द्रविण आंदोलन : ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ सबसे प्रभावी आंदोलन में से एक

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द्रविण आंदोलन : ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ सबसे प्रभावी आंदोलन में से एक
द्रविण आंदोलन : ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ़ सबसे प्रभावी आंदोलन में से एक

मेरी उम्र तब करीब पांच या छह साल रही होगी, जब मैं अपनी सहेली माधुरी के जन्मदिन पर उसके घर गयी थी| वो दिन मुझे आज भी अच्छे से याद है, क्योंकि उसदिन मैंने इंसान की पहचान को लेकर समाज की बनाई जाति-व्यवस्था को बेहद करीब से देखा था| उसदिन जब मैं माधवी के गेट पर पहुंची तो उसने मुझे देखते ही अपनी माँ से कहा ये मेरी पक्की सहेली स्वाती है और ये कहकर मुझे अंदर बुलाते हुए खुद अंदर चली गयी| उसकी माँ ने मुझसे तुरंत सवाल किया – तुम्हारा पूरा नाम क्या है? मैंने बोला – स्वाती|फिर उन्होंने ने पूछा – आगे क्या लगाती हो?
(मैं समझ नहीं पायी, वो क्या जानना चाहती हैं|)
मैंने बोला – यही मेरा नाम है|
फिर उन्होंने साफ़ कहा – कौन-सी जात की हो?
मैंने जवाब दिया – हम हिन्दू हैं|

इसपर उन्होंने बोला हम तो ठाकुर है, तुम कल पूछकर आना घर से कि कौन जात हो?

उनके ये कहते ही मैं भागते हुए अपने घर वापस आ गयी| बेहद अज़ीब था उनका सवाल और उनके साथ हुई मेरी बात| पूरे रास्ते दिमाग में यही चलता रहा कि घर में बताया गया है कि कोई नाम पूछे तो स्वाती बोलना| ये आगे क्या लगाते है? और फिर ये ठाकुर क्या होता है? इन्हीं सवालों के साथ मैं घर वापस आ गयी और उसके बाद माधुरी ने मुझसे दोस्ती तोड़ ली|

पर अब समझ में आता है कि यही है हमारा असली समाज, जो जाति-व्यवस्था में बुरी तरह जकड़ा हुआ है और जाति की ये जकड़न इतनी सड़ी-बदबूदार और मजबूत है कि ये किसी का बचपन मारने में थोड़ी भी देर नहीं करती| खासकर तब जब आप किसी पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं| ऐसे में हमें बचपन से ही ये एहसास दिलाया जाता है कि आपकी जाति आपकी पहचान है|

ऐसा नहीं है कि जाति की इस जटिल व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास कभी नहीं किया गया| यों तो इस जटिल व्यवस्था को जड़ से खत्म करने में वे प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हुए, लेकिन वास्तविकता ये है कि इसे खत्म करने के लिए अगर वे प्रयास नहीं किये गये होते आज शायद हमारे समाज की तस्वीर कुछ और होती| जाति-व्यवस्था के विरोध में ऐसे बहुत से आंदोलन  हुए हैं, जो बेहद सफल और प्रभावी रहे और इन्हीं आंदोलनों में से प्रमुख है साल 1925 में तमिलनाडू में हुआ – आत्म-सम्मान या द्रविण आंदोलन | पेरियार ई.वी. रामास्वामी की अगुवाई में इस आंदोलन  की शुरुआत तब हुई जब भारत देश अपने आज़ाद देश का सपना पूरा करने को संघर्ष कर रहा था|

आज़ादी से पहले जाति-व्यवस्था के खिलाफ शुरू किये गये द्रविण आंदोलन का प्रभाव आज भी किसी न किसी रूप में कायम है, जो अपने आप में बेहद प्रभावी है|

भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ शुरू हुआ ‘द्रविण आंदोलन ’

साल 1924 में केरल के त्रावणकोर के राजा के मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर दलितों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का विरोध हुआ था। इसका विरोध करने वाले लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद आंदोलन के नेतृत्व के लिए नेताओं ने मद्रास राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष पेरियार को न्योता भेजा। पेरियार इस्तीफा देकर केरल पहुंच गए, जिसके बाद उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया और महीनों के लिए जेल में बंद भी रहे।

वहीं इसी बीच खबर आई कि चेरनमादेवी शहर में कांग्रेस के अनुदन से चल रहे सुब्रह्मण्यम अय्यर के स्कूल में ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण छोत्रों के साथ खाना परोसते समय अलग व्यवहार किया जाता है। पेरियार ने कांग्रेस को इस स्कूल का अनुदान बंद करने को कहा, मगर कांग्रेस ने मना कर दिया। वहीं सुब्रह्मण्यम अय्यर से पेरियार ने सभी छात्रों से एक समान व्यवहार करने का आग्रह किया मगर अय्यर ने भी मना कर दिया। तब पेरियार ने कांग्रेस छोड़ आत्म-सम्मान आंदोलन शरू किया जिसे द्रविड़ आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।

तब ब्राह्मणवादी परंपरा के खिलाफ़ पेरियार की अगुवाई में द्रविण आंदोलन  का आगाज़

पेरियार को विश्वास था कि अगर इंसान अपना आत्म सम्मान विकसित करता है तो वह खुद ही व्यक्तित्व का विकास करेगा और किसी की भी गुलामी को खुद नकार देगा| आत्म-सम्मान पर उनके सबसे चर्चित उद्धरण में से एक ये था कि “हम ‘आत्म-सम्मान’ के बारे में तभी सोच पाते हैं  जब ‘श्रेष्ठ’ और ‘हीन’ जाति की धारणा हमारी जमीन से गायब हो जाती है।”

