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दीप्ती मेरी मिंज

फिल्म बातों को रखने का ऐसा माध्यम है, जो लोगों की मानवीय भावनाओं को छूता है। इसलिए ये मुद्दों को प्रदर्शित करने का अहम और ताक़तवर ज़रिया है। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में हर साल करीब 1600 फिल्में बनती हैं। ये अलग भाषाओं और विभिन्न राज्यों में बनती हैं लेकिन इनमें आदिवासियों को या उनके जीवन और संघर्षों को ना के बराबर जगह मिलती है।

फिर भी आदिवासियों द्वारा और इनपर आधारित कुछ फिल्में, लघु फिल्में और डॉक्यूमेंटरी हैं, जिन्हें हमें ज़रूर देखना चाहिए। इन फिल्मों के किरदारों और परिस्थितियों से हम आदिवासी समाज, संस्कृति, जीवन और मुद्दों को महसूस करेंगे।

ऐसी बात नहीं है कि आदिवासियों को फिल्मों में नहीं दिखाया गया है लेकिन हमें फिल्मों में जिन किरदारों में दिखाया गया है वह बहुत गलत और रिग्रेसिव है। ग्रीन इन्फर्नो जैसी फिल्मों में आदिवासियों को हिंसक, स्वार्थी, जंगली और क्रूर दिखाया गया है। इस प्रकार का रुपांतरण गलत तो है ही लेकिन वे आदिवासियों के लिए घातक भी हैं। चलिए जानते हैं कुछ ऐसी फिल्मों के बारे में जो आदिवासियों के जीवन का सही चरित्र-चित्रण करती है।

1. वैली ऑफ गोट्स

यह डॉक्यूमेंटरी केरला के पल्लकड़ जिले में बसे इरुला आदिवासियों की जीविका को दर्शाती है। यहां के आदिवासियों का मुख्य काम बकरियों का पालन है।

ये दो स्वदेशी नस्लें अट्टाप्पदी ब्लैक और मलाबारी बकरियां चराते हैं। ये दोनों नस्ल आदिवासियों द्वारा सालों से बनाई गई हैं |आदिवासियों द्वारा वर्षों तक पहाड़ी इलाकों में चराने से इन बकरियों की कठोर वातावरण में भी रहने की क्षमता बन गई है। इनमें गर्म और उमस मौसम के अलावा बीमारियों से लड़ने की भी क्षमता होती है।

उन्नीकृष्णन नायर द्वारा निर्देशित फिल्म वैली ऑफ गोट्स

इनका दूध ज़्यादा नहीं होता इसलिए इन बकरियों का पालन उनके मांस के लिए किया जाता है। इनका मांस  बाकी नस्ल से बहुत ज़्यादा पौष्टिक होता है। इरुला आदिवासियों में बकरी पालन जीविका का मुख्य स्रोत है लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि क्रॉस ब्रीडिंग से इन स्वदेशी बकरियों को खतरा हो रहा है। आदिवासियों के पास उनके  ही स्वदेशी नस्ल के बकरियों की कमी होने लगी है। शुद्ध नस्ल केवल सरकारी पशुखानों में मिलते हैं।

सरकार भी सहायता स्कीमों के तहत गरीबों को जो बकरियां देती है, वे शुद्ध नस्ल की नहीं होतीं। इस क्रॉस ब्रीडिंग से आदिवासियों की कमाई और जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है। यह डॉक्यूमेंटरी बकरियों और इरुला आदिवासियों के सम्बन्ध को दिखाता है।

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2018  में बनी इस डॉक्यूमेंटरी को दिल्ली में आयोजित 7वीं वुडपेकर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी प्रदर्शित किया गया था। फिल्म के निर्माता उन्नीकृष्णन नायर ने 1000 से भी ज़्यादा विज्ञानों पर डॉक्यूमेंट्री बनाई है। इन्होंने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर खिताब जीता है। बकरियां इरुला आदिवासियों के  प्रथा और औषधि का अहम भाग हैं। बदलते और गर्म होते वातावरण से जब पूरे राज्य के बकरी पालकों को मुश्किल होती है, तब इन स्वदेशी बकरियों की मांग बहुत बढ़ जाती है लेकिन इन आदिवासियों से स्वदेशी बकरियां  बहुत कम दाम में खरीदी जाती हैं। आदिवासियों ने इस मुसीबत को हटाने के लिए एक “बकरी गाँव” की स्थापना की। सारे आदिवासी यहीं आकर अपनी बकरियों को एक ही दाम पर बेचते है । इससे उन्हें बकरियों की सही कीमत मिलने लगी है ।

