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इतिहास के पन्नों में हम राजा-महाराजाओं के बारे में पढ़ते हैं। उनकी वीरता और उनके शौर्य की गाथाओं से प्रभावित होते हैं। पर हर चीज़ की तरह ही इतिहास का अध्ययन भी एक पुरुष-केंद्रित नज़रिए से किया जाता है जिसके कारण हम अक्सर उन महिलाओं के बारे में नहीं जान पाते जो शौर्य और वीरता में पुरुष योद्धाओं व शासकों से किसी भी अंश में कम नहीं थीं। ऐसी ही एक शूरवीर महिला थीं मराठा सेना की पहली और इकलौती महिला सेनापति –  उमाबाई दाभाडे।

उमाबाई का जन्म नाशिक के अभोण में देवराव ठोके देशमुख के घर में हुआ था। लड़की होने के बावजूद उन्हें कभी अलग तरह से नहीं देखा गया और उनकी परवरिश भी घर के लड़कों की तरह हुई। उनका पूरा बचपन तलवारबाज़ी और घुड़सवारी के अभ्यास में गुज़रा और जल्द ही पता चला कि वे एक होशियार लड़की हैं, जो साहस और ताकत में किसी लड़के से कम नहीं हैं।

समय आने पर उमाबाई की शादी हुई मराठा सेनापति खंडेराव येसाजीराव दाभाडे से, जो छत्रपति शिवाजी महाराज के ख़ास अंगरक्षक येसाजीराव के बेटे थे। खंडेराव की तीन पत्नियों में से उमाबाई सबसे छोटी थीं और शादी के बाद उनके साथ वे पुणे के तलेगाव चली आईं। उमाबाई और खंडेराव को तीन लड़के और तीन लड़कियां हुए और साल 1729 में खंडेराव की मृत्यु के बाद उनके बड़े बेटे त्रिम्बक राव दाभाडे को मराठा सरसेनापति बना दिया गया।

दाभाडे खानदान का आय गुजरात के कुछ प्रांतों से लिए गए ‘चौथ’ कर से आता था। पर खंडेराव के जाने के बाद इस कर पर पेशवाओं ने अपना हक़ जमा लिया। पेशवा बाजीराव ने ये मांग की कि चौथ कर इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी उन्हें दे दी जाए ताकि उन्हें इसका ज़्यादा हिस्सा मिल सके। इसी बात पर त्रिम्बक राव के साथ उनकी लड़ाई हो गई। साल 1731 में गुजरात के डभई में पेशवा बाजीराव और सरसेनापति त्रिम्बक राव में घमासान युद्ध हुआ जिसमें त्रिम्बक राव मारे गए।

त्रिम्बक राव के जाने के बाद उनकी जगह उनके भाई को लेनी थी। पर क्योंकि उनका भाई यशवंत राव बहुत छोटा था, ये ज़िम्मेदारी उमाबाई को ही लेनी पड़ी। बड़े बेटे की मौत के बाद उमाबाई दाभाडे ने मराठा सरसेनापति की भूमिका अपना ली। सरसेनापति के तौर पर खुद को साबित करने का पहला मौका उन्हें एक साल बाद ही मिला जब मुग़ल सरदार ज़ोरावर ख़ां ने अहमदाबाद पर कब्ज़ा कर लिया। उमाबाई अपनी सेना लेकर अहमदाबाद की तरफ़ चल दीं। जब ज़ोरावर ख़ां को पता चला कि मराठा सेना का नेतृत्व एक विधवा औरत कर रही है, उन्होंने उमाबाई को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में लिखा था, ‘तुम एक विधवा हो। तुम्हारे बच्चे अभी भी छोटे हैं। अगर हमने तुम्हें हरा दिया तो उन्हें कौन देखेगा? ये लड़ाई वगैरह भूल जाओ और जिस रास्ते से आई हो उससे वापस चली जाओ।’

उमाबाई ने एक वीर सेनापति और कर्मठ शासक के तौर पर अपना नाम कमा लिया था। इतिहास में उमाबाई दाभाडे जैसी महिलाओं का योगदान हमें याद रखना चाहिए।

