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‘सत्याग्रह’ शब्द को हम आमतौर पर गांधी से जोड़ते हैं। पर भारतीय इतिहास में ऐसे कई और ज़रूरी आंदोलन हुए हैं जिन्हें उनके अहिंसात्मक तरीके की वजह से सत्याग्रह कहा गया है। इनमें से एक है केरला का पहला जातिवाद-विरोधी सामाजिक आंदोलन। वैकोम सत्याग्रह। एक आंदोलन जो दलितों के मंदिर में प्रवेश करने के अधिकार की मांग के लिए था। मनुवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ ये एक लंबी लड़ाई थी। एक ऐसी लड़ाई जिसका लक्ष्य था दलितों के लिए बराबरी सिर्फ समाज की ही नहीं बल्कि भगवान की नज़रों में भी। क्या था वैकोम सत्याग्रह? इसकी शुरुआत कहाँ से हुई? आइये जानते हैं।

30 मार्च 1924। केरला में कोट्टायम ज़िले का वैकोम शहर। तीन दोस्त, कुंजप्पी, बहुलियन और वेणियिल गोविंद पणिकर हाथ में हाथ डालकर एक बोर्ड की तरफ़ चलते नज़र आते हैं। बोर्ड पर लिखा है, ‘एरावा और अन्य छोटी जातियों का प्रवेश निषेध है।’ जहां ये बोर्ड लगा हुआ है वो श्री महादेव मंदिर तक जानेवाली चार सड़कों में से एक है। मंदिर के अंदर तक जाने की इजाज़त सिर्फ सवर्णों या ऊंची जाति के लोगों को है और उसे घेरती चारों सड़कों पर किसी दलित की परछाई तक पड़ना दंडनीय अपराध है।

तीनों को देखते ही वहां पैट्रोल करता हुआ पुलिसवाला आगे आता है। उनसे उनकी जाति पूछता है। सबसे पहले बहुलियन कहते हैं कि वे एरावा जाति के हैं। कुंजप्पी अपनी जाति पुलियन बताते हैं। और गोविंद नायर हैं। गोविंद के अलावा बाकि दोनों तथाकथित ‘छोटी जात’ के हैं। दलित हैं। पुलिसवाला कहता है कि गोविंद के अलावा कोई भी आगे नहीं जा सकता पर तीनों इस बात पर अड़े रहते हैं कि या तो उन सबको जाने दिया जाए, या किसी को नहीं। उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता है।

तीनों के गिरफ़्तार होने के बाद और भी लोग वहां जमा होने लगते हैं । वे सभी ख़ुद को ‘सत्याग्रही’ बताते हैं और मंदिर के रास्तों को दलितों के लिए खुलवाने की मांग करने लगते हैं।। धीरे धीरे इनकी संख्या बढ़ती जाती है । वैकोम सत्याग्रह आंदोलन की बात चारों तरफ़ फैल जाती है।

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इस आंदोलन की शुरुआत की थी दलित क्रांतिकारी टी. के. माधवन और उनके सवर्ण दोस्त केशव मेनन और के. केलप्पन ने। जनवरी 1924 में उन्होंने ‘छुआछूत-विरोधी समिति’ बनाई जिसका लक्ष्य था बाकी सभी जगहों के साथ साथ धार्मिक संस्थानों में भी दलितों को प्रवेश का अधिकार दिलवाना, क्योंकि ‘भगवान की नज़रों में सभी समान हैं। इन्हीं टी. के. माधवन ने त्रावणकोर सभा में दलितों को मंदिर प्रवेश का हक़ दिलाने के लिए अर्ज़ी पेश की थी और इसी समिति ने ये आंदोलन बुलाया, जिसका पहला लक्ष्य था श्री महादेव मंदिर। सभा में माधवन की अर्ज़ी स्वीकार नहीं हुई थी और ऐसी मांगें करने पर उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया था। अर्ज़ी पेश करना जब असफल हुआ तब माधवन और उनके साथियों ने सत्याग्रह आंदोलन का आयोजन करने का फैसला किया। साधारण दलित जनता के साथ कई नेता और क्रांतिकारी भी इस आंदोलन में शामिल हुए, जिनमें दक्षिण भारत के मशहूर दलित क्रांतिकारी और समाज सुधारक ई. वी. रामस्वामी ‘पेरियार’ भी थे। सभी आंदोलनकारियों में से पेरियार अकेले थे जिन्हें दो- दो बार गिरफ़्तार किया गया, जिससे उनका नाम ‘वैकोम वीरार’ या ‘वैकोम का वीर’ पड़ा।