फ़िल्म की ख़ास बात

ये आदिवासियों के जीवन और जीविका को बहुत नज़दीक से दिखाता है। भले ही ये डॉक्यूमेंटरी प्रस्तुत समय की है लेकिन सुंदर दृश्यों और मधुर गीत के साथ ही ये हमें आदिवासियों के जीवन के सफर में ले जाता है। यह दर्शाती है कि कैसे उन्होंने वर्षों से बकरियों को पहाड़ों में चराकर विकसित किया लेकिन आज वे खुद उनसे वंचित रह है। इरुला आदिवासियों के साधारण जीवन, परम्पराओं के बारे में और मार्केट और बदलते समय का आदिवासियों पर असर जानने के लिए यह फिल्म ज़रूर देखें।

2. अपोकैलिपटो

मेल गिब्सन द्वारा निर्देशित 2006 की यह फिल्म, युकैंटन, मेक्सिको में सन 1502 में बसी है। इस फिल्म में एक मेसी अमेरिकन आदिवासी के सफर को दिखाया गया है जब उसे अंत की ओर अग्रसर मायान सभ्यता के लोगों द्वारा बली के लिए पकड़ लिया जाता है।

उसे जगुआर पॉ के नाम से जाना जाता है उसके गाँव के सारे पुरुषों को बंदी बना लिया जाता है और महिलाओं और बच्चों को मार दिया जाता है लेकिन जगुआर किसी तरह अपने बच्चों और गर्भवती पत्नी को एक कुएं  में सुरक्षित रखता है। उसका परिवार उसके लिए बच निकलने की एक प्रेरणा होती है।

फिल्म अपोकैलिपटो

इस फिल्म में नेटिव अमेरिकन और मेक्सिकन के आदिवासी अभिनेताओं, रूडी यंगब्लड, राओल ट्रूजिलो, मातृ सेरबुको, दलिया हर्नांदेज इत्यादि को विभिन्न किरदारों में दिखाया गया है। उनका अभिनव दर्शकों के रोंगटे खड़े  कर देगा। हिंसा के अलावा इस फिल्म ने इंसानों की मुख्य लालसाओं जैसे परिवार, अपनापन और जज़्बे को बखूबी दिखाया है। जगुआर अपनी टूटती हुए शक्ति को यह बोलकर जिंदा करता है,

ये मेरा जंगल है, और मैं इस जंगल का जगुआर हूं।

इस वाक्य से वह एक बहुत गहरा संदेश देता है, जो आदिवासियों के वर्तमान संघर्ष में बहुत सटीक बैठता है। अवैध रूप से जल, जंगल और ज़मीन छीने जाने पर यह आदिवासियों को जगाता है कि जंगल आदिवासियों का है। फिल्म के अंतिम दृश्य में जगुआर के तटीय घर पर स्पेनिश जहाज़ों के आगमन को दिखाया जाता है। यह आदिवासियों के इतिहास में कोलोनायज़ेशन की शुरुआत को दर्शाता है लेकिन जगुआर अपने जंगल, परिवार और ट्राइब की रक्षा करने को तैयार है।

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इस फिल्म में आदिवासियों के जंगल के ज्ञान को भी दिखाया गया है। जगुआर को ज़हरीले जानवरों की समझ है, जो वह दुश्मनों को मारने के लिए उपयोग करता है। वहीं, उसकी पत्नी भी अपने बच्चे के घाव को लाल चीटीयों के डंक से ठीक करती है। यह फिल्म आदिवासियों के पेड़-पौधों, जानवरों, पक्षियों और नदियों के जटिल ज्ञान के प्रति सम्मान जगाता है। निर्माता, मेल गिब्सन कहते हैं कि इनकी अलग भाषा दर्शकों को इस फिल्म को निश्पक्ष रूप से देखने देती है।

फ़िल्म की ख़ास बात

यह फिल्म जंगल और आदिवासियों का सम्मान करना सिखाता है। फिल्म का संदेश है कि अपने हकों के लिए अंतिम क्षण तक लड़ने से जीत ज़रूर मिलती है। कोई भी समुदाय जिन्हें उनके हक और अधिकार से वंचित किया जा रहा है, वे इससे प्रेरणा ले सकते है।

