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शराब और ड्रग्स का नशा एक इंसान की पूरी ज़िंदगी ख़राब कर देता है। उसके शरीर को अंदर से ख़त्म करने के साथ-साथ उसे मानसिक तौर पर पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। पर यह नशा उस इंसान के लिए ही नहीं, पूरे समाज के लिए एक ख़तरा है। इसकी वजह से न जाने कितने घर टूटे हैं। कितनी महिलाओं को हिंसा का शिकार होना पड़ा है। इस नशे के ख़िलाफ़ ही एक आंदोलन बना जिससे हम जान पाए कि कैसे इसका प्रभाव एक पूरे समाज पर पड़ता है। ये था ‘अरक विरोधी आंदोलन।’

जनवरी 1990। आंध्र प्रदेश में राष्ट्रीय साक्षरता आंदोलन पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा था। गांव-गांव में वयस्क साक्षरता अभियान शुरू हुए थे उन वयस्क लोगों के लिए जो कभी स्कूल नहीं गए। इन साक्षरता अभियानों का एक बड़ा हिस्सा थीं महिलाएं, जिन्होंने या तो पढ़ाई की ही नहीं या कम उम्र में शादी हो जाने की वजह से पूरी नहीं कर पाईं।

इन अभियानों में हिस्सा लेने पर ये महिलाएं न सिर्फ़ पढ़ना-लिखना सीखीं, बल्कि उन्हें अपनी आवाज़ मिली। एक ऐसी जगह मिली जहां वे बेख़ौफ़ होकर अपने विचार व्यक्त कर सकती थीं। अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुना सकतीं थीं। यहीं पर वे एक-दूसरे के साथ तक़लीफ़ें साझा करतीं। उनकी तक़लीफ़ें भी लगभग एक जैसी थीं। किसी का पति उसे पीट रहा होता तो किसी के पति ने घर छोड़ दिया होता। बातों बातों में पता चला कि सबकी तक़लीफ़ों का एक मूल कारण है – शराब का नशा।

उस वक़्त इन गांवों में देसी शराब या ‘अरक’ का उत्पादन और बिक्री बहुत प्रचलित थे। शासन व्यवस्था ही कुछ ऐसी हो गई थी कि जो जितना शराब बनाए, उसकी उतनी ताक़त। शराब बनाने और बेचनेवाले इतने अमीर हो गए थे कि शराब के धंधे के अलावा स्कूल, सिनेमा हॉल और सांस्कृतिक संस्थाएं भी चलाने लगे। साल 1991-92 में बात ऐसी हो गई कि एक परिवार की सालाना तनख़्वाह का 45 फ़ीसद शराब ख़रीदने में जाता था। और सबसे ज़्यादा शराब सेवन करते थे गांव के मर्द। यही मर्द रोज़ नशे में धुत्त होकर अपनी बीवियों और बच्चों को पीटते। शराब खरीदने के लिए बीवी से पैसे चुराते या घर का कीमती सामान बेच देते। काम पर जाना बंद कर देते जिससे घर में पैसे आना बंद हो जाता और जिसका असर पूरे गांव की आर्थिक स्थिति पर पड़ता जब सारे मर्द काम करने के बजाय दिनभर नशे में डूबे रहते।

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औरतों ने फैसला किया कि बहुत हो चुका। इस समस्या का हल होना चाहिए। साल 1992 में शुरू हुआ ‘अरक-विरोधी आंदोलन। ‘इस आंदोलन की सिर्फ़ एक मांग थी। पूरे राज्य में शराब के उत्पादन पर रोक लगाई जाए। इसकी शुरुआत हुई नेल्लोर ज़िले के डुबागुंता गांव में हुई जहां महिलाओं की भीड़ों ने ज़बरदस्ती शराब की दुकानें बंद करवाईं और शराब बनानेवाली सारी सामग्री बर्बाद कर दी। धीरे धीरे ये आंदोलन पूरे ज़िले में फैलने लगा। क़रीब 5000 गांवों की औरतों ने मीटिंग बुलाई जहां डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को शराब की बिक्री रोकने के लिए खत लिखा गया।

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डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और सरपंच के समर्थन से अरक विरोधी आंदोलन पूरे राज्य में फैल गया। अब लड़ाई सिर्फ़ शराब विक्रेताओं के ख़िलाफ़ ही नहीं, बल्कि सरकारी अफसरों और पुलिस कर्मचारियों के ख़िलाफ़ भी थी, जो शराब माफिया के साथ मिले हुए थे। आंदोलनकारियों ने सरकार से भी सवाल किया कि जहां बिजली, पानी जैसी सुविधाओं का अभाव था, वहां शराब इतनी आसानी से क्यों मिल जाता था? आंदोलन कुछ हद तक कामयाब भी हुआ जब उनकी प्रयासों से 17 बार शराब की नीलामियां बंद की गईं। फिर भी राज्य सरकार प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार नहीं थी क्योंकि शराब की बिक्री से अच्छा ख़ासा पैसा मिलता था। सरकार ने ये भी कहा कि शराब की बिक्री से मिले पैसे सामाजिक कल्याण के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। पर आंकड़ों से पता चला कि इन पैसों में से बहुत छोटी रकम ही सामाजिक उत्थान के लिए खर्च की जाती थी।

ये आंदोलन जितना बड़ा होता गया, धीरे-धीरे उसका राजनैतिकीकरण भी होता गया। अलग-अलग विचारधाराओं के राजनैतिक दल इस आंदोलन को मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए एक हुए। मज़े की बात है कि जब मार्क्सवादी संगठन ‘प्रोग्रेसिव विमेंस आर्गेनाइजेशन’ ने आंदोलन के समर्थन में मोर्चा निकाला, तब उनका साथ दिया दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी ने। हर पार्टी, हर विचारधारा के लोग, जो आमतौर पर एक दूसरे के मुंह नहीं लगते, इस एक आंदोलन में कंधे से कंधे मिलाकर लड़े।

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उनके साथ कई एनजीओ और नारीवादी संगठन भी शामिल हुए, जिनमें थे नेल्लोर में स्थित ‘जागृति’ और चित्तूर में स्थित ‘जन विज्ञान वेदिका।’ ‘जागृति’ ने कोर्ट में आंदोलनकारी महिलाओं के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए पीआईएल दर्ज किया। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को ख़त लिखे गए। न जाने कितनी औरतें जान की बाज़ी लगाकर सड़क पर उतर आईं, जहां उन्होंने बैरिकेड तोड़े और पुलिस द्वारा शारीरिक हमला के शिकार तक हुईं।

आंदोलन के शुरू होने के पूरे एक महीने बाद, 1 अक्टूबर 1992 को राज्य सरकार ने दबाव में आकर शराब पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके कुछ ही समय बाद केरला की सरकार ने भी यही किया। बाद में इस नियम में थोड़ा परिवर्तन लाया गया। देसी शराब पर प्रतिबंध रहा पर कुछ नियमों के साथ विदेशी शराब की बिक्री पर अब प्रतिबंध नहीं है।

अरक विरोधी आंदोलन इसबात का अच्छा उदाहरण है कि किस तरह शिक्षा औरतों को सशक्त बनाती है और कैसे पढ़ना-लिखना हमें अपने अधिकारों से वाक़िफ़ कराता है। अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए एक मंच और मौक़ा देता है। और किस तरह हमें अपने हक़ के लिए लड़ मरने के लिए प्रेरित करता है। ये आंदोलन उन सभी औरतों के लिए एक मिसाल है जो इंक़लाबी ख्यालात की हों और इंसाफ़ के लिए लड़ने को तैयार हो।

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तस्वीर: श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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