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प्रकृति में जिस तरह से प्रदूषण दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है, उसके लिए हम सभी जिम्मेदार है। जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण, वायु प्रदूषण जैसी घातक परिस्थितियों की वजह से इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पर्यावरण को दूषित करने वाली ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिनको रोजमर्रा की जिंदगी में हम नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन वे हमारी प्रकृति को हानि पहुंचाने का सामर्थ्य रखती हैं। इस कड़ी में माहवारी के वक्त इस्तेमाल किए जाने वाले सैनिटरी पैड्स एवं टेंपोंस को सूची में रखना बेहद ज़रूरी है।

एनएफएचएस 4 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सैनिटरी पैड्स की निपटान प्रणाली (डिस्पोजल सिस्टम) एक बढ़ती समस्या है। हमारे देश में 15 से 24 साल की 42 फीसद महिलाएं सेनेटरी उत्पादों का इस्तेमाल करती हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत की 12.1 करोड़ महिलाएं हर माह औसतन 8 सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं, जिससे महीने में 102.1 करोड़ पैड्स का कचरा निकलता है।

स्कूल, कॉलेज, ऑफिस और अस्पताल जैसी जगहों पर डिस्पोजल सिस्टम ना होने की वजह से ज़्यादातर कचरा शहरी सीवरेज प्रणाली, जल निकायों, ग्रामीण क्षेत्रों और गड्ढों में फेंक दिया जाता है, जिससे प्रदूषण के साथ बीमारियां भी फैलती हैं। माहवारी के अपशिष्ट पदार्थों को खत्म करने का केवल एक उपाय होता है – उन्हें जला देना। भारत में यह सरकार द्वारा किया जाता है पर सैनिटरी पैड्स जैसे पदार्थों को जलाने के दौरान जो विषैली गैसें निकलती हैं, वह भारी संख्या में नुकसानदायक होती हैं।

माहवारी के वक्त हमारा नॉन बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी उत्पादों से बायोडिग्रेडेबल या फिर लंबे समय तक चलने वाले उत्पादों में बदलना अब विकल्प ही नहीं बल्कि समय की मांग हो चुका है। ऐसे में महिलाएं किन-किन चीजों का इस्तेमाल कर सकती हैं आइए जानते हैं-

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1. क्लॉथ पैड

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तस्वीर साभार : menstrualcupreviews

भारत में 62 फीसद महिलाएं अब भी माहवारी आने पर कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। अगर गंदे कपड़े की जगह वे क्लॉथ पैड का इस्तेमाल करें तो यह उन्हें बीमारियों से तो बचाएगा ही, साथ ही उनके लिए माहवारी के वक्त एक अच्छा विकल्प भी होगा। रासायनिक पदार्थों से बने सेनेटरी पैड्स और टेंपोंस की जगह रुई जैसे प्राकृतिक पदार्थ से बने यह क्लॉथ पैड आज महिलाओं के लिए बहुत अच्छा चुनाव हैं। इन्हें आप धोकर, सुखाकर फिर से इस्तेमाल कर सकती हैं।

2. पीरियड पैंटीज़

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तस्वीर साभार : navbharattimes

दैनिक उपयोग में आने वाली पैंटीज़ से हटकर यह पीरियड पैंटीज़, माहवारी में पैड का काम करती हैं। इनपर कोई पैड लगाने की जरूरत नहीं होती, यह खुद ही रक्त को सोखने में सक्षम होती हैं। कंपनियों द्वारा यह भी दावा किया जाता है कि पीरियड पैंटीज़ सेनेटरी पैड्स और टैंपोंस से ज़्यादा सुरक्षित और सरल होती हैं।

और पढ़ें : ‘पीरियड का खून नहीं समाज की सोच गंदी है|’ – एक वैज्ञानिक विश्लेषण

3. क्लॉथ पेंटीलाइनर

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तस्वीर साभार : periodmate

‘पेंटीलाइनर’ सेनेटरी पैड का एक पतला रूप होता है। यह वेजाइनल डिस्चार्ज या फिर माहवारी के समय कम रक्त बहाव जैसी स्थितियों में इस्तेमाल किया जाता है। अच्छी बात यह है कि बाज़ार में अब पेंटीलाइनर भी ‘क्लॉथ पेंटीलाइनर’ के रूप में उपलब्ध है जिन्हें उपयोग करने की प्रक्रिया पूरी तरह एक क्लॉथ पैड के जैसी है।

4. मेंस्ट्रूअल कप

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तस्वीर साभार : healthline

माहवारी के दौरान इस्तेमाल किया जाने वाला यह कप सिलिकॉन या लेटेक्स जैसे पदार्थों से बना होता है, जो छोटा व लचीला होता है। सेनेटरी पैड्स और टेंपोंस रक्त प्रवाह को अवशोषित करते हैं, पर मेंस्ट्रूअल कप रक्त को इकट्ठा करता है। इसे पर्यावरण व महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है क्योंकि एक मेंस्ट्रूअल कप 10 साल तक उपयोग किया जा सकता है। इसका एक फायदा यह भी है कि यह सैनिटरी पैड्स या टेंपोंस के मुकाबले ज़्यादा देर तक पहना जा सकता है। मेडिकल उपकरणों से निर्मित होने के कारण इस कप के कोई साइड इफेक्ट्स या नुकसान भी नहीं होते हैं। इसे माहवारी के समय योनि में पहनकर काम में लाया जाता है। बाज़ार में मेंस्ट्रूअल कप अलग-अलग आकारों में उपलब्ध है।