3. आदिवासी ट्रांस व्यक्ति पर आधारित फिल्म

यह फिल्म एक आदिवासी ट्रांस व्यक्ति के बारे में है। इस फिल्म के किरदार गुलिकन और उसकी पत्नी माधी केरला के नीलंबुर के थेक्कडी  आदिवासी हैं। गुलिकन का पुरुष शरीर है लेकिन वे खुद को औरत मानते हैं। वे इस प्रकृति को छिपाते नहीं हैं, जिस कारण गाँव वासी उसे परेशान भी करते हैं। माधी के गैर शादीशुदा संबंध जानकर गुलिकन हताश हो जाते हैं। उसे आदिवासी समाज से भी निकाल दिया जाता है। वे पास एक शहर चले जाते हैं लेकिन वहां भी उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता। यह फिल्म आदिवासी समुदाय के मुद्दों को जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे और ज़्यादा बढ़ाती है। ट्रांस लोगों  की स्वीकृति ही बहुत कम है, अगर उसपर “आदिवासी” पहलू जोड़ा जाए तो परिस्थिति और भी कठिन हो जाती है।

यह पूरे समाज में आए परिवर्तन को आदिवासी जीवन में ढालकर दिखता है। इस फिल्म ने  ट्रांसजेंडर, समलैंगिकता, नस्लवाद, महिलाओं और आदिवासियों की सामाजिक स्थिति और उत्पीड़न को बखूबी दिखाया है।

बहुसंख्यक फिल्मों में कई किरदार उनके सही कलाकारों द्वारा नहीं निभाया जाता। लेकिन इस फिल्म में गुलिकन का किरदार वायानाड के पनिया आदिवासी समुदाय के 24  साल के मनी ने निभाया  है। मनी ने 2006 के फिल्म फोटोग्राफर के लिए सर्वश्रेष्ठ बाल अभिनेता का राज्य पुरस्कार भी जीता था।

फ़िल्म की ख़ास बात

इस फिल्म के अभिनेता मनी ने खुद बहुत कठिन परिस्थितियों से गुज़रकर अपनी दूसरी फिल्म में अभिनय किया है। उनके अभिनव की सादगी दिलों को छू लेती है। साथ ही, फिल्म वर्तमान परिवेश में बहुत अनुकूल बैठती है।

आदिवासियों के मुद्दों को दूसरे समाजों के मुद्दों से अलग दिखाया जाता है। सेक्शुएलिटी और जेंडर ओरिएंटेशन का मुद्दा आदिवासी समाज के पहलू से नहीं सोचा गया है। यह फिल्म एक नया और ताज़ा दृष्टिकोण सामने लाती है।

4. नेम, प्लेस, एनिमल थिंग

इसे सर्वश्रेष्ठ अंथ्रोपॉलिजिकल /एथनोग्रफिक फिल्म के राष्ट्रीय खिताब से नवाज़ा गया है। बंगलुरु  और मैसूर शहर के कुछ किलोमीटर दूर बसा हुआ है हाक्की पिक्की आदिवासियों का स्लम। वे पहले जंगलों और उसके पास गाँव  में रहते थे लेकिन आज़ादी के बाद चले “विकास” के दौर में उन्हें शहर के बाहर बसाया गया। यह डॉक्यूमेंटरी उनके बारे में है। इन आदिवासियों ने एक दिलचस्प प्रथा अपनाई है। ये प्रथा ऐसी ही के नवजात शिशु का नाम ऐसे नाम, जगह, जानवर या चीज पर रखना होगा जो उनके दिमाग में बच्चे के जन्म के बाद पहली बाद आए।

आप यहां गवर्नमेंट, साइकिल, सर्विस, मैसूर पाक, राज कपूर जैसे नामों के व्यक्ति से मिलेंगे। डॉक्यूमेंटरी में बात करने वाले लोग अपने समुदाय के लोगों के नामों के बारे में बहुत अच्छे और हंसी से बात करते हैं। वे बहुत खुशी से बताते हैं,

जापान मर गया, अमेरिका मर गया, ब्रिटिश मर गया, कूपन ज़िंदा है।

यहां  उनका मानना है कि जीवन में खुश रहना महत्वपूर्ण है।

5. माय बंगलौर: पोट्रेट्स फ्रॉम हाक्की पिक्की

हाक्की पिक्की जंगल में पक्षियों का शिकार करते थे लेकिन शहर में आने के बाद वे अपने पारंपरिक रीतियों से वंचित हैं। एक कहता है, – जब हम शिकार पकड़ते थे, तब हम शिकारी थे; वरना हम भिखारी हैं।

