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बॉलीवुड फ़िल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा ने हाल ही में अपनी आने वाली फ़िल्म की घोषणा की है। रविवार  21 जून को ट्विटर पर उन्होंने बताया कि ‘मर्डर’ नामक उनकी ये फ़िल्म ‘अमृता और मारुति राव की कहानी’ पर आधारित है और ‘एक पिता का अपनी बेटी के लिए अत्यधिक प्रेम की दुखभरी कहानी है।’ उन्होंने यह भी कहा कि इस फ़िल्म की घोषणा उन्होंने ‘फादर्स डे’ के दिन की क्योंकि यह एक ‘दुखी पिता कि कहानी है।’

जिस घटना को वर्मा अपनी फ़िल्म की कहानी का आधार बता रहे हैं, वह ‘प्रणय कुमार हत्याकांड’ एक ‘ऑनर किलिंग’ की घटना है। यह दिनदहाड़े एक दलित व्यक्ति की नृशंस हत्या का वाक़या है जिसे यह फ़िल्मकार ‘पिता का प्रेम’ बता रहे हैं। 

साल 2018 की बात है। तेलंगाना में रहनेवाले 23 वर्षीय पेरुमल प्रणय कुमार और 21 वर्षीया अमृतावर्षिणी ने 30 जनवरी को शादी की थी। वे स्कूल में साथ पढ़ते थे और स्कूल के दिनों से ही एक दूसरे से प्यार करते थे। अमृता तथाकथित ऊंची जाति की थीं और उनके पिता मारुति राव तेलंगाना के मशहूर व्यवसायी थे, जहां प्रणय दलित और धर्मांतरित क्रिश्चन होने के साथ एक बहुत साधारण परिवार से आते थे। अमृता के परिवार को इसी वजह से ये रिश्ता मंज़ूर नहीं था और उन्होंने लंबे समय तक अमृता को घर में क़ैद कर रखा था ताकि वे प्रणय से न मिल सकें। एक दिन अमृता घर से भाग गईं और आर्य समाज मंदिर में उन्होंने प्रणय से शादी कर ली, जिसके बाद वे प्रणय और उनके परिवार के साथ रहने उनके घर चली गईं। 

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शादी के बाद अमृता के मां बाप ने कई बार उन्हें फोन किया और उन्हें घर वापस आने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, पर वे नहीं मानी। कुछ महीने बाद जब वे गर्भवती हुईं, मारुति राव ने अपनी बेटी पर अबॉर्शन करवा लेने के लिए भी ज़ोर डाला। 14 सितंबर की दोपहर के डेढ़ बजे, जब अमृता प्रणय और प्रणय की मां प्रेमलता के साथ अस्पताल से निकल रही थीं, अस्पताल के बाहर कुछ लोगों ने प्रणय को घेर लिया और एक लंबे चाकू से पीटकर उनकी हत्या कर दी। इस समय अमृता की गर्भावस्था को पांच महीने हुए थे और वह जांच के लिए नियमित  इस अस्पताल में अपने पति और सास के साथ आया करतीं थीं। 

औरतों के शरीर पर इस तरह का नियंत्रण और जातिगत भेदभाव व हिंसा के प्रोत्साहन को जब ‘प्यार’ का नाम दे दिया जाता है, तब यह जात-पात और पितृसत्ता की सदियों पुरानी, सड़ी हुई संस्कृति के जस्टिफिकेशन के सिवा कुछ नहीं है।

पुलिस ने पता लगाया कि प्रणय के हत्यारे अहमदाबाद के असगर अली और मोहम्मद अब्दुल बरी थे, जिन पर साल 2003 में गुजरात के गृह मंत्री हरेन पाण्ड्या की हत्या का आरोप भी लगा था। यह सामने आया कि प्रणय को मारने की यह उनकी पांचवी और आखिरी कोशिश थी और इससे पहले वे चार बार उन्हें मारने की कोशिश कर चुके थे। षड्यंत्र मारुति राव और उनके भाई श्रवण ने रचा था और हत्यारों को इस काम के लिए उन्होंने एक करोड़ रुपए दिए थे। इसमें मारुति राव के ड्राइवर समुद्रला शिवा और स्थानीय काँग्रेस अध्यक्ष अब्दुल करीम भी शामिल थे। 

8 मार्च 2020 को मारुति राव हैदराबाद के आर्य वैश्य भवन के एक कमरे में मृत पाए गए। उनके शव के पास एक चिट्ठी मिली जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी से माफ़ी मांगी है और अमृता से गुज़ारिश की है कि वे अपनी मां के पास चली जाएं। ‘ऑनर किलिंग’ यानी समुदाय कि ‘इज्ज़त’ बचाने के लिए हत्या आज भी हमारे समाज की एक क्रूर सच्चाई है। अक्सर एक औरत जब अपनी मर्ज़ी से अपनी जाति या अपने धर्म के बाहर शादी करती है, समाज के ठेकेदार उसके पति या उन दोनों को जान से मार देते हैं। यह हत्याएं ज्यादातर औरत के परिवारवाले ही करते हैं। क्योंकि औरत को ही एक समुदाय के सम्मान के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है, यह हत्याएं उन्हें ‘सबक’ सिखाने और खानदान की तथाकथित इज्ज़त मिट्टी में मिलने से बचाने के लिए की जाती हैं। औरतों पर हिंसा के ज़रिए उन पर काबू रखने और समाज में जाति-व्यवस्था को स्थायी रखने के लक्ष्य दोनों एक साथ सिद्ध हो जाते हैं।

औरतों के शरीर पर इस तरह का नियंत्रण और जातिगत भेदभाव व हिंसा के प्रोत्साहन को जब ‘प्यार’ का नाम दे दिया जाता है, तब यह जात-पात और पितृसत्ता की सदियों पुरानी, सड़ी हुई संस्कृति के जस्टिफिकेशन के सिवा कुछ नहीं है। यही संदेश दिया जाता है कि ‘प्यार’ के नाम पर एक औरत के शरीर और उसके व्यक्तिगत जीवन पर पुरुषों का संपूर्ण अधिकार हो सकता है। ‘प्यार’ की दुहाई देकर तथाकथित छोटी जातियों पर हिंसा, उनका शोषण और उनकी हत्या जायज़ हैं। और अगर हत्या के पीछे का कारण यह प्यार हो तो हत्यारा दोषमुक्त हो जाता है। 

प्रणय कुमार की हत्या के पीछे कोई प्यार नहीं, एक गंदी, रूढ़िवादी मानसिकता थी जो एक औरत का अपने व्यक्तिगत निर्णय खुद लेना बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। जो हर इंसान को बराबर और सम्मान के योग्य नहीं मां सकती थी। इसी मानसिकता ने प्रणय और अमृता जैसे हजारों की ज़िंदगी बर्बाद की है और रोज़ हमारे समाज को अंधेरे की तरफ़ धकेलती चली जाती है। रामगोपाल वर्मा जैसे फ़िल्मकार जब तक इसकी निंदा करने के बजाय अपनी फ़िल्मों की कहानियों में इसकी महिमामंडन करते रहेंगे, एक समाज के तौर पर हम कभी भी आज़ाद और अग्रसर नहीं हो पाएंगे। 

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तस्वीर साभार : thenewsminute

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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