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जब आप कुछ अच्छा करने की ओर आगे बढ़ते हैं तो आपके रास्ते में कई परेशानियां आती हैं, जिनसे आप टूटकर बिखरने लगते हैं। ऐसा कई बार होता है, जब परिस्थिति आपके विपरीत हो जाती है। जाहिर-सी बात है, जिंदगी कभी एक तरह से चलती भी नहीं है क्योंकि तभी पता चलता है कि आप जीवित हैं और आपकी सांसें चल रहीं हैं। जब कभी हम लीक से हटकर चलने के बारे में सोचते हैं, तब हमारे रास्ते में कई परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ था सुमैरा अब्दुल अली के साथ। जब उन्होंने अवैध खनन के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद करने का काम शुरु किया था। 

सुमैरा मुंबई की पर्यावरणविद हैं और आवाज़ फाउंडेशन की संस्थापक हैं। वे कंवर्सेशन सब कमेटी की को चेयरमैन और एशिया के सबसे पुराने व सबसे बड़े एनवायरोमेंटल एनजीओ, द बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी की सचिव भी हैं। फिलहाल वे गवर्निंग काउंसिल मेंबर हैं। सुमैरा का जन्म 22 मई 1961 को मुंबई में हुआ था। सुमैरा भारत के सर्वोपरि पर्यावरणविद के रूप में अपनी खास पहचान रखती हैं। वे पिछले बीस साल से ध्वनि प्रदूषण और अवैध रेत खनन के प्रति लोगों को जागरूक कर रही हैं। साल 2002 में सुमैरा के नेतृत्व में आवाज़ फाउंडेशन द्वारा ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ मुहिम चलाई गई थी, जिसे लोगों का व्यापक सर्पोट मिला था। धीरे-धीरे यह मुहिम भारत के कई राज्यों तक फैलनी शुरु हो गई। जैसे- बनारस, बैंगलोर और पुणे। आवाज़ भारत की पहली ऐसी संस्था है, जो ध्वनि प्रदूषण का डाटा इकट्ठा करती है।

इसके साथ ही सुमैरा ने साल 2002 में मध्यरात्रि से बॉम्बे पर्यावरणीय एक्शन ग्रुप और दो डॉक्टरों के साथ लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति देने के लिए शोर नियमों के ढील के खिलाफ बंबई उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की थी। उन्होंने साल 2004 और साल 2006 में ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ एक व्यापक सेमिनार का आयोजन किया था। साल 2003 के बाद से ही वे ध्वनि प्रदूषण, अवैध रेत खनन, अवैध निर्माण, जैव विविध वनों में खनन, समुद्री प्रदूषण और तेल फैलने, पर्यावरण के अनुकूल त्योहारों, पेड़ों की सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर ‘आवाज़ फाउंडेशन’ के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से काम किया है। 

बच्चों के तंबाकू बिक्री पर कानून जैसे नागरिक मुद्दों पर भी उन्होंने काम किया है। उन्होंने जनहित के कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए एक एनजीओ आंदोलन का आयोजन किया था। जिसका नाम ‘मूवमेंट अगेनिस्ट इंटिमिडेशन, थ्रेट एंड रिवेंज अगेनिस्ट ऐक्टिविस्ट'(MITRA) है। सुमैरा के लिए पर्यावरण को बचाना सबसे ज्यादा जरुरी है। उन्होंने अलग-अलग प्लेटफाॅर्म के माध्यम से लोगों को पर्यावरण से होने वाले नुकसान से न सिर्फ अवगत कराया है, बल्कि उनसे बचने के तरीकों से भी अवगत कराया है। 

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सुमैरा के अनुसार पर्यावरण को बचाने की मुहिमों में अभी बहुत कमी है।