इस आंदोलन की एक खासियत थी इसमें शामिल महिलाएं। उस दौर में राजनैतिक जीवन में महिलाओं ने सक्रिय होना शुरू ही किया था।

सत्याग्रहियों की आबादी बढ़ती रही और वे सभी मंदिर के रास्तों के सामने बैठ धरना देने लगे। सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए गए और पहरा देने के लिए पुलिस और सेना को बुला लिया गया । बैरिकेड के सामने ही आंदोलनकारियों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। मंदिर के अधिकारियों ने आंदोलन को दबाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। भूख हड़ताल करनेवालों पर बेरहमी से अत्याचार किया गया। उनकी आंखें जला दी गईं। उन्हें पानी में डुबो देने की कोशिश की गई। उन पर मारपीट की गई । पर ये आंदोलन ऐसे कुचले जानेवाला नहीं था। भूख हड़ताल जारी रहा और रोज़ इसमें नए लोग भी शामिल होते रहे।

इस आंदोलन की एक खासियत थी इसमें शामिल महिलाएं। उस दौर में राजनैतिक जीवन में महिलाओं ने सक्रिय होना शुरू ही किया था और ये सत्याग्रह महिलाओं का पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने का एक उदाहरण था। इनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं नारायणी अम्मा, तिरुमलई अम्मा, मीनाक्षी अम्मा और नागम्माई के। ये सभी आंदोलन के मुख्य नेताओं की पत्नियां थीं और अपने पतियों के साथ वे भी हड़ताल पर बैठीं और अनगिनत ज़ुल्म सहीं। पर अफ़सोस, इतिहास की किताबों ने इनके साथ न्याय नहीं किया और इनकी पहचान सत्याग्रहियों की पत्नियां होने तक ही सीमित रह गई।

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आंदोलन दलितों के अधिकारों के लिए होने के बावजूद भी कई सवर्णों ने इसका समर्थन किया। कई सवर्ण हिंदू भी छुआछूत के ख़िलाफ़ थे और चाहते थे कि दलितों को वही अधिकार मिलें जो सवर्णों को प्राप्त हैं। इन प्रगतिशील सवर्णों ने वैकोम से राजधानी तिरुवनंतपुरम तक मोर्चा शुरू किया और वहां की महारानी, सेतुलक्ष्मी बाई के सामने 25,000 हस्ताक्षरों का पेटिशन जमा किया, जिसमें दलितों के लिए श्री महादेव मंदिर के रास्ते खुलवाने की मांग थी। रानी ने सभा में ये प्रस्ताव रखा मगर इसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। आंदोलनकारियों के हौसले पर इसकी वजह से गहरी चोट पहुंची। पर अपना हक़ उन्हें हर हाल में अदा करना ही था। चाहे जैसे भी हो।

अब उन्होंने दूसरा तरीक़ा अपनाया। बहिष्कार का। पूरे राज्य में सवर्ण हिन्दुओं का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार शुरू हुआ। ये बहिष्कार पूरे एक साल तक चलता रहा जिसके बाद, 1925 में मंदिर की चार सड़कों में से तीन दलितों के लिए खुलवा दी गई। चौथी सड़क फिर भी सिर्फ सवर्णों के लिए खुली रही। कुछ दस साल बाद , 1936 में, ये सड़क भी सभी जातियों के लिए खुलवा दी गई जब त्रावणकोर के महाराजा ने ‘मंदिर प्रवेश उद्घोषणा’ जारी की, जिसके तहत दलितों को मंदिरों में जाने की इजाज़त दी गई।

वैकोम सत्याग्रह इस बात का उदाहरण है कि कैसे समाज को अहिंसात्मक तरीके से बदला जा सकता है। किस तरह एक आंदोलन बगैर हिंसा या ज़बरदस्ती के एक समाज और उसके क़ानूनों को बदल सकता है। जातिवाद और छुआछूत की बीमारी आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं, पर ऐसे कई आंदोलनों की वजह से इसका असर कम हुआ है और दलितों को उनके सामाजिक अधिकार मिले हैं। हमें ज़रुरत है इससे सीख लेने की और जातिवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए और कोशिश करने की।

Also read in English: The Vaikom Satyagraha: Kerala’s First Anti-Caste Movement


तस्वीर साभार : Alchetron

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