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पिछले कई दिनों से नागरिकता संशोधन कानून के विरोध और समर्थन, दोनों में ही देश की जनता उलझी हुई है और इस बीच कुछ ऐसे ज़रूरी मुद्दे भी हैं, जिनसे सत्ता की तरफ़ से ध्यान हटाया जा रहा है। मुख्यधारा की मीडिया में इन मुद्दों को लेकर शायद ही कोई चर्चा की गई हो, सोशल मीडिया भी आए दिन नए ट्रेंड्स में उलझा हुआ है। ऐसे हालात में बेहद ज़रूरी है कि इन मुद्दों पर बात की जाए –

भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 5 साल के न्यूनतम स्तर पर आ चुकी है। जनवरी-मार्च तिमाही में जीडीपी की दर 5.8 फ़ीसद थी। आरबीआई ने भी अपनी मौद्रिक समिति की बैठक में भारतीय अर्थव्यवस्था के जीडीपी ग्रोथ रेट के पूर्वानुमान को घटाकर 6.9 फ़ीसद कर दिया है। नोटबंदी से कोई आर्थिक सुधार नहीं हुआ, बल्कि आर्थिक संकट बढ़ा ही है। जीएसटी का भी बाज़ार पर दुष्प्रभाव देखा गया है।

1. आर्थिक व्यवस्था की बिगड़ती हुई स्थिति

हाल ही में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट जारी की थी, जिसके मुताबिक़ रियल्टी क्षेत्र को दिए गए कर्ज़ के मामले में एनपीए का अनुपात जून 2018 के 5.74 की तुलना में जून 2019 में 7.3 फ़ीसद हो गया है।सरकारी बैंकों की हालत और भी ख़राब है क्योंकि ऐसे कर्ज़ के मामले में उनका एनपीए 15 फ़ीसद से बढ़कर 18.71 फ़ीसद हो गया है।

2. बेरोज़गारी

थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) की तरफ़ से हाल ही जारी किए गए डेटा के मुताबिक, शहरी बेरोज़गारी दर नवंबर में 8.89 फ़ीसद था, लेकिन दिसंबर में 8.91 फ़ीसद तक पहुँच गया। जीडीपी ग्रोथ की खराब स्थिति के चलते पर्याप्त मात्रा में नौकरियाँ नहीं बढ़ रही हैं, और बेरोज़गारी छलांग लगा रही है। भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर दिसंबर में बढ़कर 7.13 फ़ीसद हो गया, जबकि नवंबर में 6.82 फ़ीसद था।

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3. विश्वविद्यालय की बढ़ती हुई फीस

तस्वीर – satyagrah

जेएनयू, आईआईटी से लेकर पत्रकारिता संस्थानों में बढ़ती हुई फीस चिंता का विषय है। इन संस्थानों में निम्न मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों का दाख़िला लेना बहुत ही मुश्किल होता है और अगर फीस बढ़ती जाएगी तो समान शिक्षा के अधिकार से वे वंचित रह जाएँगे।

4. कश्मीर में हालात

5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान खत्म होने की घोषणा के बाद, केंद्र सरकार ने एसएमएस और इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी लगा दी गई थी। कश्मीर में हुए यह इंटरनेट शटडाउन अब तक का सबसे लम्बा शटडाउन तो था ही, लेकिन फोर्ब्स की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में भारत इंटरनेट पर पाबंदी लगाने में सबसे आगे है। जनवरी 2016 से लेकर मई 2018 तक में भारत में लगभग 154 इंटरनेट शटडाउंस हुए हैं। जबकि पाकिस्तान में इसकी संख्या महज़ 19 रही।

यह बेहद चिंताजनक है कि देश का ध्यान इन मुद्दों से हटाए जाने में नागरिकता संशोधन कानून ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है!

इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2012 से लेकर 2017 तक हुए इंटरनेट शटडाउन में भारतीय अर्थव्यवस्था को क़रीब 21584 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है।

5. ट्रांस बिल के बाद नागरिकता संशोधन क़ानून में ‘पहचान’ का सवाल

तस्वीर – samacharjagat

ट्रांसजेंडर समुदाय के विरोध के बावजूद ट्रांस बिल पास किया जा चुका है। इस बिल में कई सारी कमियाँ थीं, जैसे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के यौन शोषण के मामलों में कम सज़ा, यह सुप्रीम कोर्ट के 2014 के नालसा फैसले के खिलाफ भी है, जिसमें ट्रांसजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी गई थी और कहा गया था कि व्यक्ति को अपना जेंडर निर्धारण करने का हक है। लेकिन इस बिल में ट्रांसजेंडर को अपने जेंडर का सर्टिफिकेट कलेक्टर से लेना होगा। सोचने वाली बात यह है कि जेंडर का सर्टिफिकेट लेना सिर्फ उनके लिए ही क्यों ज़रूरी माना गया? क्या यह भेदभाव नहीं है? क्या किसी पुरुष या स्त्री से इस तरह का सर्टिफिकेट माँगा जा सकता है? अगर नहीं, तो इसका साफ मतलब है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ भेदभाव किया जा रहा है जो कि अमानवीय है।

नागरिकता संशोधन कानून भी ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए दोहरी मार की तरह है, वे पहले ही अपनी पहचान के साथ सम्मान से जीने का हक़ हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन अब उनके सामने उनकी ‘पहचान’ को साबित करने का ही संकट आ चुका है।

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इन मुद्दों के अलावा, देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, धड़ल्ले से बिकता एसिड, साइबर क्राइम्स, जातिगत भेदभाव और हिंसा के मामले, विकलांगता को लेकर बड़े स्तर पर कोई विमर्श या विकलांगजन की असुविधाओं को कम करने के लिए किसी तरह की योजना को लेकर बात न किए जाने जैसे कई गंभीर मुद्दे हमारे सामने हैं।

यह बेहद चिंताजनक है कि देश का ध्यान इन मुद्दों से हटाए जाने में नागरिकता संशोधन कानून ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है! हम 2020 में जी रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश सत्ताधारियों के लिए आज देश के विकास से ज़रूरी, धार्मिक उन्माद हो गया है। और इस उन्माद में सबसे ज़्यादा नुकसान उठाने वाले निम्न और मध्यवर्ग के नागरिक ही हैं। अच्छी शिक्षा, नौकरी, स्वास्थ्य सेवाएँ आदि उनकी पहुँच से अब भी उतनी ही दूर रहेंगी जितनी कि सालों से रहती आयीं हैं। यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जो आज़ादी के बाद से अब तक नहीं बदल सकी।


तस्वीर साभार : indiatvnews

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