साल 2004 की एक घटना है, जिसमें रेत माफिया ने उन्हें दो बार जान से मारने का प्रयास किया गया था। उन्होंने अपने जीवन का यह बुरा दौर भी देखा है लेकिन उनके इरादों में कभी कमी नहीं आई, बल्कि वे और तत्परता के साथ अपने काम में जुट गईं। पर्यावरण के क्षेत्र में सुमैरा के उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अशोक फैलोशिप और मदर टेरेसा अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। 

इस विषय पर हुई बातचीत में सुमैरा कहती हैं कि पर्यावरण बचाने की खातिर जान जोखिम में डाली मगर लेकिन हार नहीं मानी। आखिर जीत मेरी हुई। ध्वनि प्रदूषण को लेकर सुमैरा कहती हैं कि उन्होंने ध्वनि प्रदूषण की बढ़ती समस्या को देखते हुए उसे नियंत्रण करने का प्रयास किया। एक वेबसाइट में प्रकाशित उनके इंटरव्यू में उन्होंने कहा है, ‘मेरे एक परिचित शख्स उस समिति का हिस्सा थे, जो उच्च न्यायालय द्वारा गठित की गई थी। मुंबई का ध्वनि प्रदूषण कम करने के लिए सुझाव देना उस समिति का काम था। वह एक मैरिज हॉल के पास अपना काम कर रहे थे। रिपोर्ट टाइप करने में उन्हें मेरी जरूरत पड़ी। उनकी रिपोर्ट टाइप करते हुए मुझे पहली बार ध्वनि प्रदूषण की भयावहता का पता चला। एक जानकारी में इतनी ताकत थी कि उसके बाद हर रोज़ शहर का शोर-शराबा मुझे परेशान करने लगा। करीब दो साल बाद 2002 में मैं अपने उन्हीं परिचित के साथ ध्वनि प्रदूषण कम करने की दिशा में काम करने लगी। उनकी कानूनी जानकारी का लाभ लेते हुए सबसे पहले मैंने अदालत में जनहित याचिका दायर करके शहर के कुछ इलाकों को शांत क्षेत्र घोषित कराने में अदालती सफलता हासिल की, जब मेरा पहला ही प्रयास प्रभावशाली रहा, तो मुझे कई लोगों ने बधाई के साथ शोर से होने वाली खुद की परेशानियों से अवगत कराया।

मैं जानती हूं कि त्योहार खुशियों के लिए होते हैं और शोर-शराबा स्वास्थ्य के लिए घातक बीमारी है, जिसका उत्सव से कोई लेना-देना नहीं। मैं इसी बीमारी को मिटाने में जुटी हूं। लोगों को जागरूक करने के लिए मैं मुंबई की सड़कों पर एक विशेष ऑटोरिक्शा संचालित कराती हूं, जिसकी बॉडी पर सैकड़ों हॉर्न लगाए गए हैं। ये हॉर्न लोगों का ध्यान इस तरफ ले जाते हैं कि सड़कों पर हॉर्न का किस तरह बेजा इस्तेमाल किया जाता है। इस ऑटो पर ‘हॉर्न नॉट ओके प्लीज’ लिखा है। साथ ही मैंने रेत खनन माफियाओं के विरुद्ध भी अपनी मुहिम छेड़ रखी है।

इस तरह सुमैरा पर्यावरण को बचाने के लिए तत्परता से काम कर रही हैं। सुमैरा के अनुसार पर्यावरण को बचाने की मुहिमों में अभी बहुत कमी है। उनके अनुसार कोरोना जैसी बीमारी भी पर्यावरण असंतुलन के कारण हो रही है। वे मानतीं हैं कि पर्यावरण को बचाने के लिए पॉलिसी का निर्माण होना चाहिए, जिससे लोग भी तमाम तरह की परेशानियों से बच सकें।   

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तस्वीर साभार : bhaskar

सौम्या ज्योत्स्ना बिहार से हैं तथा मीडिया और लेखन में कई सालों से सक्रिय हैं। नारीवादी मुद्दों पर अपनी आवाज़ बुलंद करना ये अपनी जिम्मेदारी समझती हैं क्योंकि स्याही की ताकत सबसे बुलंद होती है।

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