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यह बहुत कॉमन है जब लोग हंसी-मज़ाक करने के लिए चुटकुले बनाते हैं पर जब चुटकुले साधारण हंसी मज़ाक जैसे विषयों से निकलकर कुछ गंभीर और दुखद विषयों पर खिसक जाते हैं तो ये न सिर्फ भयावह हो जाते हैं बल्कि दुखदायी भी सकते हैं। आपने अक्सर सुना होगा लोग सिक्खों (सरदारों) पर चुटकुले बनाते हैं| सबसे कॉमन तो पति-पत्नी पर केन्द्रित फ़ूहड़ चुटकुले हैं, जिसमें पत्नी को सारी मुश्किलों का जड़ बताकर उसका मजाक उड़ाया जाता है। पर आपने सुना है आजकल बलात्कार पर भी चुटकुले बन रहे हैं? जी हां यह बहुत कॉमन हो चला है लोग बलात्कार पर भी जोक्स बना रहे हैं।

पितृसत्तामक व्यवस्था में महिला को हमेशा वस्तु की तरह दिखाकर पुरुष से कमतर आंका जाता है| इसी तर्ज पर इसकी सामाजिक रचना गढ़ी गयी है और इसे तमाम विचारों, कहावतों, सांस्कृतिक गतिविधियों और चुटकुलों के माध्यम से गाहे-बगाहे जिंदा रखा जाता है| अक्सर कहा जाता है कि अगर किसी इंसान का व्यक्तित्व परखना होतो उसके मज़ाक को देखना चाहिए| वैसे तो हम अक्सर ये मानते हैं कि मज़ाक में इंसान ज्यादा सोचता-समझता नहीं है और मनोरंजन के नामपर कुछ भी कह-कर जाता है| लेकिन वास्तविकता इससे ठीक उलट है, इंसान जो वाकई में सोचता है, जिसे कहने-करने की हसरत हमेशा उसके दिल-दिमाग में दबी रहती है, मज़ाक में वो अपने उसी विचार को सामने लाता है|

पितृसत्तामक व्यवस्था में महिला को हमेशा वस्तु की तरह दिखाकर पुरुष से कमतर आंका जाता है|

इसलिए इस मज़ाक को हल्के में लेना कहीं से भी ठीक नहीं है| अब सवाल ये आता है कि अगर कोई महिला या पुरुष ऐसे मज़ाक करे या चुटकुले सुनाएँ तो हमें क्या करना चाहिए| ध्यान देने वाली बात ये है कि यहाँ हमारी प्रतिक्रिया क्या है या क्या होगी ये उस विचार के भविष्य के लिए बहुत मायने रखता है| विचार का भविष्य माने – उस चुटकुले को आगे भी किसी सामने सुनाया जाएगा या फिर उसका कड़ा विरोध करके उसे वहीं रोका जाएगा| 

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चूँकि मज़ाक में या चुटकुलों के ज़रिये कही गयी बातें हमारे मन में धीरे-धीरे अपनी पैठ जमाने और विचार बनाने का काम करते है, ऐसे में बेहद ज़रूरी है कि जब महिला हिंसा, बलात्कार, लैंगिक भेदभाव, धार्मिक द्वेष या किसी भी हिंसा से संबंधित विचार को हम किसी चुटकुले में सुनते हैं तो उसपर अपनी प्रतिक्रिया के माध्यम से अपना विरोध दर्ज करें, वो कैसे? आइये बताती हूँ – 

अगर किसी इंसान का व्यक्तित्व परखना होतो उसके मज़ाक को देखना चाहिए|

  • चेहरे पर ऐसी कोई प्रतिक्रिया न लाएं जो दर्शाए कि यह फ़ूहड़ चुटकुले आपने पसंद किया हो| आपके फेस एक्सप्रेशन से ही सामने वाले को लग जाना चाहिए कि यह टेस्ट आपका या किसी अन्य सभ्य इंसान का नहीं हो सकता।
  • सामने वाले को समझाएं कि बलात्कार न सिर्फ महिला के शरीर के साथ होता है बल्कि एक बलात्कर उस महिला की आत्मा और अंतर्मन को भी जीवित नहीं छोड़ता। इसलिए आइंदा ऐसे जोक न सुनाएं और जो सुनाए उसे रोकें भी।
  • ऐसे जोक सुनाने वाले पुरुष को बताएं कि बलात्कार से पीड़ित सिर्फ महिलाएं ही नहीं होती उस महिला से जुड़ा हुआ हर इंसान होता है।

हो सकता है आपको देखने में ये बहुत छोटी पहल लगे, पर यकीन मानिए इन छोटी पहलों का प्रभाव बेहद ज्यादा होता है| क्योंकि हम जब बार-बार किसी बात को कहते हैं तो उसकी पैठ हमारे और सुनने वाले के दिमाग में बैठती जाती है, जिससे दुबारा कभी-भी वो अगर ऐसी बातें करता है या सुनता है तो आपका विरोध उसे हमेशा याद रहेगा और वो ऐसा कहने-सुनने से पहले दो बार सोचेगा| सौ बात की एक बात, जब बात किसी भी तरह की हिंसा से जुड़ी हो तो बिना देर लिए उसपर अपना विरोध दर्ज करवाना बेहद ज़रूरी है, फिर वो कोई विचार हो या | याद रखिये – अभी नहीं तो कभी नहीं|

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तस्वीर साभार : HousesPictures.com

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