उनकी पहचान उनके जंगल और परम्पराओं  से जुड़ी है, जिसे वे हटाए जाने के बाद शहर में नहीं महसूस करते। इनकी कॉलोनी पर खतरा मंडराने लगा जब इस कॉलोनी को सरकार ने हटाने का ऑर्डर दिया। लोगों को 1950 और 1960 में सरकार ने जंगलों और गाँव से निकालकर शहरों में रखा। हाक्की पिक्की कॉलोनी में लोग कहते हैं कि वे ज़्यादा खुश गाँव में ही थे। वहां वे शिकार करते थे और उसी  को पर्याप्त अनाजों के लिए बार्टर करते थे। वे बताते हैं कि कुछ नहीं मिलने पर भी वे पक्षियों का शिकार कर उसी से पेट भर लेते थे। लेकिन शहर में आने के बाद, दो पहर का खाना मिलना भी मुश्किल हो जाता है।

इसमें एक 11-14 साल की लड़की “मिस रोज़ा” प्रतिदिन बस लेकर शहर में बिक्री करती है लेकिन वहां भी उसे एक 5 फुट की जगह नहीं मिलती और पुलिस उसे वहां से हटा देती है।

उनकी  जिंदगी शहर में आकर संघर्ष और पीड़ा की हो गई है। राहत पाने के लिए हाक्की पिक्की लोग कुछ खुशी इन अतरंग नामों में खोजते है। इसके अलावा, वे राहत “तम्बाकू” में भी लेते हैं। वे कहते हैं कि लोग जब जन्म लेते हैं तब वे शराब पीते हैं, जब मरते हैं तो पीते हैं, शादी में पीते हैं। कार्ल मार्क्स ने कहाँ है, “धर्म लोगों की अफीम है।” यानी, मज़दूर इतने दुख और परेशानी में हैं कि धर्म ही उन्हें इस ग़म से निकाल सकता है। इसी प्रकार इनकी शराब, तम्बाकू और नाम अफीम है।

फ़िल्म की ख़ास बात

ये डॉक्यूमेंटरी हल्के मिजाज़ का है। इनमें लोगों की कहानियां, खुशी और सादगी दिल छू लेती है लेकिन ये डॉक्यूमेंटरी हाक्की पिक्की आदिवासियों के इस प्रथा से एक बड़े मुद्दे पर सोचने की लिए प्रोत्साहन देती है । वो है इनका सही पुनर्वास।

6. द गौडस मस्ट बी क्रेज़ी

1993 की इस फिल्म में कलाहरी रेगिस्तान के सान ट्राइब बदलते समय में भी से अपने आदिवासी तरीकों से जी रहे है। पर एक दिन, कोका कोला के इश्तहार के शूटिंग के लिए बाहर से लोग आते है और उनके हेलिकॉप्टर से एक बॉटल नीचे फेंकते है।

इस बॉटल में आदिवासी पहले तो बहुत रुचि दिखाते हैं, इसकी पूजा करते हैं, इससे संगीत बनाने की कोशिश करते हैं और इसकी खुशी मनाते हैं लेकिन कुछ समय बाद वे उसमें एक चिड़िया फंस जाती है और इसे निकालने के लिए समुदाय का एक व्यक्ति उन इश्तहार वाले लोगों को तलाशने निकलता है और हॉन्ग कॉन्ग पहुंचता है ।

फ़िल्म की ख़ास बात

आदिवासियों को क्रूर और जंगली चरित्र  का माना जाता है लेकिन यह फिल्म इन गलतफहमियों को खत्म करती है। ये कुछ फिल्म या डॉक्यूमेंटरी हैं जिनमें आदिवासियों का सही रूपांतरण किया गया है। यह स्टरियोटाइप और रूढ़िवादी सोच को हटाती है।अगर आपको भी ऐसे कोई और फिल्में पता हैं, तो हमें ज़रूर बताएं।

और पढ़ें : मैं आपकी स्टीरियोटाइप जैसी नहीं फिर भी आदिवासी हूं


यह लेख दीप्ती मेरी मिंज ने लिखा है, जिसे इससे पहले यूथ की आवाज़ में  प्रकाशित किया जा चुका है।

तस्वीर साभार : गूगल

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