ये पढ़कर उमाबाई का संकल्प और भी दृढ़ हो गया कि वे ज़ोरावर ख़ां को हराएंगी। अपनी सेना के साथ उन्होंने ज़ोरावर ख़ां के किले पर हल्ला बोल दिया और घमासान जंग छिड़ गई। डरकर ज़ोरावर ख़ां अपने किले में छुप गया और सारे दरवाज़े बंद कर दिए। अब उमाबाई को किले के अंदर पहुंचने का रास्ता चाहिए था। ऐसा करने के लिए उन्होंने किले के सामने दुश्मनों की लाशों का पहाड़ बनवाया और उसे किले के दरवाज़े से सटा दिया। सीढ़ियों की तरह एक के ऊपर एक करके इन लाशों पर चढ़कर उमाबाई किले के अंदर तक पहुंच गई। वहां वे ज़ोरावर ख़ां को हराने में सफल हुईं और उसे बंदी बनाकर सतारा में राजा छत्रपति शाहू महाराज के पास ले आईं। शाहू महाराज ने उमाबाई की जीत से प्रसन्न होकर उन्हें पुरस्कार में सोने के घुंघरू दिए, जिन्हें पहनने की इजाज़त सिर्फ़ राजपरिवार की औरतों को थी।

जंग के बाद पेशवाओं के साथ दाभाडे परिवार के संबंध बिगड़ते रहे। पेशवा बाजीराव ने उमाबाई को गुजरात से कर इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी इस शर्त पर सौंपी कि वे आधा कर उन्हें दे देंगी। उमाबाई मंज़ूर तो हो गईं पर इसबात पर उन्होंने कभी अमल नहीं किया। क्योंकि अपने बेटे को मारने के लिए बाजीराव पर उनका गुस्सा अभी गया नहीं था।

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साल 1740 में पेशवा बाजीराव की मौत हो गई और नौ साल बाद साल 1749 में छत्रपति शाहू महाराज भी चल बसे। अब नए पेशवा थे बालाजी बाजीराव और राजा बने छत्रपति राजाराम द्वितीय। नए पेशवा काफ़ी कठोर थे और उन्होंने दाभाडे परिवार से उस पूरी रकम की मांग की जो बीते वर्षों में उन्हें पेशवा बाजीराव को देना था। जहां छत्रपति शाहू महाराज इस विवाद में हमेशा उमाबाई का पक्ष लेते थे और ये रकम अदा न करने पर भी उन्हें कुछ नहीं कहते थे, छत्रपति राजाराम पूरी तरह पेशवा के पक्ष में थे। और ये पैसे अदा करने के लिए उन्होंने उमाबाई पर दबाव डाला।

उमाबाई ने राजमाता महारानी ताराबाई की मदद मांगी, जिसके लिए वे राज़ी हो गईं। साल 1750 में जब पेशवा बालाजी मुग़ल-शासित सरहद पर गए हुए थे, ताराबाई ने छत्रपति राजाराम से कहा कि उन्हें पेशवा के पद से हटा दिया जाए। जब वे नहीं माने तब 24 नवंबर को ताराबाई ने उन्हें गिरफ़्तार करवाकर सतारा में कैद करवा लिया। ताराबाई की मदद के लिए उमाबाई ने दामाजी राव गायकवाड के नेतृत्व में 15,000 पलटनें भेजीं। दुर्भाग्य से पेशवा के लोगों ने युद्ध में दामाजी राव को हरा दिया और ज़बरदस्ती उन्हें शांति का समझौता करने के लिए मंज़ूर किया। उमाबाई, दामाजी राव के साथ कइयों को गिरफ़्तार भी कर लिया गया।

साल 1751 में पूरे दाभाडे परिवार को नज़रबंदी में रख लिया गया और उमाबाई से सरसेनापति का खिताब छीन लिया गया‌। 16 नवंबर को उमाबाई ने अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ भागने की कोशिश की पर जल्द ही उन्हें दोबारा कैद कर लिया गया। उमाबाई और उनकी बहू अंबिकाबाई को सिंहगड किले में कैद किया गया। साल 1752 में सिंहगड से उन्हें वापस पुणे लाया गया जहां एक साल बाद उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली। 28 नवंबर 1753 में शनिवारवाडा किले के पास ओम्कारेश्वर के नडगेमोडी में उमाबाई दाभाडे की मृत्यु हो गई।

अपनी ज़िंदगी के आखिरी साल उमाबाई ने भले ही कैदी के तौर पर गुज़ारे हो मगर अपने बाकी के जीवन में उन्होंने एक वीर सेनापति और कर्मठ शासक के तौर पर अपना नाम कमा लिया था। उन्होंने साबित कर दिया था कि राजनीति और रणनीति के मामलों में वे किसी मर्द से कम नहीं हैं, जो कि उस दौर में बहुत ही बड़ी बात थी। इतिहास में उमाबाई दाभाडे जैसी महिलाओं का योगदान हमें याद रखना चाहिए।

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तस्वीर साभार : marathaswarajy

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