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पीरियड प्रोडक्टिविटी को सरल शब्दों में समझा जाए तो इसका मतलब है पीरियड की तकलीफों की चिंता किये बिना, अपना काम बिना रुकावट के सफलतापूर्वक करते जाना। हम सभी जानते हैं कि कैसे पीरियड शुरू होते ही हमारी पढ़ाई या काम धीमी गति से होने लगते हैं या फिर पूरी तरह बंद हो जाते हैं। कितनी ही लड़कियों और महिलाओं को पीरियड के वक्त शारीरिक दर्द, कमजोरी, मूड स्विंग व अन्य कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में काम की चिंता में तबियत को अनदेखा करने से आपको पूरे महीने भी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं झेलनी पड़ सकती हैं। इनसे हमारी प्रोडक्टिविटी पर असर पड़ता है।

यह चीज़ केवल पढ़ाई और कामकाज में ही नहीं बल्कि दैनिक जीवन में भी आड़े आती है। हम सभी ने कभी ना कभी पीरियड से जुड़ी यह बाधाएं ज़रूर अनुभव की हैं। हम इन्हें अपनी स्कूल या कॉलेज में बिताई हुई जिंदगी में तो भूल जाते हैं लेकिन जब बात आती है ऑफिस की तो इसे नजरअंदाज कर पाना मुश्किल है। आज के दौर में जहां आपको अपने काम की पाई-पाई का हिसाब देना पड़ता है, वहां पीरियड की तकलीफों को लेकर बैठ जाना अब कोई विकल्प नहीं है।

हां ऐसे बहुत से देश हैं जहां सरकारों की तरफ़ से “मेंस्ट्रूअल लीव” यानी पीरियड के अवकाश महिलाओं को प्रदान किए जाते हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि भारत में यह अवकाश केवल बिहार में मिलता है, वह भी दो दिन का। कुछ प्राइवेट कंपनियां पीरियड में महिलाओं को अवकाश देती है पर वह भी एक या दो दिन तक सीमित रहता है। इसके अलावा अगर हम देखें तो महिलाओं को अपनी इच्छा अनुसार ही काम से छुट्टी लेनी पड़ती है जिस कारण उनके वेतन में भी कटौती होती है।

खैर यह सुविधा जब तक हमें सरकार से पूरी तरह लागू होकर नहीं मिलती तब तक हमें दूसरे उपायों से समझौता करना पड़ेगा। ऐसे में पीरियड के दिनों को ट्रैक करके चलना और उनका सही फायदा उठाना हमारे लिए सरल और लाभदायक साबित हो सकता है।

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कैसे बढ़ाएं पीरियड प्रोडक्टिविटी ?

पीरियड स्वास्थ्य विशेषज्ञ एलिसा विट्टी की मानें तो पेशेवर महिलाएं आसानी से अपनी प्रोफेशनल लाइफ और  अपने पीरियड में तालमेल बैठा सकती हैं। इंतज़ार है तो सिर्फ अपने पीरियड को ट्रैक करने का।

पहली अवस्था होती है पीरियड की जिसमें पहले दिन से पाँचवे दिन का पता चलता है। इस अवस्था में महिलाओं में एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन जैसे हॉर्मोन सबसे कम स्तर पर होते हैं। महीने के इस वक़्त में अधिकतर महिलाएँ कमज़ोरी, दर्द, भावनात्मक उतार-चढाव आदि का अनुभव करती हैं। विट्टी के अनुसार इस समय आपको पूरी तरह आराम करना चाहिए और सेल्फ केयर (स्वयं की देखभाल) पर ध्यान देना चाहिए।

पीरियड प्रोडक्टिविटी को सरल शब्दों में समझा जाए तो इसका मतलब है पीरियड की तकलीफों की चिंता किये बिना, अपना काम बिना रुकावट के सफलतापूर्वक करते जाना।

दूसरी अवस्था होती है फॉलिक्युलर फेज़ (कूपिक अवस्था), जो कि छठवें दिन से बारहवें दिन तक चलता है। ऐसी स्थिति में एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन धीरे-धीरे शरीर में बढ़ता है जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है और मन को अच्छा लगता है। विट्टी के अनुसार इस वक़्त आप नये विचारों और रचनात्मकता के साथ अपने काम को सही रूप में ढाल सकती हैं। इस समय आप अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलकर काम करने में अधिक सक्षम होती हैं।

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तीसरी अवस्था होती है ओवुलेशन, जो कि तेरहवें दिन से अठारहवें दिन तक चलता है। इस समय आपके सभी हॉर्मोन का स्तर सबसे ऊपर रहता है जिससे आप सबसे अच्छा महसूस करती हैं। आपका आत्मविश्वास और ध्यान भी बेहतरीन होता है। ऐसे में आपका सामाजिक घुलना-मिलना और कम्युनिकेशन और भी कुशल होता  जाता है। इस वक़्त आप अपने काम से जुड़ी सारी आवश्यक मीटिंग, डील आदि संभव करें तो और बेहतर होगा।

चौथी और आख़िरी अवस्था होती है लुटियल फेज़ (पीतपिंड प्रावस्था), जो कि उन्नीसवें दिन से अठाईसवें दिन तक का होता है। इस वक़्त एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन की मात्रा शरीर में धीरे-धीरे घटती जाती है और प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन सक्रिय होता है। यह हॉर्मोन आपकी कार्यशैली को मज़बूत करने और छोटी-छोटी चीज़ों पर गौर करने में मदद करता है। इस समय आप अपने बचे हुए काम (जैसे कोई प्रोजेक्ट) गंभीरता के साथ खत्म कर सकती हैं।

इन महत्वपूर्ण बातों को मद्देनज़र रखते हुए महिलायें अपनी प्रोफेशनल लाइफ और पीरियड में संतुलन बनाकर चलें तो दैनिक जीवन और भी सरल हो सकता है।

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तस्वीर साभार : flo.health

Ayushi is a student of B. A. (Hons.) Mass Communication and a social worker who is highly interested in positively changing the social, political, economic and environmental scenarios. She strictly believes that "breaking the shush" is the primary step towards transforming society.

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