इंटरसेक्शनल अग्नि परीक्षा के बहाने इसके मूल मुद्दे ‘वर्जिनिटी’ की बात !

अग्नि परीक्षा के बहाने इसके मूल मुद्दे ‘वर्जिनिटी’ की बात !

पवित्रता की अग्नि परीक्षा आदिकाल से अब आधुनिक काल तक महिलाएँ देती आ रही हैं। लेकिन परीक्षा के तौर तरीके में अब कई बदलाव हो गया है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब सीता जी रावण की कैद से मुक्त होकर वापिस आयोध्या आयी तो प्रजा में उनकी पवित्रता को लेकर कई सवाल उठने लगे, जिसके चलते उन्हें अपने पवित्र होने का परिणाम अग्नि-परीक्षा देकर करना पड़ा। पवित्रता की अग्नि परीक्षा आदिकाल से अब आधुनिक काल तक महिलाएँ देती आ रही हैं। लेकिन परीक्षा के तौर तरीके में बदलाव हो गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर महिलाओं के सन्दर्भ में पवित्रता का मतलब क्या है? दूसरा सवाल यह भी है कि महिलाओं की पवित्रता का मालिक और रक्षक पुरुष ही क्यों है ?

महिलाओं के संदर्भ में ‘पवित्रता’ का मतलब महिलाओं की यौनिकता से जोड़कर देखते है। पितृसत्तात्मक सोच के अनुसार ऐसा माना जाता है कि किसी भी महिला की यौनिकता पर सिर्फ और सिर्फ उसके पति का ही हक है। बचपन से ही महिलाओं का भी इसी सोच के साथ पालन पोषण होता है । यही कारण है कि महिलाओं की यौनिकता को पवित्रता से जोड़कर देखा जाता है । यह इसलिए भी किया जाता है ताकि वो पितृसत्ता के द्वारा बनाने गए दायरों से बाहर ना जाये ।  इसलिए अच्छी औरत और पवित्रता को आड़ बनाकर महिलाओं को पितृसत्तात्मक के जाल में फँसाकर रखा जाता है  । अगर यौनिकता को पुरुषों के जोड़कर देखते है तो विषमलैंगिक पुरुषों में  ऐसा कोई बंधन नजर नही आता । बल्कि विषमलैंगिक पुरुषों में यौन-सम्बन्धों में पुरुष जितना सक्रिय और अनुभवी होगा उतना ही पक्का मर्द माना जाता हैं। हालांकि समलैंगिक पुरुषों के संदर्भ में  पितृसत्ता के दायरें कड़े निर्देशों साथ नजर आते है । इस कारण ही समलैंगिक पुरुषों को घर और बाहर हिंसा का सामना करना पड़ता है। 

कंजरभाट समुदाय के रीति-रिवाजों में वर्जिनिटी टेस्ट की एक परम्परा है जिसमें पूरी पँचायत के सामने सफ़ेद चादर पर खून के  दब्बे दिखाकर यह साबित करना पड़ता है कि लड़की वर्जिन थी। शादी के बाद दूल्हे से पंचायत द्वारा यह पूछा जाता है “तुम्हे जो माल दिया गया वो कैसे था।” अगर लड़की वर्जिन थी वो दूल्हा  तीन बार ‘खरा’ बोलता है। अगर लड़की वर्जिन नही थी तो लड़का तीन बार ‘खोटा-खोटा’ बोलता है । लड़की के वर्जिन ना होने पर लड़की के परिवार व रिश्तेदार उसके साथ हिंसा करते है। कंजरभाट समुदाय को समुदाय द्वारा बनाए गए क़ायदे कानून को मानना पड़ता है । अगर कोई व्यक्ति इसका पालन नही करता तो उनका समुदाय द्वारा बहिष्कार कर दिया जाता है । इस तरह यहाँ पितृसत्तात्मक सोच के चलते महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण किया जाता है।

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यह सिर्फ किसी एक समुदाय की बात नही है क़रीब सभी समुदाय में अलग-अलग तरीको से यौनिकता पर नियंत्रण किया जाता है । सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि कैसे मुनाफ़ा कमाने वाला बाजार इस  तरह के नियंत्रण का इस्तेमाल अपने बिजनस को चमकाने के लिए करता हैं । इसका एक उदाहरण है 18 अगेन प्रोडक्ट के नाम से एक विज्ञापन है । इस विज्ञापन में दिखाया गया है कि 18 अगेन प्रोडक्ट को इस्तेमाल करने से महिलाएँ वर्जिन जैसा महसूस करती है । यह प्रोडक्ट इसबात को सिद्ध करता है कि कैसे इस तरह की परम्परों का बाज़ारीकरण होता है ।

पितृसत्तात्मक दबाव के चलते ना जाने कितनी लड़कियों को इस तरफ की सर्जरी से गुजरना पड़ता है जो उनके स्वास्थ्य पर एक बुरा असर डालती है ।

गौरतलब है कि सिर्फ 18 अगेन ही एक मात्र उदाहरण नही हैं। अगर हम गूगल सर्च इंजन में देखे तो ऐसे अनेको उदाहरण हमारे सामने आ जाएंगे । आज विज्ञान के युग में भी पितृसत्तात्मक सोच इतनी हावी है कि सर्जरी के ज़रिए ‘हायमन’ बनाया जा सकता है। ऐसी बहुत सी लड़कियाँ है जो किसी ना किसी कारण से वर्जिन नहीं है। वो कारण खेलकूद या अन्य कोई  शारीरिक श्रम या सेक्शुअल सक्रियता भी हो सकता है ।  सामाजिक दवाब के चलते बहुत सारी लड़कियाँ हाइमेनोप्लास्टी या हाइमन सर्जरी करवाती है। हाइमेनोप्लास्टी या हाइमन सर्जरी एक ऐसी सर्जरी है जिसमें टूटी हुई झील्ली को फिर से बना दिया जाता हैं। प्राइवेट हॉस्पिटल इस सर्जरी के लिए लगभग 40 हज़ार से 60 हज़ार रु तक ऐंठते है । इस सर्जरी के लिए ज्यादातर वो लड़कियाँ जाती है जिनकी जल्द ही शादी होने वाली है। गौरतलब है कि बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे शहरों से भी लड़कियां इस सर्जरी के लिए जा रही है। पितृसत्तात्मक दबाव के चलते ना जाने कितनी लड़कियों को इस तरफ की सर्जरी से गुजरना पड़ता है जो उनके स्वास्थ्य पर एक बुरा असर डालती है।

कंजरभाट समुदाय के कायदा कानून से लेकर  हाइमेनोप्लास्टी  तक हर जगह पितृसत्ता दण्ड का डर दिखाकर समाज  की लड़कियों और महिलाओं को अपने दायरों में रहने के लिए मजबूर करता आ रहा है।  इस डर का फायदा उठाकर बाज़ार विज्ञान का इस्तेमाल करने मुनाफ़ा कमा रहा है । ऐसे में सतत विकास का सपने को 2030 तक पूरा करना एक कल्पना मात्र ही हैं। जब तक पितृसत्ता का खौफ कायम रहेगा, तब तक सही मायनों में विकास नही हो सकता ।

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तस्वीर साभार : womenpla

About the author(s)

Roki is a feminist, trainer and blogger. His focus areas have been gender equality, masculinity, POSH Act and caste.

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