इंटरसेक्शनलयौनिकता वर्जिनिटी का सवाल नहीं है बल्कि सवाल मेरी ‘ना’ का है !

वर्जिनिटी का सवाल नहीं है बल्कि सवाल मेरी ‘ना’ का है !

पिंक अपने तहत स्त्री से बिंधे गये वर्जिनिटी के सवालों से भी ऊपर उठकर, देह-शुद्धता के सवालों और देह-स्वछंदता की उसकी अपनी स्वतंत्रता सवालों को उठाया गया है।

प्रो परिमळा अंबेकर

‘‘व्हेन यू लास्ट युवर वर्जिनिटी, जोर-जोर से वकील साहब अपने क्लाइंट से पूछे जा रहे थे। और इस सवाल पर क्लांइट तो क्या उस कोर्टरूम का हर बंदा, यहाँ तक कि जज-साहब भी हक्का-बक्का थे। वकील के इस सवाल पर लड़की विवश होकर पिता की ओर देखती है। पिता हताश, बेटी के दिये जानेवाले उत्तर को सुनने की पीड़ा से मुक्ति चाहते हुए कोर्टरूम से उठकर चल पड़ता है। सिनेमा का मुख्य किरदार, वह लड़की, जिसने अपने को बचाने के लिये गिलास का बोतल हवश से पीड़ित लड़के के सरपर दे मारा था। अपनी वर्जिनिटी के खोने का पहला रपट वकील और जज साहब के सामने बयान करती है।”

पिंक का क्लाइमैक्स और एंड एक-दूसरे में अंतर्भूत होकर प्रस्तुत होते हैं। और इस क्लाईमैक्स का पहला पड़ाव तब शुरू होता है जब अद्भुत नाटकीय और निर्विकार शैली में वकील दीपक सहगल, कटघरे में खड़े मीनल अरोरा से पूछता है ‘बताइए मीनल अरोरा, क्या आप वर्जिन है, हाँ या ना में जवाब दीजिये, डोंट शेक योर हेड।’ मीनल के ना कहते ही बंदूक की नली से निकली गोली-सा दूसरा प्रश्न करता है सहेगल। ‘देन व्हेन यू लॉस्ट योर व्हर्जिनिटी वॉट वाज योर येज।’ लड़की उत्तर में अपने बालिग होने की उम्र को बताती है। अनिरूद्ध रॉय चौधरी द्वारा दिग्दर्शित सिनेमा ‘पिंक’ के कोर्टरूम ड्रामा में गुंथे गये संवादों का गुंथन, धीरे-धीरे स्त्री की व्यवहार स्वछंदता को अपने जीवन के निर्णय को खुद लेने की उसकी सामाजिक स्वतंत्रता को स्क्रीन पर दर्शकों के सामने कलात्मकता से स्पष्ट रूप देता है।

स्त्री की ओर से ना का सुनने के लिए केवल पुरूष वर्ग को नहीं संपूर्ण भारतीय समाज की मानसिकता को बदलना पड़ेगा।

कोर्टरूम के संवाद भारतीय समाज में स्त्री के प्रति क़रीब नकारात्मक वातावरण की भीषणता का पर्दाफाश करते हुए। स्त्री स्वछंदता और उसकी मानवीय जीवन की मुक्त खुले वातावरण की मांग की सकारात्मक सोच को प्रस्तुत करते हैं। और इसके लिए आवश्यक पुरूष मानसिकता के बदलाव की नीति को भी सम्मुख रखता है। जैसे कि वकील का पूछना –

  1. क्या आपने शराब पी रखी थी?
  2. सभ्य घर की लड़कियाँ शराब नहीं पीती?
  3. आप रोज कितने बजे घर लौटती हैं?
  4. देर रात लौटना, अच्छे लक्षण नहीं?  
  5. आप साथी लड़कों से हॅंस-हॅंस कर बात करती है, उन्हें छूकर बोलती है? नहीं! हॅंसना लड़कों को छूना बस वे औरतें हीं करती हैं जिन्हें अपना जिस्म बेचना होता है? जो अपने हॅंसी के बदले पैसे मॉंगती वसूलती हैं?
  6. और सबसे अहम सवाल है लड़की के यौनिकता का,  पवित्रता का वकील प्रश्न को व्यंग्यात्मक अंदाज में पूछता है। जैसे वह कह रहा हों ‘समाज पूछना चाहता है मिस् अरोरा कि आपके वर्जिनिटी का अधिकार तो उनके हाथों है, आपको किसने दिया अधिकार उसे खोने का समाज और धर्म की बपौती को आप कैसे बिना अनुमति के लाइसेंस के उसे खो सकती हो मिस मीनल?’ आदि…आदि …।

कारण पिंक सिनेमा, कबीराना अंदाज की सृजनात्मक सिनेमिक प्रक्रिया है, जहाँ कबीर अपने दर्शन की बारीकी को कहने के लिये उलटबासी रचता है, कहता है – ‘बरसे कंबल भीजे आकासा …।’

और पढ़ें : स्त्री के मायनों की एक तलाश ‘बेगम जान’

फिल्म का उद्देश्य है :

  1. स्त्री की यौन-स्वतंत्रता के प्रति समाज की सहज मानसिकता का बनना।

2. देह उपभोग को लेकर उसकी अपनी खुद की इच्छा अनिच्छा को भी समाज का उसी अंदाज में स्वीकार करना। जैसे कि पुरूष की इच्छा अनिच्छा को सदियों से करते आया है।