5. बायोडिग्रेडेबल पैड

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तस्वीर साभार : indiamart

प्राकृतिक पदार्थ (केले के फाइबर, रूई आदि) से बने यह पैड पूरी तरह नष्ट होने योग्य होते हैं। इनमें कोई भी केमिकल पदार्थ या प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ऐसे में अगर इनकी निपटान प्रक्रिया सही ढंग से की जाए तो यह पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचा सकते। इनका इस्तेमाल साधारण पैड की तरह ही किया जाता है।

6. बायोडिग्रेडेबल पेंटीलाइनर

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तस्वीर साभार : biehealth

प्राकृतिक पदार्थों से बने यह बायोडिग्रेडेबल पेंटीलाइनर एक साधारण बायोडिग्रेडेबल पेंटीलाइनर का काम करते हैं। जिस तरह बायोडिग्रेडेबल पैड्स का इस्तेमाल व निपटान किया जाता है, उसी तरह बायोडिग्रेडेबल पेंटी लाइनर्स को भी उपयोग में लाया जाता है। यह साधारण पेंटीलाइनर की तरह ही हल्के व पतले होते हैं।

7. क्लॉथ टैंपोंस

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तस्वीर साभार : etsy

क्लॉथ टैंपोन साधारण टैंपोन जैसे ही होते हैं लेकिन वे कपड़े द्वारा बनाए जाते हैं। इसे निर्मित करने में सूती कपड़े का उपयोग किया जाता है। एक साधारण टैंपोन का सबसे बड़ा साइड इफेक्ट होता है उससे पनपी बीमारी ‘टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम’ (टीएसएस)। टीएसएस का सबसे बड़ा कारण रेयान फाइबर्स माना जाता है, जो क्लॉथ टैंपोन में नहीं होते। यह ऑनलाइन बाज़ार में उपलब्ध हैं, कुछ महिलाएं इन्हें घर में ही बनाकर इस्तेमाल करती हैं। इन्हें निर्मित करने की विधि इंटरनेट पर मौजूद है। हालांकि क्लॉथ टेंपोंस पूरी तरह सुरक्षित एवं स्वच्छ है या नहीं, यह एक चर्चा का विषय है।

8. मेंस्ट्रूअल डिस्क

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मेंस्ट्रूअल कप जैसे मेंस्ट्रूअल डिस्क भी है, जो एक कटोरी के आकार की होती है, जहां मेंस्ट्रूअल कप में लंबाई होती है| वहीं मेंस्ट्रूअल डिस्क में चौड़ाई होती है। मेंस्ट्रूअल कप योनि नहर में ठहरता है, जबकि मेंस्ट्रूअल डिस्क योनि के अग्रभाग में अंतरस्थापित की जाती है। इसका एक फायदा यह भी है कि मेंस्ट्रूअल डिस्क से पीरियड के वक्त सेक्स में आसानी होती है। पहले यह डिस्क प्लास्टिक से बनी हुई होती थी परंतु अब कुछ कंपनियां इसे सिलिकॉन व लेटेक्स जैसे पदार्थों से निर्मित करने लगी है।

और पढ़ें : माहवारी से जुड़े दस मिथ्य, जो आज भी महिला सशक्तिकरण को दे रहे चुनौती

9. पीरियड बाथिंग सूट्स

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माहवारी के दौरान स्विमिंग महिलाओं के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होती है। इस कठिनाई का सामना करने के लिए कई विदेशी कंपनियां अब पीरियड बाथिंग सूट्स या पीरियड स्विमवियर बनाने लगी है, जिसे पहनकर बिना डरे महिलाएं स्विमिंग का आनंद ले सकती हैं। हालांकि भारत में फिलहाल यह उत्पाद उपलब्ध नहीं है।

10. सी-स्पंज टैंपोन

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तस्वीर साभार : menstrualcupreviews

‘सी-स्पंज टैंपोन’ या ‘मेंस्ट्रूअल स्पंज’ एक प्राकृतिक स्पंज है जो साधारण टैंपोन की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है। चूंकि यह प्राकृतिक है, इसलिए इसमें टीएसएस का कोई खतरा होता है या नहीं, इसका फिलहाल प्रमाण देना मुश्किल है। यह पुनः प्रयोग किए जा सकते हैं, पर केवल 6-12 महीने तक। इन्हें समुद्र से लिया किया जाता है और यह रक्त प्रवाह सोखने में मददगार होते हैं। मेंस्ट्रुअल स्पंज को अभी केवल विदेशी कंपनियां ही प्रयोग में लाई हैं और भारत में यह उपलब्ध नहीं है।


तस्वीर साभार : anagoesgreen

Ayushi is a student of B. A. (Hons.) Mass Communication and a social worker who is highly interested in positively changing the social, political, economic and environmental scenarios. She strictly believes that "breaking the shush" is the primary step towards transforming society.

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4 COMMENTS

  1. […] है और छुआछूत का सामना करना पड़ता है। इस समय वैसे ही महिलाएं शारीरिक रूप से दर्द व कमज़ोरी से जूझती हैं, ऐसे में […]

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