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एड्स। ‘ऐकवायर्ड इम्यूनो डेफिशियेंसी सिंड्रोम। एक जानलेवा बीमारी जिसका इलाज अभी निकला नहीं है, और जिससे आक्रांत लोगों को अक्सर सहानुभूति की जगह नफ़रत, घिन और उत्पीड़न मिलता है। सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ये एक यौन संक्रामक रोग है। हमारे समाज की नज़रों की भाषा में कहें तो ये एक इंसान के ‘चरित्रहीन’ होने का सबूत। सेक्स की तरह ही सेक्स संबंधित बीमारियों की आलोचना हमारे यहां क़ायदे से नहीं की जाती, जिसकी वजह से इन बीमारियों से पीड़ितों को इलाज तो छोड़ो, सम्मान और मौलिक अधिकार भी हासिल नहीं होते। यही बदलने के लिए तैयार हुआ था एक आंदोलन। एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन।

ये आंदोलन सिर्फ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए एक ज़रूरी कदम ही नहीं था, बल्कि एक नारीवादी और मानवतावादी दृष्टिकोण से भी एक ऐतिहासिक संघर्ष था। इस आंदोलन का ध्यान ख़ासतौर पर था वेश्याओं और LGBTQ समुदाय के लोगों पर, जिनके स्वास्थ्य की परवाह उस वक़्त समाज को थी ही नहीं और जिन्हें हमारा समाज बराबरी की नज़र से, समान अधिकारों वाले इंसानों के तौर पर देखता ही नहीं था। ये आंदोलन सिर्फ एड्स को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के वंचित और शोषित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए भी बेहद ज़रूरी था।

एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन

एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन साल 1988 में दिल्ली में शुरू हुआ था। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एड्स से जुड़े कलंक को हटाने के लिए इसे शुरू किया। ये कार्यकर्ता दिल्ली के मशहूर रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट, जी. बी. रोड में वेश्याओं के साथ काम करते थे। ये देखने के लिए कि ये बीमारी किस तरह फैलती है और इससे संक्रमित लोगों का क्या हाल होता है। साल 1990 में उन्होंने ‘वीमेन एंड एड्स’ नाम की रिपोर्ट छापा, जिसमें विस्तार में उन्होंने बताया किस तरह वेश्याओं को उनकी रज़ामंदी के बग़ैर पुलिस और डॉक्टरों ने ज़बरदस्ती एड्स के लिए टेस्ट किया जाता है और अगर उन्हें एड्स हुआ तो कैसे पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करके उनका अत्याचार करती है और कैसे उन्हें अपने आसपास के लोगों से लांछन भी सहना पड़ता है।

इस रिपोर्ट ने ‘इम्मॉरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956 जैसे कानूनों की भी चर्चा की। ऐसे क़ानून मानव तस्करी की शिकार हुई औरतों के लिए बने हैं मगर सबसे ज़्यादा उन्हीं के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होते हैं। ये औरतें उन्हीं के हाथों शोषित होती हैं जो उनकी हिफ़ाज़त करने के लिए हैं और अगर वे एड्स की मरीज़ है तो कोई भी उन्हें पूछता तक नहीं है। वेश्यावृत्ति की दुनिया से निकलने के बाद भी ये औरतें स्वाभाविक ज़िन्दगी नहीं जी पातीं क्योंकि ख़ुद पुलिस और प्रशासन ही उन्हें शोषित करते हैं और कभी-कभी तो महज़ एड्स की शिकार होने के लिए ही जेल में डाल देते हैं।

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इस रिपोर्ट से एड्स की जांच और इलाज में हमारी स्वस्थ्य व्यवस्था की कमियां भी सामने आईं। पता चला कि अक्सर चिकित्सक वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (WHO) के दिए गए गाइडलाइन्स का पालन नहीं करते। ऊपर से वे इस बीमारी को बीमारी नहीं, गुनाह समझते हैं। एक केस सामने आया था जब ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के डॉक्टरों ने एक अफ़्रीकन एड्स पीड़ित का इलाज करने से साफ़ मना कर दिया था। ऐसी खबर भी सामने आई थी कि कई ब्लड बैंक्स एड्स-संक्रमित रक्तदानकर्ताओं के तस्वीर, घर का पता और फ़ोन नंबर पोस्टरों पे छापकर हर जगह लगा देते हैं, जैसे वो कोई जेल से भागे हुए क़ैदी हों! इन्हीं नाइंसाफ़ियों, इसी भेदभाव के ख़िलाफ़ ये लड़ाई थी। एड्स को अपराध की जगह बीमारी की तरह देखना और इसके मरीज़ों को क्रिमिनल न मान बैठना इस आंदोलन का लक्ष्य था।

एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन साल 1988 में दिल्ली में शुरू हुआ था। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एड्स से जुड़े कलंक को हटाने के लिए इसे शुरू किया।

एड्स प्रिवेंशन बिल

साल 1989 में संसद में एक बिल पास होना था। एड्स प्रिवेंशन बिल। इस बिल के तहत सरकार किसी भी ‘संदिग्ध’ इंसान को ज़बरदस्ती, उसकी मर्ज़ी के बगैर एड्स के लिए टेस्ट कर सकती थी। इस इंसान की सारी व्यक्तिगत जानकारी भी पुलिस और सरकार के पास होती और उसके इलाज के लिए कोई भी निर्देश नहीं दिए गए थे। सीधे-सीधे कहें तो ये बिल आमलोगों की निजी सीमाओं और मौलिक अधिकारों का सरासर उल्लंघन करता था।

एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने पेटिशन पेश किया। लगातार विरोध के बाद जाकर ये बिल वापस ले लिया गया और एड्स-पीड़ितों के ख़िलाफ़ ये क्रूर क़ानून नहीं बन पाया। पहली बार ये आंदोलन अदालत के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ था और जीता भी गया पर आखिरी बार नहीं।

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समलैंगिकों के अधिकार की लड़ाई

समलैंगिकता को हमारे समाज में अप्राकृतिक माना जाता है और इसका एक कारण ये बताया जाता है कि समलैंगिक मैथुन से एड्स होता है। ये महज़ एक मिथक है और इसके साथ समलैंगिकता से जुड़े और कई मिथकों का भंडाफोड़ इस आंदोलन ने साल 1991 में छपे एक रिपोर्ट, ‘लेस दैन गे’ में किया था। इस रिपोर्ट में ‘गे’,’लेस्बियन’,’ट्रांसजेंडर’ जैसे शब्दों का अर्थ विस्तार में समझाया गया और ये बताया गया कि अलग-अलग यौनिकताएँ कोई बीमारी नहीं, बल्कि पूरी तरह स्वाभाविक है। इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 377 पर भी इस रिपोर्ट ने कठोर आलोचना की और ये बात रखी कि समलैंगिक लोगों को क्रिमिनल की तरह देखना बंद किया जाए और उन्हें शादी और बच्चे करने का हक़ दिलवाया जाए।

साल 1994 में ये आंदोलन एकबार फिर अदालत के दरवाज़े आ पहुंचा जब किरण बेदी ने भारतीय जेलों में कंडोम्स के बांटे जाने पर रोक लगाने की कोशिश की इस वजह से कि इससे क़ैदियों में ‘समलैंगिकता बढ़ जाएगी।’आंदोलन ने इसके ख़िलाफ़ पेटिशन जमा किया इस वजह से कि ये कदम सिर्फ़ होमोफोबिक ही नहीं है बल्कि क़ैदियों को एड्स और अन्य यौन-संक्रमित बीमारियों के जोखिम में भी डाल सकता है। इस बार भी जीत हुई। कंडोम वितरण रोकने की कोशिश नाकामयाब हुई। एड्स और समलैंगिकों के अधिकार दोनों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए ये पेटिशन और उसका क़बूल होना बेहद ज़रूरी था।

आज एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन के 32 साल हो गए हैं। 32 सालों में यौन, यौनिकता और यौन-संक्रमित रोगों के बारे में समाज को जागरूक करने के लिए ये आंदोलन अनगिनत प्रदर्शन,मीटिंग, सेमिनार, रिसर्च कर चुका है। अनगिनत ज़िंदगियां बदल चुका है। आज अगर भारत में सेक्शन 377 से समलैंगिकता को हटाया गया है तो इसके लिए काफ़ी श्रेय इस आंदोलन को भी जाता है। उम्मीद है ऐसे कई और आंदोलन शुरू हों जब तक समाज से यौनिकता से जुड़ी हर तरह की ग़लतफ़हमियां ख़त्म न हो जाएं।

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तस्वीर साभार : feminisminindia

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