पेरियार के अनुसार ‘वो गैर-ब्राह्मणों को द्रविड़ कहते थे।‘ इस आंदोलन की शुरुआत छूत-अछूत, असमानता, धार्मिक विश्वास, ब्राह्मणवादी सोच और हिंदू कुरीतियों पर प्रहार करने के लिए हुई थी। आज भी द्रविड़ आंदोलन  से जुड़े नेता अपने नाम के साथ जातिसूचक टाइटल भी इस्तेमाल नहीं करते हैं। द्रविण आंदोलन  हिंदू धर्म के किसी ब्राह्मणवादी परंपरा और रस्म में यकीन नहीं रखता है। यही कारण है कि तमिलनाडु के पहले द्रविड़ मुख्यमंत्री अन्नादुरै से लेकर करुणानिधि तक का देहसंस्कार करने के बजाए उन्हें दफनाया गया था।

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पेरियार ने घोषणा की थी कि स्व-सम्मान आंदोलन अकेले वास्तविक स्वतंत्रता का आंदोलन हो सकता है और व्यक्तिगत स्वाभिमान के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता फलदायी नहीं होगी। अपने पहले चरण में यह आंदोलन  गैर-ब्राह्मण आंदोलन  था और इस आंदोलन  के दो उद्देश्य थे –

पहला, शिक्षा और सामाजिक स्थिति में ब्राह्मणों और अन्य जातियों के बीच भेदभाव की खाई को कम करना, जिसके लिए पिछड़ी जातियों को और ज्यादा विशेषाधिकारों और रियायतों की मांग मंज़ूर करवाना| सरल भाषा में कहूँ तो आरक्षण की मांग|

दूसरा, पिछड़ी जातियों के आत्मसम्मान की प्राप्ति| यानी कि ऐसे समाज का निर्माण करना जहाँ पिछड़ी जातियों को समान मानवाधिकारों का अधिकार मिले| साथ ही, पिछड़ी जातियों को जाति आधारित समाज के संदर्भ में उनके स्वाभिमान को प्रोत्साहित करना|

हम ‘आत्म-सम्मान’ के बारे में तभी सोच पाते हैं  जब ‘श्रेष्ठ’ और ‘हीन’ जाति की धारणा हमारी जमीन से गायब हो जाती है।

भारत में ब्राह्मणवाद के खिलाफ ये एक ऐतिहासिक आंदोलन था| इस आंदोलन का एक उद्देश्य लोगों में राजनीतिक चेतना का विकास कर सामाजिक कुप्रथाओं का उन्मूलन और महिला अधिकारों की सुरक्षा करना था, जिसमें प्रमुख तौर पर इसमें अनाथ और विधवा के लिए घरों की स्थापना और उनके लिए शैक्षणिक संस्थान खोलना शामिल था। इस आंदोलन ने कुछ ही समय में बड़ी लोकप्रियता हासिल की और एक राजनीतिक मंच बन गया।

गौरतलब है कि यह आंदोलन न केवल तमिलनाडु में बल्कि मलेशिया, सिंगापुर जैसी बड़ी तमिल आबादी वाले देशों में भी बेहद प्रभावशाली साबित हुआ। सिंगापुर के भारतीयों के बीच तमिल सुधार संघ जैसे समूह की शुरुआत की गयी| इसी तर्ज पर, रामास्वामी नाइकर ने साल 1945 में द्रविड़ कषगम की स्थापना की और साल 1949 में सी अन्नादुराई ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) की स्थापना की, जिसने तमिलनाडु में ब्राह्मणों के वर्चस्व को पूरी तरह से मिटा दिया। नाइकर के नेतृत्व में डीएमके सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ब्राह्मणवाद का विरोध जारी रखे हुए हैं।

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द्रविण आंदोलन की जड़ से जुड़े आज के राजनीतिक दल

साल 1944  में पेरियार ने अपने आंदोलन और साल 1916 में शुरू हुए गैर-ब्राह्मण संगठन दक्षिण भारतीय लिबरल फेडरेशन (जस्टिस पार्टी) को मिलाकर “द्रविड़ कज़गम” का गठन किया। इसके करीब पांच  साल बाद ही द्रविड़ कज़गम पार्टी टूट गई और पेरियार के बेहद करीब रहे सीएन अन्नादुरै ने डीएमके की स्थापना की, जिसके बाद साल 1967  में पहली बार डीएमके राज्य की सत्ता पर काबिज़ हुई और मुख्यमंत्री बने सीएन अन्नादुरै। इधर सीएन अन्नादुरै को अपना मेंटर मानने वाले एम करुणानिधि ने डीएमके और राजनीति में अपने पांव जमा लिए। साल 1969 में अन्नादुरै की मौत के करुणानिधि को ही उनकी जगह सीएम बनाया गया। करुणानिधि जो कि एक राजनेता होने के साथ-साथ तमिल फिल्मों में पठकथा और डायलॉग भी लिखा करते थे। वे फिल्मों के माध्यम से डीएमके की फिलॉसफी लोगों तक पहुंचाते थे।

इसतरह आज़ादी से पहले जाति-व्यवस्था के खिलाफ शुरू किये गये द्रविण आंदोलन का प्रभाव आज भी किसी न किसी रूप में कायम है, जो अपने आप में बेहद प्रभावी है|


तस्वीर साभार : outlookindia

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