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मई के महीने में दुनिया भर में ‘मदर्स डे’ मनाया जाता है। उन मांओं को सम्मान देने के लिए जो अपने बच्चे ही नहीं बल्कि पूरे परिवार से जुड़ी हर छोटी से छोटी चीज़ का ध्यान रखतीं हैं। जो आनेवाली पीढ़ी की परवरिश और शिक्षा में कोई कसर नहीं छोड़तीं। और भविष्य की युवा पीढ़ी की सारी ज़िम्मेदारी जिनके हाथों में है। हर साल हमारे यहां भी मदर्स डे मनाया जाता है। औरत को माता के रूप में पूजने की सदियों पुरानी संस्कृति हमारे देश में पहले से ही है। मदर्स डे के दिन सोशल मीडिया ‘मांं की ममता’ और ‘मां का प्यार’ वाले पोस्टस से छा जाता है। इस साल भी 10 मई को ‘हैपी मदर्स डे’ वाले मेसेजेस इंटरनेट पर छा गए। पर वर्तमान स्थिति को देखकर मन में सवाल उठता है कि – क्या ये मदर्स डे हर कोई मना पाता है? कहीं ये सिर्फ़ हम जैसे संभ्रांत, विशेषाधिकार प्राप्त लोगों तक सीमित तो नहीं है?

आज, यानी 14 मई की सुबह खबर आई कि अफ़ग़ानिस्तान के काबुल में एक अस्पताल के मेटरनिटी वॉर्ड में आतंकी हमला हुआ है। कुल चौबीस लोग मारे गए जिनमें से दो नवजात बच्चे थे। सुनने में आ रहा है कि हमलावारों का नाता तालिबान से हो सकता है। 27 साल की ज़ैनब इसी मेटरनिटी वॉर्ड में भर्ती हुई थी। शादी के बाद उसे बच्चा नहीं हो पा रहा था। बहुत कोशिशों और इंतज़ार के बाद आज उसकी पहली संतान, ओमीद ने जन्म लिया। जन्म लेने के बाद ओमीद ने अपनी मां की गोद में लगभग चार घंटे गुज़ारे, जिसके बाद उसे गोलियों से भून दिया गया। अपनी ज़िंदगी के सात साल ज़ैनब ने इस दिन का इंतज़ार किया था और पलभर में ही उसकी ज़िंदगी में अंधेरा छा गया।

अफ़ग़ानिस्तान से आते हैं भारत में। कोरोनावायरस के फैलने से सब जगह हाहाकार मचा हुआ है और इसका सबसे ज़्यादा असर हो रहा है गरीब दिहाड़ी मजदूरों पर। बस ट्रेन में जगह न मिलने या किराया देने में असमर्थ होने की वजह से लाखों मज़दूर परिवार पैदल ही अपने अपने गांव वापस जा रहे हैं। खाने पीने के अभाव, थकान, और दुर्घटनाओं की वजह से इन में कइयों की मौत हुई है, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं।

मदर्स डे पर हमें इन सभी मांओं को याद करना चाहिए जिन्हें अपने मातृत्व का जश्न मनाने की हैसियत नहीं है।

पटना में आठ साल के राहुल मुसहर की मौत भी ऐसे ही हुई। दिनभर खाना न मिलने की वजह से उसकी तबियत खराब हो गई। दिन भर तेज़ बुखार और दस्त होने के बाद उसने दम तोड़ दिया। राहुल की मां सोनामती देवी कहती हैं कि थोड़े पैसों का इंतज़ाम करके उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया था। डॉक्टर ने दवाई भी दी। पर दवाई लेने से पहले ही राहुल चल बसा। देशभर में ऐसे न जाने कितने राहुल होंगे जिनके नाम तक हम नहीं जानते। हम नहीं जानते उन सबकी मांओं पर क्या बीत रही होगी। किस तरह उन्होंने अपनी संतान को ज़िंदा रखने की कोशिश की होगी जब हम इंस्टाग्राम पर मदर्स डे वाली सेल्फ़ी डाल रहे थे।

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विरोध एक सांवैधानिक अधिकार है। लोकतंत्र उसी को कहते हैं जहां जनता सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना कर सके। दिल्ली के शाहीन बाग़ में ऐसा ही विरोध प्रदर्शन हुआ जब एक महीने तक यहां की औरतों ने सरकार के नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के ख़िलाफ़ धरना दिया। अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए, अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इन मांओं और दादियों ने अपना कीमती वक़्त निकालकर नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। बदले में उनका खुलेआम चरित्र हनन किया गया। सोशल मीडिया द्वारा उन पर आतंकवाद से लेकर वेश्यावृत्ति तक हर तरह के आरोप लगाए गए।

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इन्हीं प्रदर्शनकारियों में शामिल थीं सफ़ूरा ज़रग़ार, जिन्हें हाल ही में बिना किसी सबूत के आतंकवाद के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। इस समय सफ़ूरा तीन महीने प्रेगनेंट हैं। उन्हें भी भद्दी से भद्दी भाषा में लांछित किया गया है। उन्हें वेश्या बुलाया गया है। उनके बच्चे के पिता के परिचय पर अभद्र टिप्पणी की गई है। यहां तक कि उनके नाम से अश्लील वीडियो भी फैलाए गए हैं। सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने सांवैधानिक तरीके से विरोध प्रदर्शन किया। मज़े की बात ये है कि एक होनेवाली मां का इस तरह चरित्र हनन करने के बाद इन्हीं लोगों ने मदर्स डे और मांओं के सम्मान पर लंबे लंबे पोस्ट भी लिखे होंगे।

मदर्स डे पर हमें इन सभी मांओं को याद करना चाहिए जिन्हें अपने मातृत्व का जश्न मनाने की हैसियत नहीं है। जिनके बच्चे पैदा होते ही मर जाते हैं। जो अपने बच्चों को दो वक़्त की रोटी नहीं दिला पातीं। जो अन्याय, गैर-बराबरी और शोषण के ख़िलाफ़ लड़तीं हैं अपने बच्चों को एक खुशहाल ज़िंदगी देने के लिए। जिन्हें समाज इज़्ज़त के लायक नहीं समझता। इन वंचित, शोषित मांओं को भी सलामी देने की बेहद ज़रूरत है। उन्हें समाज में उनके अधिकार दिलाने, उनका उचित स्थान दिलाना ज़रूरी है। मदर्स डे तभी सफल होगा जब समाज की हर मां और उसके बच्चे को एक खूबसूरत ज़िंदगी मिलेगी।

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तस्वीर साभार : muzaffarpurnow

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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