‘वर्जिन’ जिसे हिंदी में हम ‘कुंवारी’ कहते हैं| कुंवारी यानी कि वो महिला जिसकी योनि में हायमन (एक पतली झिल्ली) मौजूद हो| यों तो ये झिल्ली कई बार भागदौड़ करने, खेलने, साइकिल चलाने या फिर ज्यादा काम करने से भी फट जाती है| लेकिन आमतौर पर इसके फटने का कारण सिर्फ यही माना जाता है कि महिला ने किसी पुरुष के साथ यौन संबंध बनाया है, जिसमें पुरुष का लिंग महिला की योनि में गया है| इसतरह यह सीधेतौर पर महिला के चरित्र से जोड़कर देखा जाता है|

हमारे समाज ‘वर्जिन’ शब्द केवल किसी इंसान का सेक्सुअल अनुभव नहीं, बल्कि शादी करने की काबिलियत को दर्शाता है। यह एक ऐसी धारणा है जो सदियों से सिर्फ महिलाओं के लिए प्रताड़ना बनी हुई है। हम सभी जानते हैं कि यौन सम्बन्ध में दो लोगों की भागीदारी होती है। लेकिन फिर भी उंगलियां उठने की बात आती है तो वह एक औरत ही सहती है। लड़की वर्जिन है या नहीं, ये उसके साथ-साथ उसके परिवार के लिए भी कसौटी होती है। बचपन से ही घरों में सिखा दिया जाता है कि औरत के पास जो “ख़ज़ाने की तिजोरी” है, उसकी चाभी उसके पति के पास ही मिलेगी। ऐसे में जब शादी के वक़्त दो परिवारों के बीच रिश्ता जुड़ता है तब उनके लिए वर्जिनिटी एक अहम परीक्षा होती है। इस परीक्षा का इम्तिहान एक महिला को देना होता है और निरीक्षक होता है उसका पति।

लड़की वर्जिन है या नहीं, ये उसके साथ-साथ उसके परिवार के लिए भी कसौटी होती है।

ऐसी दकियानूसी विचारधारा का ही नतीजा है कि आज भी दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों में मुस्लिम मैरिज लॉ सर्टिफिकेट के ज़रिये पत्नी को अपनी गोपनीय और निजी जानकारी भी देनी पड़ती है। गौरतलब है कि इस सर्टिफिकेट में तीन विकल्प जैसे- वर्जिन, विधवा (विडो) और तलाकशुदा (डिवॉर्सड) शामिल है। इस तरह से दुल्हन को यह बताना पड़ता है कि वह वर्जिन है या नहीं। यह विकल्प पुरुषों के लिए नहीं है, बस महिलाओं के लिए है। इसी प्रथा का शिकार बांग्लादेश भी था, पर अब और नहीं।

बीते रविवार को बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला लेते हुए सरकार को ये आदेश दिया कि मैरिज सर्टिफिकेट से ‘वर्जिन’ शब्द हटाकर ‘अनमैरिड’ (कुंवारी) जोड़ा जाये। इसी के साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि अब पुरुषों को भी अपना मैरिटल स्टेटस बताना होगा। इस आदेश को अक्टूबर तक सर्टिफिकेट में शामिल कर लिया जायेगा। यानी कि अब महिलाओं को अपने जीवन में लिए गए व्यक्तिगत निर्णय के कारण शर्मसार नहीं होना पड़ेगा। साथ ही इसे लैंगिक समानता कि ओर एक कदम माना जा सकता है। कोर्ट का ये फैसला केवल ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि दूसरे देशों के लिए प्रेरणादायक भी है।

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यह स्त्री द्वेषी कानून साल 1961 से बांग्लादेश में चला आ रहा था। इसे रद्द करने के लिए कोर्ट में साल 2014 में याचिका दायर की गयी। जिसके बाद लोगों को यह एहसास होना शुरू हुआ कि वर्जिनिटी से जुड़ा यह क़ानून महिलाओं के लिए कितना अपमानजनक है। गौर करने वाली बात है कि बांग्लादेश में मुस्लिम आबादी 90 फीसद है। इसके साथ ही देश में अधिकतर लड़कियों का विवाह कम उम्र में कर दिया जाता है क्योंकि वर्जिनिटी का भ्रम वहाँ अब भी बरकरार है| बांग्लादेश ने वैसे भी बाल विवाह के आंकड़ों में पूरे विश्व में चौथा स्थान लिया है। साथ ही 15 साल से कम उम्र की लड़कियों के विवाह में बांग्लादेश विश्व में अव्वल नंबर पर आता है।

वर्जिनिटी एक ऐसी ख़तरनाक अवधारणा है जो हमारे सामाजिक ढाँचे की जड़ में गढ़ी हुई है।

हालांकि इस मुद्दे से यह सवाल ज़रूर उठता कि आखिर क्यों शादी के लिए एक लड़की का वर्जिन होना ज़रूरी है? लड़का वर्जिन है या नहीं कोई ये क्यों नहीं पूछता? और क्या पति और पत्नी का रिश्ता इतना कमज़ोर है कि वह किसी रूढ़िवादी जाल में फंसकर दम तोड़ सकता है? वर्जिनिटी एक ऐसी ख़तरनाक अवधारणा है जो हमारे सामाजिक ढाँचे की जड़ में गढ़ी हुई है। इसे समझना और अपनी विचारधारा से अलग करना बहुत कठिन है लेकिन नामुमकिन नहीं है। आज हर जगह विभिन्न माध्यमों के ज़रिये हम इस विषय को और जान रहे हैं, पर वास्तविकता में अपनी सोच नहीं बदल पा रहे।

इक्कीसवी सदी में भी जीते हुए अगर हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यौनिक क्रियाओं से महिलाओं के नैतिक मूल्यों, संस्कारों, चरित्र और अस्तित्व का कोई वास्ता नहीं है तो हम समाज पर एक काले धब्बे से कम नहीं हैं।

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तस्वीर साभार : hindi.oneindia

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