|

खतना कराने वाले पुरुषों के यौन साथियों को भी सुरक्षा पाने का समान अधिकार है|

कैसे मिले सुरक्षित सेक्स को बढ़ावा?

सुरक्षित सेक्स यौनिकता के बारे में सोचने और उससे संबंधित काम करने का एक तरीका है| यह केवल सेक्स के समय कंडोम का इस्तेमाल करना या शिश्न के आगे की झिल्ली को हटा देना (खतना) मात्र नहीं है| सुरक्षित सेक्स व्यवहारों को बढ़ावा देने के लिए कभी भी पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गये हैं| इसी विफलता को देखते हुए पुरुषों के खतना कराने, एंटी रेट्रो वायरल दवाओं से उपचार की उपलब्धता को बढ़ाना और अन्य तकनीकी समाधान अपनाना अधिक ज़रूरी बन गया है| अब भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या अतिरिक्त प्रयास करने से सुरक्षित सेक्स का तरीका सफल हो सकता है या हमें ये मान लेना होगा कि इस व्यवहार को अपना पाना व्यावहारिक रूप से असंभव है? क्योंकि अगर एचआईवी संक्रमित लोग सुरक्षित सेक्स से ऊब चुके हैं और इसे छोड़ रहें हैं और अगर एचआईवी संक्रमण से मुक्त लोग जिनकी जांच न हुई हो या जो एचआईवी संक्रमण का खतरा होने के बावजूद अपने की जोखिमपूर्ण व्यवहार में लिप्त करते हों तो ऐसे हालत में रोकथाम के दूसरे प्रयासों को करना भी बहुत ज़रूरी हो जाता है| अब सवाल यह उठता है कि इनमें से किन प्रयासों को प्राथमिकता दी जाए और ये किसके फायदे के लिए हों?

और पढ़ें : महिलाओं का ‘खतना’ एक हिंसात्मक कुप्रथा

साल 2006 में टोरंटो एड्स सम्मेलन के दौरान संक्रमण रोकथाम के सभी संभावित उपायों को दर्शाने वाला एक चक्र पेश किया गया था| साल 2006 में रोकथाम के तकनीकी उपाय जैसे कि टीकाकरण, गैर एंटी रेट्रो वायरल माइक्रोबीसाइड, हर्पीज सिम्पलैक्स वायरस को दबाने का उपचार और बड़े पैमाने पर यौन संचारित संक्रमण का उपचार करने के उपाय अब भी अपने लक्ष्य से बहुत दूर हैं या अप्रभावी साबित हो चुके हैं| इस तरह हमारे सामने अभी भी स्वैच्छिक आधार पर परामर्श देने व जांच कराने, व्यवहार परिवर्तन, बैरियर (कंडोम) उपायों, पुरुषों का खतना करने जैसे उपायों के अलावा एंटी रेट्रो वायरल दवाओं की लगातार बढ़ती प्रभावशीलता का भी उपाय है| पुरुषों में खतना करने से एचआईवी से 50-60 फीसद सुरक्षा मिल पाती है| इसके बाद भी अगर हम पुरुषों में खतना करने की प्रक्रिया की तुलना एक सस्ते से कंडोम से करें, जो 40 फीसद मामलों में फट जाता है तो यह संभवत: उतना आकर्षक नहीं लगेगा| लेकिन बहुत से पुरुष जो इसे (खतना) किसी प्रभावी टीकाकरण की तरह बेहतर समझते हैं वे अपने व्यवहार के बारे में विचार करेंगें और हो सकता है कि बहुत से अन्य दूसरे पुरुषों की तुलना में सुरक्षित व्यवहार करें|

पुरुषों का खतना : प्रथा से सुरक्षा तक

पुरुषों में खतना करने की प्रथा का पालन कई सदियों से दुनिया के दो प्रमुख धर्मों के लोग और बहुत से अन्य लोग भी स्वच्छता बनाये रखने, धर्म में प्रवेश और अन्य कारणों से करते रहे हैं| तो हाँ, यह सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक विषय है और दुनियाभर में लड़कों के जन्म के तुरंत बाद उनका खतना कर दिए जाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए| ऐसा लगता है कि यह वास्तविकता अभी हमारे लिए बहुत दूर है, खासकर एक ऐसी दुनिया में जहाँ ‘विकल्प’ के बारे में तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत की जा रही धारणाएं अक्सर सामुदायिक स्वास्थ्य की ज़रूरतों पर भारी पड़ती हैं|

बहुत से पुरुष यह मानते होंगें कि खतना कराना एक अच्छी विधि हो सकती है लेकिन यह देखना बाकी है कि कितने पुरुष वास्तव में इस प्रक्रिया के लिए खुद को सामने लाते हैं| परिवार नियोजन के इतिहास को देखने में हमें ये पता चलता है कि वास्तव में परिवार नियोजन उपायों का इस्तेमाल कर रहे लोगों की तुलना में कहीं अधिक संख्या में लोग यह कहते हैं कि उन्हें और अधिक बच्चों की ज़रूरत नहीं है| सम्मेलन के दौरान बहुत से लोगों ने यह सुझाव दिया कि पुरुषों में खतना कराने के कार्यक्रमों में बहुत कुछ सीखना होगा और मैं इससे पूरी तरह सहमत हूँ|

हो सकता है आने वाले समय में पुरुषों में खतना कराए जाने को राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता मिले या न मिले| लेकिन जिन देशों में इसे प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों में शामिल किया गया है अगर वहां खतना कराने के बाद अधिक से अधिक लोग सुरक्षित सेक्स के व्यवहार को अपनाएँ तो खतना करने के लिए किये गये सभी ऑपरेशन सफल साबित होंगें| क्योंकि केवल खतना कर देना काफी नहीं| इस प्रक्रिया और पुरुष के दिमाग के बीच भी तालमेल होना चाहिए| इसके साथ ही, खतना कराने वाले पुरुषों के यौन साथियों को भी सुरक्षा पाने का समान अधिकार है|

और पढ़ें : खतना की प्रथा है मानवाधिकार का उल्लंघन : सुप्रीम कोर्ट


यह लेख क्रिया संस्था की वार्षिक पत्रिका एचआईवी/एड्स और मानवाधिकार : एक विमर्श (अंक 4, 2009) से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

अधिक जानकारी के लिए – फेसबुक: CREA | Instagram: @think.crea | Twitter: @ThinkCREA

तस्वीर साभार : dailyhunt

About the author(s)

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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