3. उसकी ना में पुरूष को अपनी अहं की क्षति या चुनौती न देखकर, सहजीवन के दूसरे हिस्से की मान्यता के रूप में देखना।

4. यौन उपभोग के दूसरे हिस्से का स्त्रीदेह, चाहे प्रेमिका का क्यूँ न हो, सहजीवन को स्वीकार कर जी रही मेट्रो कल्चर की औरत ही क्यूँ न हो, मुक्त स्वछंद पसंदीदा शैली में अपने को गढ़ने वाली इक्कीसवी सदी की लड़की ही क्यूँ न हो, पैसा देकर खरीदा गया वैश्या स्त्री देह ही क्यूँ न हो या उपभोग के लिये मिली हुई वैवाहिक शास्त्र प्रदत्त धर्मपत्नी ही क्यूँ न हो… !! उसकी ना को सुने, गुनना और मानना ।

वकील का पुरूष होना या स्त्री का होना जैसे आयाम यहाँ मायने नहीं रखते। मुद्दा सोचने का यह है कि सिनेमा पिंक अपने तहत स्त्री से बिंधे गये वर्जिनिटी के सवालों से भी ऊपर उठकर, देह-शुद्धता के सवालों और देह-स्वछंदता की उसकी अपनी स्वतंत्रता सवालों को उठाया गया है। देह-भोग की उसकी अपनी इच्छा और अनिच्छा के अत्यंत ही वर्जिन प्रश्न को बडे ही सलीके से प्रेषित करती है। देह-संबंधों को बनाने की उसकी अपनी मानसिकता, उसकी अपनी संवेदना को,  पुरूष समाज द्वारा स्वीकार किये जाने की अत्यंत ही मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक सवाल को ‘पिंक‘ सिनेमा के परदे पर उकेरती  है।

पिंक सिनेमा नहीं, एक मूवमेंट है, स्त्री अपराध के विरूद्ध लड़ना है तो बस माइंडसेट को बदलना है।

पिंक के माध्यम से मैं उन फेमिनिस्ट राय पर आपत्ति करना चाहती हूँ जो, जेंडर विमर्श के निर्णयों को स्त्री और पुरूष के किरदारों में बाँटकर देखते हुए पारंपरिक पुरूषवादी वर्चस्व संस्कृति के विरोध की अपनी बनी बनायी खांचे से बाहर आ नहीं पा रही हैं। रितेश शाह के उठाये इस कदम में हम विमेन क्राइम के विरूद्ध में, समाज में नयी और सहज सोच को बनाने के पीछे की लेखकीय सरोकार को देख सकते हैं ।

कुछ और मुद्दे जो कोर्टरूम संवादों में उभरे थे –  

  1. नार्थइस्ट बेल्ट की जातीय व्यक्तित्व के प्रति देश का प्रिजुडाइ्ज्ड मानसिकता का बना बनाया नमूना, इनके साथ क्या यार सबकुछ चलता है।
  2. भारतीय मर्द की मानसिकता, जो घर की औरत को अपनी मर्यादा और खानदानी मान का हिस्सा माने और बाहर की औरतें होती ही हैं उपभोग की वस्तु, पुंसवादी वर्चस्व के सामने झुकनेवाली अदलीबंदी और क्या कुछ नहीं।

इसलिए स्त्री की ओर से ना का सुनने के लिए केवल पुरूष वर्ग को नहीं संपूर्ण भारतीय समाज की मानसिकता को बदलना पड़ेगा। स्त्री से कहा गया ना, एक व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया बननी है न कि कोयी प्रतिष्ठा या चैलेंज का प्रश्न बने। स्त्री और पुरूष के व्यक्तित्व की स्वीकृति जबतक समान भावबोध के और मानसिकता के धरातल पर नहीं होगी तब तक अपना समाज स्त्री के नकार को या ना को प्रेस्टीज इशू मानेगा अपना अपमान मानेगा। किसी ने सही कहा कि पिंक सिनेमा नहीं, एक मूवमेंट है, स्त्री अपराध के विरूद्ध लड़ना है तो बस माइंडसेट को बदलना है। और भी बहुत कुछ अंश है पिंक के जिनपर भी चर्चा जरूरी है। 

और पढ़ें : ‘औरत को इतना चुप मत कराओ कि वो बोलना ही भूल जाए|’


यह लेख प्रो परिमळा अंबेकर ने लिखा है जो गुलबर्गा विश्वविद्यालय गुलबर्गा में हिन्दी की प्राध्यापिका हैं। और यह लेख इससे पहले स्त्रीकाल में प्रकाशित किया जा चुका है।

तस्वीर साभार : imdb.com

About the author(s)

'स्त्रीकाल', स्त्री का समय और सच हिन्दी में स्त्री मुद्दों पर एक ठोस वैचारिक पहल है, जिसने पाठकों और अध्येताओं का विश्वास हासिल करने में सफलता पाई है। इस अनियतकालीन पत्रिका का हर अंक संग्रहणीय रहा है। अब तक हमने स्त्रीकाल के कई अंक प्रकाशित किये हैं , जिनमें स्त्री सत्ता : यथार्थ या विभ्रम , वैयक्तिक , राजनीतिक और दलित स्त्रीवाद विशेषांक क़ॆ रूप में प्रकाशित हुए हैं |

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