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श्रेया एक बीस साल की छात्रा है। कल रात से ही उसकी तबियत ख़राब लग रही थी। उसके पेट में थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी, जिसकी वजह से वो जल्दी सो गई। सुबह तक हालत और बिगड़ गई। पेट, पीठ और कमर में ज़ोरों का दर्द हो रहा था और उबकाई सी आ रही थी। शरीर भी थोड़ा गरम हो गया था, मानो बुखार आया हो। बिस्तर से उठते ही श्रेया को पता चला कि उसके पीरियड्स शुरू हो गए हैं और वो समझ गई कि उसकी बिगड़ी तबियत का उसी से संबंध है।

श्रेया के साथ जो हुआ वो एक बेहद साधारण चीज़ है और पूरी दुनिया में लगभग 40 फ़ीसद से 70 फ़ीसद महिलाओं की यही कहानी है। हर महीने पीरियड्स के पहले दिन या शुरुआत के कुछ दिनों में पेटदर्द, बदनदर्द, उलटी, दस्त जैसी तकलीफ़ें महसूस होना। विज्ञान की भाषा में इसे डिसमेनोरिया (dysmenorrhea) कहा जाता है और आम भाषा में हम इसे ‘पीरियड क्रैम्प्स’ या ‘पीरियड पेन’ के नाम से जानते हैं। पीरियड्स के वक़्त लगभग हर औरत को ही डिसमेनोरिया के थोड़े बहुत लक्षण महसूस होते होंगे पर इनमें से 10 फ़ीसद की हालत इतनी ख़राब हो जाती है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है और हर महीने पीरियड्स के दौरान वे अपनी रोज़ की ज़िंदगी जीने में नाकामयाब होती हैं।

डिसमेनोरिया दो तरह का होता है – प्राइमरी और सेकेंडरी। प्राइमरी डिसमेनोरिया, जो बहुत आम है, पीरियड्स के समय यूटेरस के संकुचन की वजह से होता है क्योंकि यूटेरस के संकुचित हो जाने से रक्त के बहाव में अवरोध उत्पन्न होता और वहां ऑक्सीजन भी प्रवेश नहीं कर पाता, जिसकी वजह से दर्द और तकलीफ़ होता है। ये तकलीफ़ सामान्य है और इसके पीछे कोई गंभीर बीमारी नहीं है। सेकेंडरी डिसमेनोरिया ज़्यादा गंभीर होता है और इसके कुछ लक्षण हैं पीरियड्स का अनियमित होना, सेक्स के दौरान दर्द होना, या पीरियड्स न होते हुए भी वजाइना से खून बहना। इसके कुछ कारण हो सकते हैं एंडोमेट्रीओसिस (यूटेरस में बननेवाले टिश्यू का बाहर तक फैल जाना), यूटेरस में फाइब्रॉइड्स या यूटेरस से संबंधित कोई भी ऐसी समस्या जिसका समाधान करने के लिए सर्जरी की भी ज़रूरत पड़ सकती है।

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प्राइमरी डिसमेनोरिया आमतौर पर टीनएज लड़कियों से लेकर 20 के आसपास की औरतों को होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, ये दर्द भी कम होता जाता है। पर सेकेंडरी डिसमेनोरिया के लक्षण ज़्यादातर 30 की उम्र के बाद नज़र आते हैं और इसका इलाज जल्दी नहीं किया गया तो ये और गंभीर हो सकता है, क्योंकि ज़्यादातर इसकी वजह कोई शारीरिक समस्या होती है।

‘ब्रिटिश मेडिकल जर्नल’ में छपे एक शोध के मुताबिक़ पीरियड्स की शुरुआत में होनेवाली इस तकलीफ़ की वजह से पूरे साल में एक औरत के नौ दिन बर्बाद हो जाते हैं। ये नौ दिन वे न स्कूल, कॉलेज या कार्यस्थल में जा पाती हैं, न घर का कोई काम कर पाती हैं। डॉक्टरों का ये कहना है कि कुछ औरतों को महीने के इन दिनों उतनी ही तकलीफ़ होती है जितनी एक हार्ट अटैक के पीड़ित को होती है और इसीलिए इस समय औरतों को अपनी सेहत का ख़ास ध्यान रखना चाहिए। अगर पीरियड्स के दौरान बहुत ज़्यादा तकलीफ़ हो रही है तो काम की चिंता किए बिना एक-दो दिन की छुट्टी ले लेनी चाहिए। देशभर में छोटी-बड़ी कंपनियां आज इसी वजह से ‘मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी’ की बात कर रही हैं, जिसके तहत कार्यालयों की तरफ़ से महिला कर्मचारियों को हर महीने 2-4 दिनों की छुट्टी दी जाती है और इसके लिए उनकी तनख्वाह नहीं काटी जाती। हालांकि ये पॉलिसी अभी भी हर जगह लागू नहीं हुई है, पर हमारे देश में इसका महत्त्व धीरे-धीरे समझा जा रहा है और कुछ जगहों पर इसे लागू करने की कोशिश भी की जा रही है।

प्राइमरी डिसमेनोरिया आमतौर पर टीनएज लड़कियों से लेकर 20 के आसपास की औरतों को होता है।

मुद्दे की बात ये है कि डिस्मेनोरिया कोई बड़ी बात नहीं है और इन दिनों के दौरान घबराने या काम का ज़्यादा प्रेशर लेने की ज़रूरत बिलकुल भी नहीं है। अगर आपको पीरियड्स के दौरान ज़्यादा तकलीफ़ होती है तो आप ये तरीके आज़माकर देख सकती हैं :

1. मेफ़्टल या पैरासिटामोल जैसी कोई पेनकिलर दवा लें। आमतौर पर इनका असर कुछ ही घंटों में नज़र आता है।

2. गरम पानी से नहाएं। गरम पानी आपकी मांसपेशियों को ढीली करता है और दर्द या तनाव से राहत दिलाने में मदद करता है। आप चाहें तो नहाने के पानी में कोई खुशबूदार पदार्थ मिला सकती हैं जिससे आपका मन भी अच्छा हो जाए।

3. पेट पर गर्म पानी की बोतल या थैला रखकर कुछ देर लेटे रहिए। चाहे तो सो जाइए क्योंकि इस वक़्त आपको आराम की ज़रूरत है।

4. चॉकलेट खाइए। डार्क चॉकलेट में पोटेशियम और ज़रूरी विटामिन होते हैं जो मांसपेशियों को राहत दिलाने में मदद करते हैं। चॉकलेट से शरीर में कुछ हॉर्मोन्स का संचार भी बढ़ता है जो स्ट्रेस को कम करने में और शरीर में एनर्जी बढ़ाने में मदद करते हैं।

5. चलने-फिरने और योगासन जैसा हल्का व्यायाम करने की कोशिश कीजिए। ज़्यादा देर तक एक जगह बैठे या लेटे रहने से दर्द बढ़ सकता है।

6. मेडिटेशन करने की कोशिश कीजिए। इससे मन एकाग्र होता है और तकलीफ़ से ध्यान भी हटता है।

अगर आपको लगता है कि पीरियड्स के दौरान आपकी तकलीफ़ के पीछे कोई और कारण हो सकता है तो डॉक्टर को दिखाने से हिचकिचाएं मत। आपकी सेहत ज़रूरी है और अपनी समस्याओं को लेकर संकोच करने से वे और बढ़ सकती हैं। डिस्मेनोरिया एक आम चीज़ हैं और इस तकलीफ़ को झेलने वाली आप अकेली नहीं हैं। अपना ख्याल रखना न भूलें और अपनी तकलीफ़ को नज़रअंदाज़ करने के बजाय खुद को आराम करने और इससे उभरने का मौका दें।

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तस्वीर साभार : doktersehat

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